प्रसंगवश : प्रकृति की चेतावनी है असम की बाढ़

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डॉ. मोनिका शर्मा,
वरिष्ठ पत्रकार

देश के विभिन्न हिस्सों में हो रही अतिवृष्टि, विनाशकारी बाढ़ और जानलेवा भूस्खलन की घटनाएं बढ़ी हैं, जो इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि देश एक गंभीर पर्यावरणीय संकट से गुजर रहा है। इस साल एक बार फिर असम भी भयावह बाढ़ की चपेट में है, जहां मरने वालों का आंकड़ा करीब सौ के करीब तक पहुंच गया है और लाखों लोग विस्थापित हुए हैं। यह संकट केवल एक राज्य की प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि बदलते वैश्विक पर्यावरण और मानवीय भूलों का एक साझा संकेत है, जो बार-बार प्रकृति की पूरे देश को दी जा रही एक गंभीर चेतावनी बन रहा है।

हाल के वर्षों में भारत ने साल के लगभग 99 फीसदी दिनों में किसी न किसी कोने में चरम मौसम का सामना किया है। यदि हमने प्रकृति की इस चेतावनी को अब भी अनसुना किया और विकास की अंधी दौड़ में नदियों, जंगलों और पहाड़ों के प्राकृतिक संतुलन को नष्ट करना जारी रखा, तो वह समय दूर नहीं जब देश के अन्य हिस्सों को भी इसी तरह की विभीषिका का सामना करना पड़ेगा।

राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के अनुसार, 1954 से असम में लगातार हर साल बाढ़ का संकट देखा जा रहा है, जिसमें 2020, 2022 और वर्तमान वर्ष 2026 की बाढ़ सबसे विनाशकारी रही है। वर्ष 2020 में राज्य के 33 में से 30 जिले प्रभावित हुए। लगभग 50 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए और 120 से ज्यादा लोगों की जान गई। वर्ष 2022 में 35 में से 32 जिले और 5,500 से अधिक गांव डूबे।

करीब 55 लाख लोग प्रभावित हुए और बड़े पैमाने पर कृषि भूमि नष्ट हुई। वर्ष 2026 में अत्यधिक बारिश और ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में बादल फटने से आई बाढ़ के कारण अब तक अनुमानित सौ से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। लाखों लोग प्रभावित हुए हैं तथा कई जिले हाई अलर्ट पर हैं। असम की बाढ़ पूरे देश के लिए सबक है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए अंतर्राज्यीय और समग्र नीति का होना कितना जरूरी है।

ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, भारत जलवायु खतरों से प्रभावित होने वाले शीर्ष देशों में शामिल है। इन आपदाओं के कारण आर्थिक और सामाजिक मोर्चे पर भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। इसमें पहला है कृषि पर संकट, जहां लाखों हेक्टेयर फसलें पानी में डूब जाती हैं, जिससे खाद्य सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया है। दूसरा है जीडीपी को झटका, जिसमें बुनियादी ढांचे (सड़कें, पुल, बिजली नेटवर्क) के नष्ट होने से देश को अरबों डॉलर का वित्तीय नुकसान हो रहा है। तीसरा है गरीबी और पलायन। इस तबाही का सबसे पहला और गहरा असर समाज के गरीब, दैनिक वेतन भोगी और हाशिए के लोगों पर पड़ता है, जिन्हें अपनी आजीविका खोकर विस्थापित होना पड़ता है। 

हालिया परिदृश्य के बाद अब यह समय केवल आपदा के बाद राहत और बचाव कार्य तक सीमित रहने का नहीं है, बल्कि ठोस नीतिगत बदलाव करने का है। इसके तहत भारत मौसम विज्ञान विभाग को सटीक पूर्वानुमान प्रणाली अपनाते हुए अत्याधुनिक रडार और एआई-संचालित मौसम मॉडलों से लैस करना होगा ताकि क्लाउडबर्स्ट और फ्लैश फ्लड जैसी घटनाओं की समय रहते सटीक चेतावनी मिल सके।

बाढ़, अतिवृष्टि और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाएं कोई आकस्मिक घटनाएं नहीं हैं, बल्कि यह प्रकृति द्वारा दिया जा रहा रेड अलर्ट है। यदि हमने विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना नहीं सीखा, तो प्रगति की यह इमारत जल्द ही ढह सकती है। अब समय आ गया है कि हम प्रकृति पर विजय पाने की जिद छोड़कर प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व के सिद्धांत को अपनाएं। (ये लेखिका के निजी विचार हैं)

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