भगोड़ों के लिए अब कोई भूमि सुरक्षित नहीं
मोदी सरकार ने 2018 में ‘भगोड़ा आर्थिक अपराधी बिल’ पेश किया था। तब से भारत ने विदेशों से भगोड़ों के प्रत्यर्पण में एक नया इतिहास रच दिया है। पिछले छह वर्षों में 274 भगोड़ों को विभिन्न देशों से भारत लाया गया है, जो अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है। इनमें से अकेले पिछले दो वर्षों में सबसे अधिक वापसी हुई है। 2025 में 70 भगोड़ों को वापस लाया गया, जबकि जुलाई 2026 तक 45 भगोड़ों की वापसी सुनिश्चित की जा चुकी है। ये आंकड़े साफ बताते हैं कि भारत में अपराध कर विदेश भागने या शरण लेने वालों को देश के कानून के सामने खड़ा करना अब मोदी सरकार की राष्ट्रीय प्राथमिकता बन चुका है।
गृह मंत्रालय की निर्णायक भूमिका: प्रत्यर्पण प्रक्रिया को सक्रिय और प्रभावी बनाने का श्रेय मुख्य रूप से केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को जाता है। विदेशों में छिपे भगोड़ों को भारत लाने में गृह मंत्रालय मुख्य समन्वयक और नोडल एजेंसी है। हर भगोड़े का कानूनी दस्तावेज (डोजियर) तैयार करवाना, विदेशी समकक्षों के साथ दस्तावेजों का आदान-प्रदान करना और प्रत्यर्पण अनुरोध भेजने से पहले सबूतों का आकलन-सत्यापन, यह सब गृह मंत्रालय के जिम्मे है। प्रत्यर्पण का पूरा दारोमदार इन्हीं मजबूत सबूतों और दस्तावेजों पर टिका होता है।
गृह मंत्रालय ने इंटरपोल जैसे वैश्विक नेटवर्क के साथ मिलकर ‘भारतपोल’ प्लेटफॉर्म तैयार किया है। अमित शाह के नेतृत्व में भारत का इंटरपोल से जुड़ाव अब नए वैश्विक सहयोग का प्रतीक बन गया है। पहले केवल सीबीआई ही इंटरपोल से संपर्क रखती थी, लेकिन अब भारतपोल के जरिए राज्य पुलिस और केंद्रीय एजेंसियां सीधे वैश्विक नेटवर्क से जुड़ सकती हैं। इस समय 1,400 से अधिक राज्य और केंद्रीय कानून प्रवर्तन इकाइयां इस प्लेटफॉर्म से जुड़ी हुई हैं। इससे अपराधियों की ट्रैकिंग वास्तविक समय में हो जाती है। तीन से बीस दिनों के अंदर अपराधियों की गतिविधियां प्लेटफॉर्म पर आ जाती हैं और प्रत्यर्पण की कार्रवाई शुरू हो जाती है।
रेड कॉर्नर नोटिस और नई व्यवस्था : गृह मंत्रालय भारत इंटरपोल रेड कॉर्नर नोटिस के जरिए पूरे विश्व को अलर्ट भेज रहा है। अकेले 2026 में 182 भगोड़ों के बारे में नोटिस जारी किए गए। जनवरी 2026 में गृह मंत्रालय ने विदेशों में मौजूद हाई-प्रोफाइल भगोड़ों पर नजर रखने के लिए इंटेलिजेंस ब्यूरो के मल्टी-एजेंसी सेंटर और स्टैंडिंग फोकस ग्रुप की स्थापना कर काम शुरू कर दिया। लक्ष्य स्पष्ट है कि सभी भगोड़ों का प्रत्यर्पण जल्द से जल्द सुनिश्चित करना। पिछले पांच वर्षों में मोदी सरकार ने विभिन्न विदेशी सरकारों को 137 प्रत्यर्पण अनुरोध भेजे, जिनमें से 134 को स्वीकार कर लिया गया। 2019 से अब तक 36 देशों से भगोड़े अपराधियों को भारत लाया जा चुका है।
अमेरिका और यूएई से भी सफल प्रत्यर्पण : पहले माना जाता था कि अमेरिका या ब्रिटेन से वांछितों को लाना लगभग असंभव है, लेकिन मोदी सरकार ने इन देशों से भी सफलता हासिल की। 9 अप्रैल 2025 को अमेरिका से तहव्वुर राणा का प्रत्यर्पण कराया गया। राणा 2008 के मुंबई आतंकी हमलों का मुख्य आरोपी है, जिसने डेविड कोलमैन हेडली के साथ मिलकर हमले की साजिश रची थी। सरकार लगातार अमेरिकी प्रशासन के साथ प्रयास करती रही, जब तक कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फरवरी 2025 में उनके प्रत्यर्पण को मंजूरी नहीं दे दी।
यूएई को भी भगोड़ों के लिए सुरक्षित माना जाता था, लेकिन मजबूत द्विपक्षीय संबंधों के बल पर हाल के वर्षों में कई बड़े अपराधियों को वहां से लाया गया। इस साल तीन बड़े आर्थिक अपराधियों का प्रत्यर्पण हुआ। गणेश ज्वैलरी हाउस के प्रमोटर कमलेश पारेख, जिन्होंने 25 बैंकों के साथ हजारों करोड़ की धोखाधड़ी की थी, को मई 2026 में यूएई से लाया गया। मोहम्मद नवाज कक्कट इस्माइल (जालसाजी और जबरन वसूली का आरोपी) तथा गौरव (हरियाणा में संगठित अपराध सिंडिकेट चलाने वाला) को भी हाल ही में वापस लाया गया। मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपी हर्षित बाबूलाल जैन को डिपोर्ट कराया गया।
पहले और अब: जमीन-आसमान का फर्क : 2014 से पहले भारत की केवल 37 देशों के साथ प्रत्यर्पण संधियां थीं। अब लगभग 60 देशों के साथ समझौते हैं। तब औसतन हर साल केवल चार भगोड़ों का प्रत्यर्पण हो पाता था। अधूरे दस्तावेज और कमजोर पैरवी के कारण विदेशी अदालतें अक्सर अनुरोध ठुकरा देती थीं। 2004 से 2014 तक केवल 62 भगोड़ों का प्रत्यर्पण हो पाया था, जबकि 121 अर्जियां लंबित थीं। भगोड़ों की 17,874 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त की जा चुकी है। गृह मंत्रालय ने पुरानी निष्क्रिय शैली छोड़कर नई राजनयिक-कानूनी कार्रवाई का सक्रिय मॉडल तैयार कर लिया है। बात ये है कि भगोड़ों के लिए अब दुनिया में कोई सुरक्षित कोना नहीं बचा। भारत का कानून अब हर कोने तक पहुंच रहा है। ( ये लेखक के निजी विचार हैं)
