हिमालय से शांत नेपाल में सांप्रदायिकता के कारण
नेपाल पूरी दुनिया में सद्भाव और भाईचारगी की मिसाल के तौर पर देखा जाता था। ऐसा क्या हुआ कि हिमालय से शांत इस राष्ट्र को सांप्रदायिकता का जहर अपनी आगोश में लेता जा रहा है।
नेपाल जो हिंदू राष्ट्र के रहते हुए राज संस्था के काल में सांप्रदायिक भेदभाव से दूर रहा, यहां हिंदू, मुस्लिम सिख ईसाई आदि सभी वर्ग के लोग चाहे वे आबादी की दृष्टि से बड़े हों या छोटे, प्रेम भाव और भाईचारगी के साथ रहते थे। नेपाल पूरी दुनिया में सद्भाव और भाईचारगी के मिसाल के तौर पर देखा जाता था, लेकिन राजशाही खत्म होते ही ऐसा क्या हुआ कि हिमालय से शांत इस नन्हें राष्ट्र को सांप्रदायिकता का जहर अपनी आगोश में लेता जा रहा है। हैरत की बात यह है कि पिछले दस वर्षों में नेपाल में 15 से अधिक सांप्रदायिक घटनाएं घटीं और इसकी चपेट में ज्यादातर भारत सीमा से सटे नेपाल के तराई क्षेत्रों के जिले नेपाल गंज, कपिलवस्तु, सिरसा, सुनसरी, धनुषा, जनकपुर, वीरगंज,रूपनदेही आदि ही आते रहे। यहां दुर्गा पूजा के नाम पर, मंदिर-मस्जिद के नाम पर सिख-ईसाई के नाम पर दंगे और सांप्रदायिक तनाव पहले कभी नहीं हुए। अब हो रहे हैं। निश्चित ही नेपाल के मौजूदा हुकूमत के लिए यह चिंता की बात है।
पिछले दिनों सुनसरी जिले में कांवड़ यात्रियों के कोसी नदी में जल भरते जाते समय मुस्लिम समाज के लोगों से विवाद हो गया। बात बड़ी नहीं थी, सिर्फ डीजे की तेज आवाज पर एतराज़ था। इसे तत्काल दूर किया जा सकता था, लेकिन किसी पक्ष ने सूझबूझ से काम नहीं लिया। नतीजा आगजनी, तोड़ फोड़ और तीन जनों की जान गंवाने की दर्दनाक घटना के रूप में सामने आई। एक हफ्ते से ज्यादा सुनसरी, सिरहा, धनुषा आदी मधेश प्रांत के जिले सांप्रदायिकता की आग में झुलसते रहे।
हफ्ते भर की कड़ी मशक्कत के बाद तनाव और उपद्रव अब जाकर काबू हो पाया है। तनावग्रस्त जिलों में शांति का माहौल बनने लगा है, लेकिन यह कितना स्थाई है, इसे लेकर संशय बना हुआ है और नेपाल में अमन पसंद लोगों का सवाल है कि आखिर भारत सीमा से सटे खास कर यूपी और बिहार सीमा से सटे नेपाल के तराई जिलों में ही यह आग क्यों उठती है? सुनसरी घटना में नेपाल पुलिस को जो सुराग मिले हैं, इसमें बड़ी साज़िश की आशंका है। नेपाल पुलिस इसकी तह तक जाने में जुटी हुई है।
सुनसरी जिले की आग को शांत करने में नेपाल के गृहमंत्री सुडान गुरूंग की भूमिका की सराहना पूरे नेपाल में हो रही और सभी वर्गों के लोग उनकी तारीफ कर रहे हैं। सुडान गुरूंग घटना के बीच धनुषा पंहुच गए और वहां न केवल प्रशासनिक अफसरों के साथ बैठ कर संपूर्ण स्थिति की समीक्षा की, दोनों समुदाय के लोगों से एक-एक करके भेंट कर शांति और सद्भाव की अपील की। पीड़ित परिवारों से मिलकर भी उन्होंने सुरक्षा और इमदाद का भरोसा दिया। गृहमंत्री हिंदू संगठनों से भी मिले और उनकी दस सूत्री मांगों पर विचार करने का आश्वासन दिया। नेपाल में किसी गृहमंत्री की ऐसी सराहनीय पहल की तारीफ होनी ही चाहिए।
गृहमंत्री सुडान गुरूंग ने हिंदूवादी संगठनों की प्रमुख मांग हिंदू राष्ट्र पर तीन महीने में विचार करने का आश्वासन दिया। नेपाल हिंदू राष्ट्र था, लोकतांत्रिक बहाली के बाद इसे धर्म निरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया गया। उसके बाद से ही रह-रहकर राज संस्था और हिंदू राष्ट्र की मांग उठती रही है, लेकिन इधर जिस रूप में हिंदू राष्ट्र की मांग उठ रही है, उसका तरीका गलत है। किसी बहाने सांप्रदायिक उन्माद पैदा करो, जब सरकार और प्रशासन के लोग बीच-बचाव में आगे आएं तो हिंदू राष्ट्र की मांग कर दो। सुनसरी की घटना सांप्रदायिकता से जुड़ी थी, बीच में हिंदूवादी संगठन आ गए और हिंदू राष्ट्र की मांग कर दी।
नेपाल के धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होने के बावजूद, राजनीतिक दल भी अपने फायदे के लिए हिंदू राष्ट्र बहाली की बात करते रहे हैं। नेपाली कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शेर बहादुर देउबा चुनाव के वक्त हिंदू राष्ट्र की बात करते रहे हैं। यूपी और बिहार में जिस तर्ज पर हिंदू संगठनों का उदय हुआ है, ठीक उसी तर्ज पर नेपाल के मधेश प्रांत के जिलों में भी ऐसे संगठन तेजी से उभरे हैं।
नेपाल के हिंदू राष्ट्र की बाबत हाल ही में प्रधानमंत्री बालेन शाह ने राजनीतिक दलों की बैठक में साफ कहा है कि हिंदू राष्ट्र की वापसी मुमकिन नहीं है, हालांकि हिंदू राष्ट्र से नेपाल के मुस्लिम समाज को कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन प्रधानमंत्री की चिंता अलग है। वे हिंदू राष्ट्र का राजनीतीकरण नहीं चाहते। इस मांग के बहाने मुस्लिमों को टारगेट करने के वे सख्त विरोधी हैं। 2015 में आए भूकंप, फिर कोरोना और साल भर पहले के आंदोलनों तथा हाल की सांप्रदायिक घटना में नेपाल को भारी नुकसान हुआ है। एक तरह से नेपाल के पुनर्निर्माण की जरूरत है और यह बिना बाहरी निवेश के संभव नहीं है। इन घटनाओं से नेपाल में विदेशी निवेश की संभावनाओं पर ब्रेक लगाना स्वाभाविक है। नेपाल के लिए यह बेहद चिंता का विषय है। (ये लेखक के निजी विचार हैं)
