120 साल पहले यूपी के गन्ने ने बचाई थी जावा की चीनी इंडस्ट्री, शाहजहांपुर की ‘चुन्नी’ बनी थी संकट का हल

Amrit Vichar Network
Edited By Muskan Dixit
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शाहजहांपुर में बोई जाने वाली देसी ‘चुन्नी’ प्रजाति का गन्ना 1896 में डच शुगरकेन एक्सपर्ट कोबस जावा ले गए थे। वहां इसे विकसित कर ‘ब्लैक चेरीबोन’ नाम दिया गया और सेरेह बीमारी से जूझ रहे जावा के चीनी उद्योग को इससे बड़ी राहत मिली।

शाहजहांपुरः यह कहानी एक गन्ने की है, जो यूपी के शाहजहांपुर में बोया जाता था। प्रजाति का नाम चुन्नी थी। यह बात लगभग 120 साल पुरानी है, तब जावा द्वीप पर चीनी उद्योग पर आए संकट को चुन्नी प्रजाति के गन्ने ने टाला था। यह चुन्नी प्रजाति का गन्ना यूपी के शाहजहांपुर से जावा ले जाया गया था। जिसे शाहजहांपुर की रोजा चीनी मिल से डच शुगरकेन एक्सपर्ट कोबस जावा ले गए थे।

जावा में चुन्नी प्रजाति के गन्ने को विकसित किया और वहां उसका नाम ब्लैक चेरीबोन रखा गया, टेक्नीकल। 
बाद में ब्लैक चेरीबोन को भारत लाया गया, तब इसका नाम कोम्यबटूर 213 रखा गया, यह प्रजाति भारत में बेहद लोकप्रिय हुई।  दरअसल जावा दीप में गन्ने की बड़े स्तर पर खेती होती थी। बात 1880-90 के बीच की है, तब जावा में गन्ने में सेरेह नाम की बीमारी का बड़े स्तर पर प्रकोप हो गया था। सेरेह बीमारी से जावा के चीनी उद्योग पर संकट आ गया। इस संकट को टालने के लिए डज शुगरकेन एक्सपर्ट कोबस ने तमाम जानकारी की। उन्होंने यूपी के शाहजहांपुर में सर्वाधिक बोए जाने वाले देसी चुन्नी प्रजाति के गन्ने का अध्ययन किया, जो तमाम गुणों से परिपूर्ण था। कोबस शाहजहांपुर आए। उन्होंने उस वक्त के रोजा चीनी मिल के अफसरों से बातचीत की। कोबस रोजा चीनी मिल के अफसरों द्वारा उपलब्ध कराए गए चुन्नी प्रजाति के गन्ने को 1896 में जावा लेकर गए। 

UP Sugarcane Research Council

जावा में गन्ना वैज्ञानिकों ने एक साल तक चुन्नी को सेरेह नाम की बीमारीरोधी के तौर पर विकसित किया। यहां चुन्नी प्रजाति को विकसित कर पीओजे 213 टेक्नीकल नाम और आमतौर पर ब्लैक चेरीबोन नाम दिया गया। यह विकसित ब्लैक चेरीबोन प्रजाति का गन्ना ही जावा के चीनी उद्योग पर आए संकट को टाल ले गया। जावा की शुगर इंडस्ट्री सरसब्ज हुई। शाहजहांपुर के गन्ना शोध परिषद के प्रसार अधिकारी डॉ. संजीव पाठक ने बताया कि चुन्नी प्रजाति के गन्ने के जावा तक के सफर पर गन्ना शोध परिषद के प्रजनन अनुभाग के वीके श्रीवास्तव, अरविंद कुमार, बीएल शर्मा ने एक शोध पत्र तैयार किया था, जिसका प्रकाशन भी संस्थान की पुस्तकों में किया गया।  

1918 तक भारत में यह गन्ना प्रजातियां बोई जाती थीं

-    भारतीय गन्ने : चुन्नी, हेमजा, पथरी, काठा, सरेठा, लालड़ी, धौल, मुगों, मटना, नारगोरी, रिओरा, सर्बती, बाराऊख आदि गन्ने गुड़, राब व खांडसाीह के लिए उगाई जाती थी।
-    चीनी गन्ने : उबा, कंसार, खाकेई आदि गुड़, राब व खांडसारी के लिए बोई जाती थी।
-    नोबल केंस यानी मोटे गन्ने : पौंडा किस्मों के गन्ने अधिकांश चूसने के लिए उगाए जाते थे।

चीनी उद्योग

-    यूपी में 1918 तक चुन्नी, हेमजा, पथरी, काठा, सरेठा, लालड़ी गन्ने की प्रजाति बोई जाती थी।
-    1880-1890 की अवधि में जावा में गन्ने में सेरेह नाम की भयानक बीमारी लग गई थी।
-    जावा का चीनी उद्योग को बचाने का संकट था, तब यूपी से चुन्नी गन्ना जावा भेजा गया।
-    डच शुगरकेन एक्सपर्ट कोबस शाहजहांपुर में बोए जाने वाले चुन्नी प्रजाति के गन्ने को जावा ले गए।
-    जावा में 1897 में चुन्नी प्रजाति के गन्ने ब्लैक चेरीबोन नाम से विकसित किया गया था।
-    चुन्नी से विकसिक ब्लैक चेरीबोन प्रजाति का गन्ना सेरेह बीमारी के प्रति रोधी साबित हुआ।
-    चुन्नी से ब्लैक चेरीबोन नाम से विकसित गन्ना प्रजाति ने जावा की चीनी उद्योग को बचाया था।

UP Sugarcane Research Council (2)

विवेक सेंगर, वरिष्ठ पत्रकार

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