क्या जेन-जी को राहुल की ‘क्लास भा गई’!
आखिर ऐसा क्या बदला कि छात्रों, युवाओं और जेन-जी के एक हिस्से को राहुल गांधी की बातचीत, सवाल-जवाब और शिक्षा-केंद्रित राजनीति आकर्षित करने लगी है? राजनीति में पीढ़ियों का बदलाव केवल नेताओं की उम्र बदलने से नहीं आता। बदलाव तब आता है, जब नई पीढ़ी राजनीति की भाषा, मुद्दों और संवाद की शैली बदल देती है। भारत की जेन-जी इसी बदलाव का प्रतिनिधित्व करती है।
इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल तकनीक के माहौल में पली यह पीढ़ी लंबे भाषणों से अधिक सीधे जवाब चाहती है। उसे नारों से अधिक तथ्य और आश्वासनों से अधिक परिणाम चाहिए। शिक्षा महंगी क्यों है? रोजगार के अवसर सीमित क्यों हैं? प्रतियोगी परीक्षाओं में विवाद क्यों होते हैं? भर्ती प्रक्रिया वर्षों तक क्यों चलती है? ये सवाल आज युवाओं की प्राथमिकता हैं।
राहुल गांधी ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी राजनीतिक शैली बदलने का प्रयास किया है। वे केवल मंच से भाषण देने वाले नेता की भूमिका में नहीं रहना चाहते। कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, छात्रों, युवाओं और सामाजिक समूहों के साथ संवाद उनकी राजनीति का हिस्सा बना है। युवाओं के बीच बैठकर सवाल सुनना और जवाब देना शायद उनकी ‘क्लास वाली राजनीति’ को जेन-जी के एक हिस्से के करीब ला रहा है।
हालांकि यह मान लेना कि पूरी जेन-जी राहुल गांधी के साथ खड़ी हो गई है, राजनीतिक अतिशयोक्ति होगी। भारत का युवा किसी एक दल की संपत्ति नहीं है। वह भाजपा, कांग्रेस, क्षेत्रीय दलों या किसी भी दल का समर्थन कर सकता है और जरूरत पड़ने पर किसी से भी सवाल कर सकता है। सोशल मीडिया की दृश्यता को सीधे चुनावी समर्थन मान लेना भी उचित नहीं होगा।
राहुल गांधी की सार्वजनिक छवि में बदलाव भी महत्वपूर्ण है। लंबे समय तक उनके विरोधियों ने उन्हें गंभीरता से न लेने वाली छवि में बांधने का प्रयास किया, लेकिन यात्राओं, छात्र संवादों और युवाओं के बीच प्रत्यक्ष बातचीत के जरिए उन्होंने स्वयं को ‘सवाल पूछने वाले नेता’ के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की है। इसकी वास्तविक सफलता का फैसला चुनाव करेंगे। युवाओं के सामने सबसे बड़ी परीक्षा रोजगार की है। इन सवालों का जवाब सत्ता और विपक्ष दोनों को देना होगा।
आज की जेन-जी किसी नेता की स्थायी अनुयायी नहीं बनना चाहती। वह सवाल पूछती है, तुलना करती है, आंकड़े खोजती है और जरूरत पड़ने पर अपनी राय बदलती है। इसलिए राहुल गांधी की ‘क्लास’ तभी सार्थक होगी, जब वह युवाओं को समर्थक बनाने के बजाय सवाल पूछने वाला नागरिक बनाए। राजनीति की अंतिम परीक्षा संवाद में नहीं, परिणाम में होती है। रोजगार, शिक्षा, परीक्षा व्यवस्था, उद्यमिता, तकनीक और एआई के दौर की नौकरियों पर ठोस जवाब ही किसी ‘क्लास’ को राजनीतिक बदलाव में बदल सकते हैं।
क्योंकि जनता तालियों से अधिक रिपोर्ट कार्ड देखती है। इसलिए मूल सवाल यह नहीं कि जेन-जी को राहुल गांधी की ‘क्लास’ भा गई या नहीं। बड़ा सवाल यह है कि क्या भारतीय राजनीति ने समझना शुरू किया है कि युवा केवल वोट बैंक नहीं, बल्कि देश का भविष्य है? लोकतंत्र की सबसे अच्छी स्थिति यह नहीं कि युवा किसी नेता की बात आंख बंद करके माने, बल्कि यह है कि वह हर नेता से सवाल पूछे-‘आपने कहा बहुत कुछ, अब बताइए, करेंगे क्या?’ यही सवाल किसी भी नेता की असली ‘क्लास’ और लोकतंत्र की असली परीक्षा है। (ये लेखक के निजी विचार हैं)
