कहां खो गई वो दोस्ती? सोशल मीडिया, व्यस्त जिंदगी और स्वार्थ ने बदला रिश्तों का रंग

Amrit Vichar Network
Edited By Muskan Dixit
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कभी दोस्ती का मतलब था सुख-दुख में साथ खड़ा होना, आज सैकड़ों ऑनलाइन फ्रेंड्स के बीच भी सच्चे हमसफर की तलाश; जानिए क्यों कमजोर पड़ रहा दोस्ती का रिश्ता

लखनऊः आधुनिक युग में व्यस्त जीवनशैली, सोशल मीडिया के अत्यधिक प्रभाव और व्यावहारिक दृष्टिकोण के कारण दोस्ती में पहले जैसी प्रगाढ़ता, नि:स्वार्थ भाव और गहराई कम होती जा रही है। मानव जीवन के सबसे खूबसूरत और पवित्र रिश्तों में से एक है ‘दोस्ती’। यह एक ऐसा अनूठा बंधन है, जिसे व्यक्ति अपने परिवार से बाहर खुद चुनता है। एक सच्ची दोस्ती में न तो खून का रिश्ता होता है और न ही कोई सामाजिक बाध्यता, बल्कि यह पूरी तरह से आपसी समझ, विश्वास और नि:स्वार्थ प्रेम पर टिकी होती है। इतिहास गवाह है कि कृष्ण-सुदामा और दुर्योधन-कर्ण की दोस्ती ने त्याग और समर्पण के अप्रतिम उदाहरण पेश किए। दोस्ती ऐसा संबंध होता है, जहां व्यक्ति बिना किसी झिझक के अपने मन की बात कह सकता है।

जैसे-जैसे हम 21 वीं सदी के उत्तरार्ध में आगे बढ़ रहे हैं, हमारे मानवीय संबंधों का ताना-बाना भी बदल चुका है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, तकनीकी विस्तार और भौतिकवादी सोच ने इस बिंदास और अनौपचारिक रिश्ते की नींव को हिलाकर रख दिया है। अब दोस्ती में पहले जैसी प्रगाढ़ता, वह पुराना अपनापन और बिना किसी शर्त के साथ निभाने वाला नि:स्वार्थ भाव ढूंढना मुश्किल हो गया है। आज मित्र तो बहुत हैं, लेकिन मित्रता की वह गहराई कहीं गुम हो गई है। लोग अक्सर शिकायत करते हैं कि आज के दोस्त अच्छे समय के साथी बनकर रह गए हैं। 

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भौतिकवाद और स्वार्थ की प्रधानता

आज के युग को यदि उपयोगितावादी युग कहा जाए तो गलत नहीं होगा। वर्तमान समय में मानवीय मूल्यों से अधिक महत्व भौतिक संसाधनों और व्यक्तिगत लाभ को दिया जाने लगा है। इसका सीधा असर हमारी दोस्ती पर पड़ा है। पहले के समय में दोस्ती केवल साथ रहने, सुख-दुख बांटने और एक-दूसरे का संबल बनने के लिए की जाती थी। आज अधिकांश लोग दोस्ती करने से पहले सामने वाले की सामाजिक स्थिति, आर्थिक हैसियत और उसके प्रभाव का आकलन करते हैं। जब रिश्ता नि:स्वार्थ भाव के बजाय ‘मुझे इससे क्या फायदा होगा’ की सोच पर आधारित हो जाता है, तो उसमें से प्रगाढ़ता और अपनापन अपने आप लुप्त हो जाते हैं।

सोशल मीडिया और दुनिया का भ्रम

फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप और अन्य डिजिटल मंचों ने हमें दुनियाभर के लोगों से जोड़ तो दिया है, लेकिन इसने हमें हमारे वास्तविक दोस्तों से दूर भी कर दिया है। आज हमारे पास सैकड़ों ‘फॉलोअर्स’ और ‘फ्रेंड्स’ हैं, लेकिन संकट के समय एक भी कंधा रोने के लिए उपलब्ध नहीं होता। सोशल मीडिया पर केवल तस्वीरों को लाइक करना, जन्मदिन पर औपचारिक संदेश भेजना या केवल रील्स साझा करना ही दोस्ती का पैमाना बन गया है। इस आभासी दुनिया ने दोस्ती को बेहद सतही बना दिया है, जहां दिखावा अधिक है और वास्तविक भावनाएं नगण्य हैं।

HAPPY FRIENDSHIP DAY

अत्यधिक व्यस्त जीवनशैली और समय का अभाव

आधुनिक जीवन अत्यधिक प्रतिस्पर्धी और तनावपूर्ण हो चुका है। हर व्यक्ति करियर, पैसा कमाने और अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं में इस कदर उलझा हुआ है कि उसके पास अपनों के लिए भी समय नहीं बचता। पहले दोस्त बिना किसी पूर्व सूचना के एक-दूसरे के घर पहुंच जाया करते थे, घंटों बैठकर बातें करते थे और सुख-दु:ख साझा करते थे। आज किसी मित्र से मिलने के लिए भी ‘अपॉइंटमेंट’ लेना पड़ता है या कई दिनों पहले योजना बनानी पड़ती है। समय की इसी कमी के कारण संबंधों की ऊष्मा धीरे-धीरे ठंडी पड़ती जा रही है।

