युवा मतदाताओं पर दांव, भाजपा ने तेज की चुनावी तैयारी
दिल्ली में हुए जेन जी आंदोलन के बाद विधानसभा की तीन सीटों पर हुए उप चुनाव में से दो पर भाजपा हार गई। इस हार के लिए भाजपा शीर्ष नेतृत्व ने जेन जी आंदोलन को जिम्मेदार नहीं माना, लेकिन उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में भाजपा के मुख्यमंत्री इस आंदोलन के भविष्य के चुनाव में होने वाले संभावित असर को लेकर फिक्रमंद जरूर नजर आ रहे हैं। यही वजह है कि अब युवाओं को ध्यान में रखकर योजनाएं बनाने पर तेजी से काम शुरू हो गया है।
उधर जेन जी आंदोलन का नेतृत्व करने वाली कॉकरोच जनता पार्टी प्रमुख अभिजीत दीपके फिर से जनता के बीच जाने की तैयारी में हैं। वे भले ही कह रहे हैं कि उनके आंदोलन का उद्देश्य किसी राजनीतिक दल को लाभ पहुंचाने का नहीं है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक यह मानते हैं कि इस आंदोलन का लाभ भाजपा विरोधी दलों को होगा। ऐसे में दीपके का कहीं भी होने वाला आंदोलन जनता के बीच सफल दिखे इसके लिए कांग्रेस, सपा, राजद आदि दलों के युवा कार्यकर्ता पार्टी के झंडा और बैनर के बिना ही इसमें शामिल होंगे और खुद को कॉकरोच बताने से नहीं चूकेंगे।
हालांकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत द्वारा जेन जी और जेन अल्फा के साथ शुरू किया गया संवाद जरूर भाजपा को लाभ पहुंचाएगा, पर कितना यह वक्त बताएगा। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में भाजपा की सरकार है, जबकि पंजाब में आम आदमी पार्टी सत्ता में है। उत्तर प्रदेश, मणिपुर और उत्तराखंड में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने के लिए भाजपा जी तोड़ मेहनत कर रही है। गोवा में भाजपा 2012 से लगातार तीन चुनाव जीत चुकी है। जीत का चौका लगाने के लिए रणनीति बन रही है।
मणिपुर में हुए बहुसंख्यक मैतेई और आदिवासी कुकी- जो समुदाय के बीच हुई हिंसा में 260 से ज्यादा लोग मारे गए थे, जबकि 60 हजार से अधिक लोग बेघर हुए। वैसे तो अब वहां शांति है, लेकिन अक्सर दोनों समुदायों के छोटे- छोटे गुटों में झड़पें हो जाती हैं। इस बार चुनाव में भाजपा के विरोधी दल इस हिंसा को मुद्दा बनाएंगे, जबकि सत्तारूढ़ दल को इसकी काट खोजनी होगी।
बात करें उत्तर प्रदेश की तो 2017 में भाजपा ने 312, उसकी सहयोगी पार्टी अपना दल एस ने नौ और सुभासपा ने चार सीटें जीतीं थीं, जबकि सपा को 47 और उसकी सहयोगी कांग्रेस को सात सीटों से संतोष करना पड़ा था, लेकिन 2022 के चुनाव में सुभासपा सपा के साथ चली गई थी, जबकि भाजपा गठबंधन में निषाद पार्टी शामिल हो गई थी।
भाजपा की सीटें 312 से घटकर 255 हो गई थी, जबकि सहयोगी अपना दल को 12 और निषाद पार्टी को छह सीटें मिलीं थीं। 2023 में सुभासपा फिर से भाजपा के साथ आई तो रालोद भी सपा का साथ छोड़कर भाजपा के कंधे से कंधा मिलाने लगी। भाजपा चाहती है कि सुभासपा, निषाद पार्टी, रालोद, अपना दल 2027 के चुनाव में उसके साथ रहें ताकि जीत की राह आसान हो सके। जातीय समीकरण उसके पक्ष में पूरी तरह से फिट बैठें। हो सकता पार्टी रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भइया को भी अपने गठबंधन में शामिल कर ले।
भाजपा के रणनीतिकारों को पता है कि कॉकरोच पार्टी के आंदोलन के बाद युवा अब अपना नफा नुकसान देखकर ही मतदान करेंगे। ऐसे में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पूरी तरह से युवाओं पर फोकस किया है। सरकार की कोशिश है कि विभिन्न रोजगार परक योजनाओं का लाभ युवाओं को आसानी से मिले ताकि उन्हें भटकना न पड़े। मुख्यमंत्री ने राज्य के तमाम जिलों का दौरा कर लिया है। जहां-जहां सभाएं हुईं वहां विभिन्न विकास कार्यों का लोकापर्ण और शिलान्यास भी उन्होंने किया।
अब यूथ अड्डा के जरिए युवाओं को रिझाने पर उनका फोकस है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन से उनकी मुलाकात भी चुनावी रणनीति का हिस्सा है। छात्रों को शुल्क प्रतिपूर्ति और छात्रवृत्ति के लिए न भटकना पड़े इसके लिए बड़े पैमाने पर कवायद चल रही है। युवाओं के लिए कुछ लोक लुभावन योजनाओं की घोषणा सरकार जल्द ही कर सकती है।
हालांकि चुनाव में सरकार कानून व्यवस्था और विकास के मुद्दे पर ही जनता के बीच जाएगी पर वह युवाओं को अपने साथ रखने के लिए जल्द ही संघ और उसके अनुसांगिक संगठनों के जरिए भी पैठ बनाने की कोशिश करेगी। संघ प्रमुख द्वारा युवाओं के बीच दिया गया संदेश भाजपा के लिए सिर्फ यूपी ही नहीं, बल्कि अन्य राज्यों में भी सकारात्मक संदेश लेकर आया है। यूपी में सपा का कांग्रेस से गठबंधन तो तय है, लेकिन देखना यह है कि बसपा किस पाले में जाती है, जबकि पंजाब में भाजपा का शिरोमणि अकाली दल बाद से गठबंधन होने की उम्मीद है।
कांग्रेस मानकर चल रही है कि वह बिना किसी गठजोड़ के ही आम आदमी पार्टी को सत्ता से बाहर कर देगी, इसलिए वह अभी किसी से गठजोड़ के बारे में सोच भी नहीं रही है, जबकि आम आदमी पार्टी युवाओं के मुद्दे को धार देकर भाजपा को घेर रही है। भाजपा वैसे तो पंजाब में कमजोर ही रही है। ऐसे में वह अकाली दल को यहां बड़े भाई का दर्जा दे सकती है।
रही बात गोवा की तो यहां भाजपा के मुकाबले कांग्रेस और आम आदमी पार्टी आएगी। यदि यहां इनका गठजोड़ होता है, तो भाजपा के लिए मुश्किल हो सकती है, पर गठजोड़ की उम्मीद बहुत नहीं की जा सकती है। क्योंकि पंजाब का चुनाव भी इसी के साथ होना है और वहां कांग्रेस को लगता है कि वह आप को हराकर सरकार बना लेगी, जबकि उत्तराखंड में कांग्रेस और भाजपा के बीच ही जंग होगी। दो बार से सत्ता के सुख से वंचित कांग्रेस किसी भी स्थिति में युवाओं को अपने साथ लाने की कोशिश कर रही है तो भाजपा कांग्रेस की मंशा कामयाब न हो इस रणनीति पर युवाओं के लिए योजना बनाने में जुट गई है।
