हिमालय से ध्रुव तक गहरा रहा संकट, आखिर कब जागेंगे हम
आप अपने शहर के बाजार में दुपहिया वाहन चलाते समय या पैदल चलते समय प्रदूषण से बचने के लिए मास्क लगा लेते हैं। जैसे, यह कुछ दूरी तय करने के दौरान सीमित समय में प्रदूषण से बचने के लिए थोड़ा बहुत कारगर हो सकता है। वैसे ही, हम प्रकृति से खिलवाड़ करना बंद नहीं कर सकते तो कम से कम उसे सुरक्षित रखने के लिए इस खिलवाड़ को सीमित समय के लिए कम करने की शुरुआत तो कर सकते हैं, क्योंकि अब संकट हिमालय से ध्रुव तक बढ़ चुका है।
सुपर अलनीनो में तब्दील होने जा रहा अलनीनो बदलती जलवायु को हवा देगा। वैज्ञानिक कह रहे हैं कि सुपर अलनीनो संवेदनशील हिमालय के साथ बर्फीले ध्रुवीय प्रदेशों को अधिक प्रभावित करेगा तो वैश्विक तापमान की आग में घी का काम करेगा। हवा और जहरीली हो जाएगी और हीट वेब बाढ़ जैसी मौसमी आपदाओं को बढ़ावा देने में जिम्मेदार होगा। सवाल यही है कि आखिर हम जागेंगे कब? दरअसल, देश-दुनिया में ग्रीन हाउस गैसों पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। इन जहरीली गैसों का उत्सर्जन विकासशील देश हद से अधिक कर रहे हैं, जिसके चलते वैश्विक तापमान में निरंतर वृद्धि दर्ज की जा रही है, जो 1.5 डिग्री सेल्सियस पार कर चुका है, जिस कारण इस वर्ष यूरोप जैसे ठंडी जलवायु वाले देशों को गर्म हवाओं के थपेड़े झेलने पड़े हैं।
ग्लेशियरों के निरंतर पिघलने से पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर संकट मंडराने लगा है, तो आर्कटिक के बर्फ पिघलने से समुद्र का बढ़ता जल स्तर कुछ और ही खतरे का संकेत दे रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन को लेकर पिछले ढाई दशक से आगाह करते आ रहे हैं, लेकिन इसकी गंभीरता को समझ पाने में लोग और हमारे नीति निर्धारक अभी भी कोसों दूर है। बहरहाल हालिया मौसम में बदलावों में वर्षा का पैटर्न है। इन दिनों मानसून की बारिश हो रही है, जिसकी दिशा बदली हुई नजर आ रहीं है, जो सूखे रहने वाले स्थानों में पानी बरसाने लगा है और अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में कम बरसने लगा है। इस बार के मानसून में एक बड़ा बदलाव खंड वृष्टि के रूप में देखने मिल रही है। मानसून के बड़े बादल सिकुड़ने लगे है, जो खंडित होकर छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटने लगे हैं। मानसून का ऐसा स्वरूप पहली बार देखा गया है, जो भविष्य में अधिक बदलाव लेकर आएगा, इस अपेक्षा से इंकार नहीं किया जा सकता है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन की अभी तक जितनी भी रिपोर्ट आई हैं, अधिकांश चेताने वाली रही हैं। बहरहाल तापमान बढ़ने से सागर गरमाने लगे हैं, जिस कारण समुद्री जीव-जंतुओं के जीवन तक पर खतरा मंडराने लगा है, तो बढ़ते तापमान से पर्वतीय क्षेत्रों की वनस्पतियों का पलायन बढ़ेगा। कृषि क्षेत्र व्यापक पैमाने में प्रभावित होगा और उत्पादन में कमी आएगी। इसके साथ ही स्वास्थ्य की समस्याएं बढ़ेंगी। कई तरह की नई बीमारियां जन्म लेंगी। इस बारे में वैज्ञानिक काफी चिंतित हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि प्रकृति एक बार फिर चेतावनी दे रही है। प्रशांत महासागर में पनप रहा अलनीनो अब सुपर अलनीनो का रूप लेने जा रहा है और इस बार इसका असर सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं रहेगा। ये सीधे बदलती जलवायु की रफ्तार को दोगुना कर देगा। यह सुपर अलनीनो सबसे ज्यादा हिमालय और बर्फीले ध्रुवीय क्षेत्रों को हिलाकर रख देगा। साथ ही ये वैश्विक तापमान की आग में घी का काम करेगा।
नैनीताल स्थित आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (एरीज) के वरिष्ठ पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ. नरेंद्र सिंह भी कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन को हल्के में लेना बड़ी भूल होगी। इसके लिए ग्रीन हाउस गैसों में कमी लाने के लिए सार्थक प्रयास किए जाने की सख्त जरूरत है। नीति निर्धारको को जलवायु को लेकर ठोस उपाय किए जाने होंगे। विकास की दिशा में वैज्ञानिक उपाय तलाशने होंगे। समय अब काफी कम है और हमें सीमित समय में प्रयासों की लंबी दूरी करनी होगी। ग्रीन हाउस गैसों को कम करने के लिए सख्त और सार्थक नीतियां तुरंत लागू करनी होंगी। विकास का मतलब केवल सिर्फ कंक्रीट नहीं, हमें वैज्ञानिक और टिकाऊ उपाय अपनाने होंगे।
जलवायु परिवर्तन को अब सरकारी मुद्दा नहीं, बल्कि घर-घर का मुद्दा बनाना होगा, क्योंकि एक बेहतर और आदर्श समाज की शुरुआत घर परिवार से ही होती है। यह बात समझनी जरूरी होगी कि सुपर अलनीनो कोई आपदा नहीं है। ये तो केवल एक आईना है। ये दिखा रहा है कि हमने प्रकृति से कितनी छेड़छाड़ की है। हरे-भरे जंगलों को पेड़ काटकर कंक्रीट के जंगल में बदल दिया। हालांकि हिमालयी राज्य उत्तराखंड इस वैश्विक संकट से निपटने में बड़ी भूमिका निभा सकता है। हाल ही में उत्तराखंड सरकार ने कुछ ऐसे निर्णय लिए हैं, जो प्रकृति की रक्षा में सुखद साबित हो सकते हैं।
हमें समझना होगा कि इकोलॉजी और इकोनॉमी को मिलाकर जलवायु संकट का हल निकल सकता है। विकास भी हो और पेड़ भी बचें। यही असली विकसित भारत का मॉडल है। सुपर अलनीनो और बदलता मानसून बता रहे हैं कि अब पहले कमाओ फिर बचाओ वाला फॉर्मूला नहीं चलेगा। अब दोनों साथ-साथ चलने होंगे। यह समन्वय इसलिए भी जरूरी है कि अगर सिर्फ इकोलॉजी देखेंगे, तो विकास रुकेगा और अगर सिर्फ इकोनॉमी देखेंगे, तो 10 साल बाद रहने लायक धरती नहीं बचेगी। इसलिए हमें चाहिए ग्रीन इकानॉमी, जिसमें जिसमें हर 1 रुपए के विकास के साथ 1 पेड़ भी जुड़े।
जलवायु परिवर्तन को हल्के में लेना बड़ी भूल होगी। हमें विकास या पर्यावरण नहीं चुनना, बल्कि विकास के साथ पर्यावरण चुनना है। फॉर्मूला सिंपल है, इसलिए हर प्रोजेक्ट से पूछना होगा कि इससे कितनी जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) बढ़ेगी और कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) कितना घटेगा। अगर दोनों का जवाब ‘हां’ है, तो वही असली विकास है। ध्यान रखें कि हिमालय रो रहा है, ध्रुव पिघल रहे हैं, मानसून भटक गया है। अगर अब भी नहीं चेते, तो अगली खबर आपदा की नहीं, विनाश की होगी।