संवादहीनता और स्क्रीन टाइम की अधिकता

जब भी दो दोस्त आपस में मिलते हैं, तो अक्सर देखा जाता है कि वे एक-दूसरे से बात करने के बजाय अपने-अपने मोबाइल फोन की स्क्रीन पर व्यस्त रहते हैं। साथ बैठकर भी वे एक-दूसरे से दूर होते हैं। इसे तकनीकी भाषा में ‘फबिंग’  कहा जाता है। आमने-सामने बैठकर खुलकर बात न करने के कारण मन के भीतर की बातें मन में ही रह जाती हैं। संवाद की इस कमी या केवल चैट तक सीमित रहने के कारण आपसी समझ और भावनात्मक जुड़ाव कमजोर होता जा रहा है।

अपेक्षाओं का भारी बोझ और सहनशीलता की कमी

नि:स्वार्थ भाव, जो कभी इस रिश्ते की रीढ़ हुआ करता था, अब केवल किताबों और पुरानी फिल्मों की कहानियों में सिमट कर रह गया है। आज के दौर में लोगों में धैर्य और सहनशीलता का स्तर काफी नीचे चला गया है। हम अपने दोस्तों से बहुत अधिक अपेक्षाएं रखने लगे हैं और जब वे अपेक्षाएं पूरी नहीं होतीं, तो हम तुरंत रिश्ते को खत्म करने या उससे दूरी बनाने का फैसला कर लेते हैं। पहले की दोस्ती में दोस्तों की गलतियों को माफ करने, उन्हें समझने और आपस में मिलकर गिले-शिकवे दूर करने की प्रवृत्ति होती थी। आज लोग छोटी-छोटी असहमतियों पर भी ‘ब्लॉक’ कर देते हैं या बात करना बंद कर देते हैं, जिससे रिश्ते बिखर जाते हैं।

प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या की भावना

आज समाज का हर वर्ग एक अंधी दौड़ में शामिल है। दुख की बात है कि यह दौड़ अब दोस्तों के बीच भी शुरू हो गई है। जब दो दोस्तों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के बजाय ईर्ष्या और हीनभावना जगह ले लेती है, तो वह रिश्ता अपनी प्रगाढ़ता खो देता है। एक दोस्त की सफलता पर दिल से खुश होने के बजाय, दूसरे के मन में यह मलाल रहने लगता है कि वह पीछे क्यों रह गया। इस तुलनात्मक दृष्टिकोण ने दोस्ती के सहज और निश्छल माहौल को पूरी तरह प्रदूषित कर दिया है।

संवेदात्मक और भावनात्मक दूरी

पहले के समय में दोस्त एक-दूसरे के प्रति मानसिक और भावनात्मक रूप से पूरी तरह समर्पित होते थे। यदि एक मित्र संकट में है, तो दूसरा अपनी परवाह किए बिना उसकी मदद के लिए दौड़ पड़ता था। आज लोग दूसरों की समस्याओं में पड़ने से कतराते हैं। हर कोई अपनी मानसिक शांति और सहूलियत को पहले रखता है। इस अत्यधिक प्रैक्टिकल सोच के कारण दोस्ती में जो एक सुरक्षा और भरोसे का अहसास होता था, वह अब गायब हो चुका है। लोग अब ‘नो ड्रामा’ लाइफ चाहते हैं, जिससे वे दोस्तों के गहरे दु:खों से खुद को दूर रखते हैं।

एकल परिवार और बदलती सामाजिक संरचना

संयुक्त परिवारों के टूटने और एकल परिवारों के बढ़ने से इंसानी स्वभाव में भी बदलाव आया है। आज लोग अधिक आत्मकेंद्रित हो गए हैं। बचपन से ही बच्चों को केवल अपनी पढ़ाई, अपने करियर और अपनी प्रगति पर ध्यान केंद्रित करना सिखाया जाता है। इस सामाजिक बदलाव ने व्यक्ति को भीतर से थोड़ा अकेला और स्वार्थी बना दिया है। जब व्यक्ति केवल अपने और अपने सीमित परिवार के दायरे में सोचना शुरू करता है, तो वह दोस्ती जैसे व्यापक और उदार रिश्ते के साथ पूरा न्याय नहीं कर पाता।

केवल उत्सवों और स्वार्थ तक सीमित मुलाकातें

आजकल दोस्तों का मिलना-जुलना केवल खास मौकों जैसे जन्मदिन, नए साल की पार्टियों, शादियों या क्लबों में होने वाले आयोजनों तक सीमित रह गया है। इन मुलाकातों में केवल ऊंचे संगीत के बीच नाचना, मदिरापान करना या अच्छी तस्वीरें खींचकर सोशल मीडिया पर डालना ही मुख्य उद्देश्य होता है। ऐसी जगहों पर दिल से दिल की बात नहीं हो पाती। मुलाकातें केवल मनोरंजन का साधन बनकर रह गई हैं, आत्मिक संतोष का नहीं।

विश्वास की कमी और गोपनीयता का डर

सच्ची दोस्ती का सबसे बड़ा नियम है गोपनीयता कि मेरी बात मेरे दोस्त के पास सुरक्षित है, लेकिन आज के समय में लोगों का एक-दूसरे पर से भरोसा कम हुआ है। कई बार देखा जाता है कि अनबन होने पर दोस्त ही एक-दूसरे के राज सार्वजनिक कर देते हैं या सोशल मीडिया पर कीचड़ उछालते हैं। इस डर के कारण लोग अब अपने दोस्तों से भी पूरी तरह खुलकर बात नहीं करते और अपने मन के गहरे राज छुपाकर रखते हैं। जहां पूर्ण विश्वास नहीं होता, वहां प्रगाढ़ता कभी पनप नहीं सकती।

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