संपादकीय : सवालों से सशक्त युवा
संपादकीय: सवालों से सशक्त युवा, आईआईटी दिल्ली में पीएम मोदी के संबोधन के क्या हैं मायने?
आईआईटी दिल्ली के दीक्षांत समारोह में पीएम मोदी ने युवाओं से संवाद कर प्रश्न पूछने और नवाचार का संदेश दिया। पढ़ें अमृत विचार का खास संपादकीय।
आईआईटी दिल्ली के 57 वें दीक्षांत समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का युवाओं से संवाद इसलिए महत्वपूर्ण है कि उन्होंने उन्हें केवल नौकरी पाने वाले तकनीकी स्नातकों के रूप में नहीं, बल्कि तेजी से बदलती दुनिया के निर्माता के रूप में संबोधित किया। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम कंप्यूटिंग, डेटा सेंटर, महत्वपूर्ण खनिज और गहरे समुद्र जैसे क्षेत्रों का उल्लेख करते हुए, उन्होंने साफ संकेत दिया कि आने वाली अर्थव्यवस्था में वही समाज आगे रहेगा, जो नई तकनीक को अपनाने के साथ स्वयं नए ज्ञान का सृजन करेगा। डिग्रीधारियों के बीच यह बात बहुत दूरदर्शितापूर्ण है कि शिक्षा डिग्री मिलने के साथ समाप्त नहीं होना चाहिए। बदलती तकनीक में आज का ज्ञान कल अप्रासंगिक हो सकता है। इसलिए जिज्ञासा, निरंतर सीखने और परिवर्तन के अनुरूप स्वयं को ढालने की क्षमता ही वास्तविक पूंजी है।
आईआईटी जैसे संस्थान के छात्रों के लिए यह संदेश विशेष रूप से प्रासंगिक है, क्योंकि उनसे अपेक्षा केवल व्यक्तिगत सफलता की नहीं, बल्कि भारत की वैज्ञानिक और औद्योगिक क्षमता को नई ऊंचाई देने की भी है। सबसे महत्वपूर्ण बात सवाल पूछने और जिज्ञासा जीवित रखने का आग्रह है। लोकतंत्र और ज्ञान-विज्ञान दोनों की बुनियाद प्रश्न है। विज्ञान में कोई स्थापित धारणा अंतिम नहीं होती और लोकतंत्र में कोई सत्ता सवालों से ऊपर नहीं हो सकती। इसलिए प्रधानमंत्री का युवाओं से प्रश्न करने, जिज्ञासु बने रहने और चुनौतियों में अवसर खोजने का आह्वान अपने आप में सकारात्मक है। सार्वजनिक जीवन में अक्सर शिकायत रहती है कि सरकारों और संस्थाओं को असुविधाजनक सवाल पसंद नहीं आते। ऐसी धारणा के बीच उनका युवाओं को प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करना तभी सार्थक माना जाएगा, जब यह आग्रह केवल वैज्ञानिक जिज्ञासा तक सीमित न रहे, बल्कि सार्वजनिक नीति, शिक्षा, रोजगार, सामाजिक असमानता और शासन से जुड़े कठिन सवालों पर भी लागू हो। प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ तभी है, जब प्रश्नकर्ता को असहमति के बावजूद सम्मान मिले।
दीक्षांत समारोह का भाषण युवाओं, तकनीक और बदलते राजनीतिक-सामाजिक मानस के बीच एक व्यापक संदेश है, पर इसका राजनीतिक आयाम भी है। 2027 में उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर, गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। चुनावी राजनीति में युवा मतदाता निर्णायक समूह बन रहे हैं। निर्वाचन आयोग के आंकड़े भी 18-29 आयु वर्ग की बड़ी हिस्सेदारी दिखाते हैं। अतः युवाओं से संवाद का राजनीतिक महत्व स्वाभाविक है। युवा इस संदेश को राजनीतिक चश्मे से देखें या सकारात्मक प्रेरणा के रूप में, यह उनके विवेक पर निर्भर करेगा, लेकिन यह मानना भूल होगी कि आज का युवा केवल राजनीतिक भाषण से प्रभावित हो जाता है। हाल के युवा आंदोलनों ने दिखाया है कि रोजगार, परीक्षा की विश्वसनीयता, शिक्षा और अवसर जैसे वास्तविक प्रश्न नई पीढ़ी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इसे केवल चुनावी आकर्षण कहना प्रधानमंत्री के संदेश को छोटा करना होगा। यदि युवा सचमुच प्रश्न पूछें, लगातार सीखें, वैज्ञानिक दृष्टि अपनाएं, नवाचार करें और देश की समस्याओं को अपने अवसरों में बदलें, तो परिवर्तन केवल सरकार नहीं, समाज के भीतर से आएगा। यही इस संबोधन का सबसे दूरगामी अर्थ है- युवा केवल भविष्य के मतदाता नहीं, वर्तमान के निर्माता हैं।
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