देवाधिदेव महादेव
श्रावण मास भगवान शिव की उपासना का सर्वाधिक पवित्र समय माना जाता है। मान्यता है कि इस महीने में भोलेनाथ अपने भक्तों पर विशेष कृपा बरसाते हैं। बिल्वपत्र, धतूरा, गंगाजल तथा बालू के शिवलिंग का पूजन उन्हें अत्यंत प्रिय है। श्रद्धापूर्वक जलाभिषेक और ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जप करने से शिव शीघ्र प्रसन्न होकर भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।
भगवान शिव आदि-अनादि और अनंत हैं। वे केवल संहार के देवता नहीं, बल्कि सृजन और परिवर्तन के भी प्रतीक हैं। उनका अर्धनारीश्वर स्वरूप शिव और शक्ति की अभिन्न एकता का संदेश देता है। वे देव, दानव और मनुष्य सभी पर समान रूप से कृपा करने वाले भोलेनाथ हैं। समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को लोककल्याण के लिए कंठ में धारण कर उन्होंने नीलकंठ का स्वरूप धारण किया, जो त्याग और परोपकार का अनुपम उदाहरण है।
महाकवि कालिदास ने अभिज्ञानशाकुंतलम्, कुमारसंभव और रघुवंश में भगवान शिव को परमब्रह्म, पंचमहाभूतों के अधिष्ठाता तथा समस्त सृष्टि का आधार बताया है। उनके अनुसार शिव मन, बुद्धि और वाणी से भी परे हैं। शिव का नटराज स्वरूप सृष्टि के शाश्वत चक्र का प्रतीक है। डमरू सृजन और ज्ञान के नाद का, अग्नि अधर्म के विनाश का तथा ऊपर उठा चरण आत्मोन्नति का संदेश देता है। उनके चरणों तले दबा अपस्मार अहंकार और अज्ञान पर विजय का प्रतीक है।
श्रावण के प्रत्येक सोमवार को देशभर के शिवालयों में विशेष पूजन, रुद्राभिषेक और जलाभिषेक किया जाता है। उज्जैन के महाकाल, नेपाल के पशुपतिनाथ तथा बारह ज्योतिर्लिंगों में लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। शिव की भक्ति का सार बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि सरलता, संयम, करुणा और समर्पण है। भोलेनाथ अल्प साधना से प्रसन्न होने वाले देव हैं। सच्चे मन से की गई आराधना जीवन में साहस, शांति और कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है। इसलिए श्रावण केवल पूजा का महीना नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, सेवा और आध्यात्मिक जागरण का भी पावन पर्व है।
शिव को क्यों प्रिय हैं बिल्वपत्र और जलाभिषेक
सनातन परंपरा में भगवान शिव की पूजा में बिल्वपत्र और जलाभिषेक का विशेष महत्व बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार बिल्वपत्र शिव को अत्यंत प्रिय है। इसकी तीन पत्तियां भगवान शिव के त्रिनेत्र, त्रिशूल तथा सत्व, रज और तम इन तीनों गुणों का प्रतीक मानी जाती हैं। श्रद्धा और पवित्र भाव से अर्पित किया गया बिल्वपत्र शिव की कृपा प्राप्त करने का सरल माध्यम माना गया है।
इसी प्रकार गंगाजल या शुद्ध जल से किया जाने वाला जलाभिषेक नीलकंठ शिव के उस लोककल्याणकारी स्वरूप की स्मृति दिलाता है, जब उन्होंने समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को अपने कंठ में धारण कर संसार की रक्षा की थी। जलाभिषेक शीतलता, पवित्रता, आत्मसंयम और समर्पण का भी प्रतीक माना जाता है।
श्रावण मास में ‘ॐ नमः शिवाय’ पंचाक्षरी मंत्र का जप करते हुए बिल्वपत्र, धतूरा और जल अर्पित करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता है कि निष्कपट मन, श्रद्धा और संयम के साथ की गई शिव आराधना से मनुष्य के जीवन में सुख, शांति, साहस, सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
