Bankipur Result: BJP के गढ़ में प्रशांत किशोर की बड़ी जीत, जानिए 5 वजह कैसे बदला बांकीपुर का सियासी समीकरण

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Edited By Muskan Dixit
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पहली बार चुनाव मैदान में उतरे प्रशांत किशोर ने 18,953 वोटों से दर्ज की जीत; युवा वोटरों की पसंद, लगातार जनसंपर्क और NDA-RJD के वोट बैंक में सेंध को माना जा रहा बड़ी वजह

पटना/बांकीपुर। जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने पहली बार चुनाव लड़ते हुए बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में बड़ी जीत दर्ज की है। 31 राउंड की मतगणना के बाद प्रशांत किशोर ने बीजेपी प्रत्याशी नीरज सिन्हा को 18,953 वोटों के अंतर से हराया। वहीं राष्ट्रीय जनता दल (RJD) की प्रत्याशी रेखा गुप्ता तीसरे स्थान पर रहीं।

बांकीपुर को बीजेपी का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। ऐसे में प्रशांत किशोर की जीत ने बिहार की सियासत में नई चर्चा छेड़ दी है। खास बात यह रही कि मतगणना के दौरान प्रशांत किशोर शुरुआत से ही बढ़त बनाए रहे और अंत तक यह बढ़त जीत में तब्दील हो गई।

किसे कितने वोट मिले?

- प्रशांत किशोर, जन सुराज पार्टी: 63,203 वोट
- नीरज सिन्हा, भारतीय जनता पार्टी: 44,250 वोट
- रेखा गुप्ता, राष्ट्रीय जनता दल: 14,085 वोट

प्रशांत किशोर और नीरज सिन्हा के बीच 18,953 वोटों का अंतर रहा।

बीजेपी के गढ़ में कैसे मिली प्रशांत किशोर को जीत?

बांकीपुर में प्रशांत किशोर की जीत के पीछे कई वजहों की चर्चा हो रही है। इनमें उनका लंबे समय से क्षेत्र में जनसंपर्क, युवा मतदाताओं के बीच सक्रियता और अलग-अलग सामाजिक वर्गों में पहुंच बनाने की रणनीति प्रमुख मानी जा रही है।

1. चुनाव से पहले ही शुरू कर दिया था जनसंपर्क

बांकीपुर सीट पहले बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के पास थी। राज्यसभा जाने के लिए उनके इस्तीफे के बाद प्रशांत किशोर ने क्षेत्र में लगातार जनसंपर्क अभियान चलाया। लोगों से मुलाकात, उनके मुद्दों को समझना और मतदाताओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना उनकी रणनीति का हिस्सा रहा।

खास तौर पर युवाओं के बीच मौजूदा मुद्दों को लेकर जागरूकता अभियान पर उनका जोर रहा। इसे उनकी चुनावी सफलता की प्रमुख वजहों में गिना जा रहा है।

2. युवा वोटरों पर रहा खास फोकस

प्रशांत किशोर की रणनीति में युवा मतदाता केंद्र में रहे। माना जा रहा है कि युवाओं के बीच उनकी सक्रियता का चुनाव में फायदा मिला। NEET मामले को लेकर हुए आंदोलन को भी उनके पक्ष में माहौल बनाने वाली वजहों में शामिल किया जा रहा है।

चुनावी समीकरणों के विश्लेषण के मुताबिक, बीजेपी के परंपरागत मतदाताओं में 40 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों का समर्थन बीजेपी के साथ रहा, जबकि युवाओं के एक हिस्से ने प्रशांत किशोर का रुख किया।

कई परिवारों में भी मतों का बंटवारा देखने को मिला, जहां युवा सदस्यों ने प्रशांत किशोर को पसंद किया, जबकि बुजुर्ग और अन्य वर्ग के मतदाताओं ने बीजेपी का समर्थन किया।

3. मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को लेकर नाराजगी का भी असर?

प्रशांत किशोर की जीत के पीछे बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को लेकर मतदाताओं के एक वर्ग में कथित नाराजगी को भी एक कारण बताया जा रहा है।

चुनावी समीकरणों के बीच भूमिहार, कुर्मी और अन्य जातीय समूहों के मतों को लेकर भी अलग-अलग दावे सामने आए। उपलब्ध राजनीतिक आकलन के अनुसार, करीब 50 प्रतिशत कुर्मी वोट प्रशांत किशोर के पक्ष में जाने की चर्चा रही।

हालांकि, ये आंकड़े चुनावी विश्लेषण और चर्चाओं पर आधारित हैं।

4. कम मतदान और युवा वोटिंग ने बदला समीकरण

2025 के बिहार विधानसभा चुनाव की तुलना में इस उपचुनाव में करीब 7 प्रतिशत कम मतदान हुआ। हालांकि, चर्चा यह भी रही कि युवा मतदाताओं की मतदान भागीदारी अपेक्षाकृत अधिक रही, जबकि मध्यम आयु वर्ग और बुजुर्ग मतदाताओं का मतदान प्रतिशत कम रहा।

इस मतदान पैटर्न को भी प्रशांत किशोर के पक्ष में जाने वाली परिस्थितियों में शामिल किया जा रहा है।

5. NDA और RJD दोनों के वोट बैंक में सेंध

प्रशांत किशोर की जीत की सबसे बड़ी वजहों में अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक वर्गों से समर्थन मिलना बताया जा रहा है। चुनावी आकलन के मुताबिक, उन्होंने NDA के परंपरागत वोट बैंक में सेंध लगाई।

दूसरी ओर, RJD के कोर मुस्लिम वोट बैंक में भी विभाजन की चर्चा रही। उपलब्ध आकलन में करीब 65 से 70 प्रतिशत मुस्लिम वोट प्रशांत किशोर के पक्ष में जाने की बात कही गई। इसके अलावा यादव समुदाय के युवा मतदाताओं का भी एक हिस्सा उनके साथ गया। चर्चा के अनुसार, करीब 30 प्रतिशत यादव युवा मतदाताओं ने प्रशांत किशोर का समर्थन किया।

बांकीपुर के नतीजे ने बिहार की राजनीति में बढ़ाई हलचल

प्रशांत किशोर की यह जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि उन्होंने अपना पहला चुनाव बीजेपी के मजबूत माने जाने वाले बांकीपुर क्षेत्र से लड़ा और जीत हासिल की। 63,203 वोट हासिल कर 18,953 मतों से जीत दर्ज करना जन सुराज के लिए बड़ा राजनीतिक संदेश माना जा रहा है।

इस नतीजे ने यह सवाल भी खड़ा किया है कि क्या प्रशांत किशोर की रणनीति आने वाले चुनावों में बिहार के पारंपरिक जातीय और राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकती है।

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