महाभारत काल से जुड़ा है देहरादून का रहस्यमयी लाखामंडल, आज भी मौजूद हैं प्राचीन शिवलिंग और गुफा

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Edited By Muskan Dixit
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यमुना किनारे बसे लाखामंडल में दिखते हैं पौराणिक अवशेष, लाक्षेश्वर मंदिर की मान्यताएं आज भी श्रद्धालुओं को करती हैं आकर्षित

देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के साथ-साथ प्राचीन मंदिरों और धार्मिक स्थलों के लिए भी प्रसिद्ध है। देहरादून जिले के जौनसार-बावर क्षेत्र में यमुना नदी के किनारे स्थित **लाखामंडल** ऐसा ही एक प्राचीन और रहस्यमयी धार्मिक स्थल है। यहां स्थित लाक्षेश्वर शिव मंदिर को लेकर कई पौराणिक मान्यताएं प्रचलित हैं और इसे महाभारत काल से जोड़कर देखा जाता है।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लाखामंडल के प्राचीन शिव मंदिर का वीडियो साझा किया। उन्होंने इसे श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बताते हुए मंदिर की वास्तुकला और प्राकृतिक परिवेश की भी सराहना की। मुख्यमंत्री ने श्रावण मास में उत्तराखंड आने वाले श्रद्धालुओं से इस पवित्र स्थल के दर्शन करने की अपील भी की।

पांडवों से जुड़ी है मंदिर की मान्यता

लाखामंडल के बारे में प्रचलित मान्यता इसे महाभारत काल से जोड़ती है। कहा जाता है कि पांडवों के अज्ञातवास के दौरान युधिष्ठिर ने यहां लाक्षेश्वर मंदिर परिसर में एक शिवलिंग स्थापित किया था। मान्यता है कि यह शिवलिंग आज भी मंदिर में मौजूद है।

इस शिवलिंग के सामने दो द्वारपालों की मूर्तियां स्थापित हैं। दोनों मूर्तियां पश्चिम दिशा की ओर मुख किए हुए हैं। इनमें से एक द्वारपाल की मूर्ति का हाथ कटा हुआ बताया जाता है।

12वीं-13वीं सदी का है लाक्षेश्वर मंदिर

भगवान शिव को समर्पित लाक्षेश्वर मंदिर की स्थापत्य शैली नागर है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसका निर्माण 12वीं-13वीं शताब्दी के दौरान हुआ था। मंदिर की वास्तुकला और आसपास का प्राकृतिक वातावरण इसे धार्मिक एवं ऐतिहासिक दृष्टि से खास बनाता है।

मंदिर परिसर में पार्वती के पैरों के निशान भी देखे जाने की बात कही जाती है, जो यहां की धार्मिक मान्यताओं का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

शव के दोबारा जीवित होने की भी है मान्यता

लाखामंडल से जुड़ी सबसे रहस्यमयी मान्यताओं में से एक मृत व्यक्ति के कुछ समय के लिए जीवित होने की है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, यदि किसी शव को मंदिर में द्वारपालों की मूर्तियों के सामने रखा जाए और पुजारी उस पर पवित्र जल का छिड़काव करें, तो मृत व्यक्ति कुछ समय के लिए जीवित हो सकता है।

कहा जाता है कि गंगाजल ग्रहण करने के बाद उसकी आत्मा फिर शरीर छोड़ देती है। हालांकि, इस दावे के पीछे वास्तविक रहस्य क्या है, इसे लेकर कोई वैज्ञानिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है।

आसपास मिलते हैं सैकड़ों शिवलिंग

लाखामंडल क्षेत्र की एक खास बात यहां पाए जाने वाले प्राचीन पत्थर के शिवलिंग हैं। मंदिर और आसपास के इलाके में सैकड़ों शिवलिंग मिलने की बात कही जाती है। एक स्थानीय मान्यता यह भी है कि जल अर्पित करने के बाद कुछ शिवलिंग शीशे की तरह चमकने लगते हैं।

क्या यहीं बना था लाक्षागृह?

लाखामंडल को महाभारत की लाक्षागृह की कथा से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि कौरवों ने पांडवों और उनकी माता कुंती को जीवित जलाने के उद्देश्य से लाख से बने भवन यानी लाक्षागृह का निर्माण कराया था।

स्थानीय कथाओं के अनुसार, लाखामंडल में वह प्राचीन गुफा आज भी मौजूद है, जिसके रास्ते पांडव लाक्षागृह से सुरक्षित बाहर निकलने में सफल हुए थे।

इसके बाद पांडवों के ‘चक्रनगरी’ में करीब एक महीने रहने की भी मान्यता है। वर्तमान में इस स्थान को चकराता के नाम से जाना जाता है।

आसपास के क्षेत्रों में भी मिले प्राचीन अवशेष

लाखामंडल के अलावा हनोल, थैना और मैंद्रथ जैसे क्षेत्रों में खुदाई के दौरान प्राचीन शिवलिंग और मूर्तियां मिलने की बात सामने आती रही है। इन अवशेषों को स्थानीय परंपराओं में पांडवों के इस क्षेत्र से संबंध के प्रमाण के तौर पर देखा जाता है।

प्राकृतिक सौंदर्य, प्राचीन स्थापत्य, शिव उपासना और महाभारत से जुड़ी लोक मान्यताओं के कारण लाखामंडल आज भी उत्तराखंड के प्रमुख धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थलों में अपनी अलग पहचान रखता है।

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