भारत की कूटनीति के सामने विफल है नई सैन्य धुरी
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच एक नए त्रिपक्षीय रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं। इस ऐतिहासिक सैन्य गठबंधन की सबसे बड़ी और संवेदनशील शर्त यह है कि किसी भी एक देश पर होने वाले हमले को तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। वैश्विक मंच पर इस समझौते का मुख्य कारण खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका की सुरक्षा क्षमता पर उठ रहे सवाल और इजरायल से बढ़ता खतरा बताया जा रहा है। रक्षा विश्लेषकों का दावा है कि अमेरिका-ईरान तनाव के दौरान खाड़ी क्षेत्र में स्थित सत्ताईस अमेरिकी सैन्य ठिकानों में से सत्रह को भारी नुकसान पहुंचा था, जिससे सहयोगी देशों का अमेरिका पर से भरोसा डिग गया।
आने वाले समय में कतर और कुवैत भी इस गुट में शामिल हो सकते हैं। तुर्किये की मौजूदगी के कारण इस गठबंधन की गूंज यूरोप तक सुनाई दे रही है। इस समझौते के बाद भारत के कड़े रुख से भयभीत पाकिस्तान को कुछ राहत मिलने की उम्मीद जगी होगी। यही कारण है कि पाकिस्तानी सैन्य अधिकारी खुलेआम इस ‘सामूहिक रक्षा’ के प्रावधान को भारत के खिलाफ एक रणनीतिक कवच के रूप में प्रचारित कर रहे हैं।
पाकिस्तान के रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में भारत के साथ किसी भी संभावित सैन्य टकराव या सीमा पर संघर्ष (जैसे सर्जिकल स्ट्राइक) की स्थिति में यह त्रिपक्षीय समझौता पाकिस्तान के लिए एक ‘निवारक’ के रूप में काम करेगा। पाकिस्तान को यह मुगालता हो सकता है कि संकट के समय उसे दो बड़ी मुस्लिम सैन्य शक्तियों का सीधा बैकअप मिलेगा, जिससे सीमा पर उसकी छद्म युद्ध की आक्रामकता और बढ़ सकती है।
तुर्किये लंबे समय से कश्मीर मुद्दे पर वैश्विक मंचों पर पाकिस्तान का अंधा समर्थन करता रहा है। इस रक्षा समझौते के बाद दोनों देशों के बीच अत्याधुनिक सैन्य साजो-सामान और ड्रोन तकनीक का आदान-प्रदान तेजी से बढ़ेगा। यह उन्नत तकनीक यदि नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तानी सेना के हाथ लगती है, तो भारतीय सेना के लिए सुरक्षा चुनौतियां बढ़ सकती हैं, लेकिन भारतीय रक्षा तंत्र इन सभी खतरों से निपटने में पहले से ही पूरी तरह सक्षम है।
पिछले एक दशक में भारत और सऊदी अरब के संबंधों में ऐतिहासिक सुधार हुआ है। व्यापार, आतंकवाद-निरोध और ऊर्जा सुरक्षा के मामले में रियाद भारत का एक बड़ा रणनीतिक साझेदार बन चुका है। ऐसे में सऊदी अरब का पाकिस्तान और भारत-विरोधी तुर्किये के साथ इस तरह के सैन्य गुट में शामिल होना भारत की उस कूटनीतिक सफलता के लिए एक बड़ी परीक्षा है, जिसके तहत भारत ने खाड़ी देशों को पाकिस्तान के पारंपरिक प्रभाव से दूर कर दिया था। यह नया त्रिपक्षीय गुट आने वाले दिनों में संयुक्त राष्ट्र और इस्लामिक सहयोग संगठन जैसे वैश्विक मंचों पर कश्मीर मुद्दे को अधिक आक्रामक और संगठित तरीके से उठा सकता है, जिससे भारत पर अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक दबाव बनाने की कोशिश की जाएगी।
इस रणनीतिक घेराबंदी को तोड़ने के लिए नई दिल्ली को एक बेहद चतुर, आक्रामक और बहुआयामी विदेश नीति अपनानी होगी। भारत को सऊदी अरब के साथ अपने संबंधों को ‘संबंध-विच्छेद’ नीति के तहत चलाना होगा। भारत रियाद को यह साफ संदेश दे सकता है कि भारत का विशाल बाजार और कच्चे तेल की भारी खरीद सऊदी अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। अपने इसी आर्थिक प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए भारत, सऊदी अरब को इस बात के लिए प्रतिबद्ध कर सकता है कि इस त्रिपक्षीय रक्षा समझौते का कोई भी हिस्सा या सैन्य सहयोग भारत की संप्रभुता और सुरक्षा हितों के खिलाफ इस्तेमाल नहीं होना चाहिए।
दूसरी ओर, पश्चिम एशिया में अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात और इजरायल के साथ मिलकर बने ‘पश्चिम एशियाई चतुष्कोणीय आर्थिक मंच’ को भारत और अधिक सक्रिय कर सकता है। संयुक्त अरब अमीरात के साथ भारत के संबंध मौजूदा समय में अपने स्वर्णिम दौर में हैं और संयुक्त अरब अमीरात के सऊदी अरब और तुर्किये दोनों के साथ गहरे रणनीतिक मतभेद और प्रतिस्पर्धा रही है। ऐसे में भारत की पूरी कोशिश होगी कि संयुक्त अरब अमीरात और ओमान जैसे खाड़ी के मित्र देशों के जरिए इस नए त्रिपक्षीय गुट के प्रभाव को क्षेत्र में ही संतुलित कर दिया जाए।
सैन्य मोर्चे पर, पाकिस्तान को तुर्किये से मिलने वाले संभावित ड्रोन और मिसाइल खतरों से निपटने के लिए भारतीय सेना अपनी सीमाओं पर ‘ड्रोन-रोधी प्रणाली’, उन्नत रडार नेटवर्क और आधुनिक वायु रक्षा प्रणालियों की तैनाती को और मजबूत कर सकती है। भारत अपनी सैन्य तैयारियों को हमेशा इस सर्वोच्च स्तर पर रखेगा कि वह चीन और पाकिस्तान के किसी भी संयुक्त या समर्थित दुस्साहस का पलक झपकते ही करारा जवाब दे सके।
तुर्किये के भारत विरोधी रवैये को शांत करने के लिए भारत को अब ‘जैसे को तैसा’ वाली कूटनीति अपनानी होगी। भारत को तुर्किये के पारंपरिक भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों जैसे ग्रीस, साइप्रस और आर्मेनिया के साथ अपने रक्षा, रणनीतिक और राजनीतिक संबंधों को बेहद आक्रामक तरीके से बढ़ाना चाहिए। जब अंकारा को अपनी सीमाओं के पास भारत की सैन्य और कूटनीतिक मौजूदगी का अहसास होगा, तो वह भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने से पहले सौ बार सोचेगा।
कुल मिलाकर, पाक-सऊदी-तुर्किये का यह नया सैन्य गठबंधन भारत जैसी परमाणु संपन्न वैश्विक महाशक्ति के सामने पूरी तरह बौना और विफल साबित होगा। यह नया भारत है, जो ऐसे किसी भी खोखले गठबंधन के दबाव में आने वाला नहीं है। भारतीय सेनाएं देश विरोधी किसी भी दुस्साहस का ‘ईंट का जवाब पत्थर से’ देने के लिए चौबीसों घंटे तैयार हैं। आज का भारत न केवल अपनी संप्रभुता की रक्षा करना जानता है, बल्कि जरूरत पड़ने पर राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए दुश्मनों के घर में घुसकर कार्रवाई करने में भी पूरी तरह सक्षम है।
