संपादकीय : हॉर्मुज का नया पेच
होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने के लिए ईरान की शर्तों ने पश्चिम एशिया के संकट को युद्ध और युद्धविराम के सवालों से आगे जाकर व्यापक राजनीतिक सौदे में बदल दिया है। तेहरान चाहता है कि अमेरिकी नाकाबंदी हटे, आर्थिक प्रतिबंध समाप्त हों, जब्त ईरानी संपत्तियां मुक्त की जाएं, युद्धजनित नुकसान की भरपाई हो तथा अमेरिका ईरान और उसके सहयोगियों को सैन्य धमकी देना बंद करे। ईरान स्वीकारता है कि वह वार्ता को तैयार है, लेकिन दबाव में आत्मसमर्पण नहीं करेगा।
अमेरिका के लिए प्रतिबंधों में व्यापक राहत, संपत्तियों की वापसी और युद्ध-क्षतिपूर्ति स्वीकार करना केवल विदेश नीति का फैसला नहीं, बल्कि घरेलू राजनीति में कमजोरी की स्वीकारोक्ति के रूप में देखा जा सकता है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की लोकप्रियता पहले ही दबाव में है। जुलाई के अंत में क्विनिपियाक सर्वेक्षण में उनकी कुल स्वीकृति 32 प्रतिशत बताई गई और ईरान युद्ध से निपटने के तरीके को केवल 28 प्रतिशत समर्थन मिला। इसलिए तेहरान की सभी शर्तें मान लेना ट्रंप के लिए राजनीतिक रूप से महंगा होगा।
जून में अमेरिका और ईरान के बीच समझौते की रूपरेखा बनी थी और उसके बाद जुलाई में होर्मुज में जहाजों की आवाजाही बढ़ने की पुष्टि अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन ने भी की थी, लेकिन उस प्रक्रिया को अंतिम और स्थायी समझौता मान लेना जल्दबाजी थी। अब ईरान की नई शर्तों से स्पष्ट है कि मूल समझौते और स्थायी राजनीतिक समाधान के बीच गहरी खाई है। फिलहाल ओमान के साथ प्रस्तावित समुद्री व्यवस्था खटाई में पड़ गई, लेकिन खत्म नहीं हुई। समस्या यह है कि जहाजों की सुरक्षित आवाजाही संबंधी तकनीकी समझौता तभी प्रभावी होगा, जब अमेरिका-ईरान राजनीतिक गतिरोध कुछ कम हो।
बेशक, सामान्य यातायात की उम्मीद कमजोर हुई हैं, समाप्त नहीं। भारत के लिए यह स्थिति चिंताजनक है। हमारी एलपीजी का बड़ा हिस्सा होर्मुज से आता है। लंबे गतिरोध से एलपीजी की उपलब्धता, आयात-लागत, बीमा और टैंकर भाड़ा बढ़ सकते हैं। कच्चे तेल के वैकल्पिक मार्ग संभव हैं, लेकिन महंगे हैं। होर्मुज संकट के दौरान वैश्विक गैस बाजार में खासकर यूरोप और एशिया में एलएनजी कीमतों में तेज वृद्धि इसका संकेत दे चुकी है। इसका असर अंततः पेट्रोल-डीजल, उर्वरक, परिवहन और महंगाई तक पहुंच सकता है। इसलिए यह मानकर चलना कि होर्मुज जल्दी सामान्य होगा, ऐसा भरोसा जोखिमपूर्ण है।
हालांकि स्थायी नाकेबंदी को निश्चित मान लेना भी गलत होगा। भारत को अमेरिका और ईरान दोनों से समान दूरी नहीं, बल्कि समान संवाद रखना चाहिए। ओमान के मध्यस्थ प्रयासों को सक्रिय समर्थन, ईरान से भारतीय जहाजों की सुरक्षित आवाजाही की गारंटी, अमेरिका से प्रतिबंधों में भारतीय ऊर्जा हितों की सुरक्षा और खाड़ी देशों के साथ वैकल्पिक आपूर्ति-मार्ग- इन चार मोर्चों पर उसे एक साथ काम करना होगा।
होर्मुज का संकट एक बड़ा सबक भी है कि ऊर्जा सुरक्षा केवल पर्याप्त तेल भंडार का नाम नहीं है। आपूर्ति के स्रोत, समुद्री मार्ग, एलपीजी अनुबंध, रणनीतिक भंडार और कूटनीतिक विकल्प इन सबका विविधीकरण ही वास्तविक सुरक्षा है। तेहरान और वाशिंगटन कब झुकेंगे, यह भारत तय नहीं कर सकता, लेकिन संकट से कितना प्रभावित होना है, यह काफी हद तक भारत की अपनी तैयारी तय कर सकती है।
