नए आयाम ले रहे हैं स्वतंत्रता के मायने

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विवेक सक्सेना,
अयोध्या

वर्तमान दौर में स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी शासन या राजनीतिक बंधनों से मुक्ति तक सीमित नहीं है। आज की बदलती सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी वास्तविकताओं के बीच स्वतंत्रता के मायने नए आयाम ले रहे हैं, जहां अभिव्यक्ति की सुरक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता और मानसिक संप्रभुता सबसे बड़े सवाल बनकर उभरे हैं। आज आजादी के मायने बदल गए हैं। अब इसका अर्थ भूख, डर, भेद-भाव और मानसिक संकीर्णता से पार पाना है। असली स्वतंत्रता तब सार्थक होती है, जब समाज के हर अंतिम व्यक्ति को गरिमा और अधिकार के साथ जीने का अवसर मिले।

स्वाधीनता दिवस भारत के लिए दो तरह की अनुभूतियां लेकर आता है। पहला, असंख्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के संघर्ष के कारण 15 अगस्त, 1947 को देश को ब्रिटिश शासन के चंगुल से मुक्ति मिली। इसलिए उन तमाम स्वाधीनता सेनानियों के प्रति मन में अपार श्रद्धा का भाव पैदा होने लगता है, जिनके बलिदानों की वजह से अंग्रेज यहां से गए।

दूसरा, देश को आजादी के साथ बंटवारे का दंश भी झेलना पड़ा, लेकिन आज हम कितने स्वतंत्र हैं? स्वतंत्रता और स्वाधीनता दोनों में एक शब्द समान है ‘स्व’। इसलिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल है, स्वाधीनता के चिंतन में कोई अपने ‘स्व’ को कितने संकुचित या विस्तृत रूप में देखता है। आज विपरीत स्थिति है। सभी के पास एक खंडित ‘स्व’ है, जिसका असर स्वाधीनता की धारणा पर है। स्वाधीनता एक न एक तरह से फिर खतरों से घिरी है। बंधन बढ़े हैं, हस्तक्षेप हो रहे हैं, जिन्हें समझना चाहिए।

आज सूचना और तकनीक की उपलब्धता ने जीवन को आसान किया है, लेकिन डेटा गोपनीयता, डिजिटल निगरानी और एल्गोरिदम के दौर में व्यक्तिगत निजता व डिजिटल स्वतंत्रता पर लगातार नए खतरे मंडरा रहे हैं। बाबासाहेब आंबेडकर ने चेताया था कि आर्थिक और सामाजिक समानता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई वास्तविक अर्थ नहीं है। आज के समय में बेरोजगारी, गरीबी और संसाधनों के असमान वितरण ने आम आदमी की स्वतंत्रता को सीमित किया है। लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर असहमति के स्वरों के लिए जगह का सिमटना और वैचारिक असहजता का माहौल वर्तमान समय में स्वतंत्र चिंतन व संवाद की स्वतंत्रता के समक्ष एक गंभीर परीक्षा है।

युवा पीढ़ी के एक वर्ग में स्वतंत्रता को अनुशासनहीनता या असीमित स्वेच्छाचारिता के रूप में देखने की प्रवृत्ति बढ़ी है, जो सामाजिक ताने-बाने और सामूहिक दायित्वों की उपेक्षा करती है। घृणा के संसारों में, जहां समुदाय सिर्फ अपने हित के बारे में सोचते हैं, स्वतंत्रता का अनुभव नहीं किया जा सकता। इसके लिए ऐसे खुले दिलो-दिमाग की जरूरत है, जिसमें सच की खोज की उत्कंठा हो और ‘आखिरी सच’ जैसी कोई चीज न हो। इसका अर्थ है, प्रश्नशीलता का बने रहना और अपनी बनी-बनाई धारणाओं की जांच-पड़ताल करते रहना, क्योंकि पुरानी मृत धारणाओं की गुलामी भी एक समस्या है।

एक छोटा-सा शब्द है ‘ना’, पर जब यह किसी अन्याय या दमन के समय कहा जाता है, एक असाधारण शब्द हो जाता है। किसी समाज में ‘नहीं’ कहने की स्वाधीनता उस समाज की जीवंतता का चिह्न है, हालांकि किसी भी शिक्षालय में ‘नहीं’ कहने की शिक्षा नहीं दी जाती। इसे नकारात्मकता का चिह्न माना जाता है। अन्याय होता देखकर भी ज्यादातर लोग स्वभाववश चुप रहते हैं। कोई भय से चुप रहता है। कोई दुविधा में होने की वजह से सोचता है, जैसा चल रहा है, चलने दो। कोई सुख में चुप रहता है। खासकर इन दिनों बिल्कुल सामने घटित होते हुए भी बहुतों को समझ में नहीं आता कि क्या सत्य है। 

इस युग में चुप्पी के पीछे ‘समझदारी’ से ज्यादा ‘दुविधा’ और ‘उदासीनता’ है। 21 वीं सदी में स्वाधीनता का अर्थ धूसर होता गया है। अब स्वाधीनता का हर समुदाय के, हर व्यक्ति के अनुसार अपना-अपना अर्थ है, कोई साझी समझ नहीं है। इन दिनों मनुष्य की स्वाधीनता को बाजार कई तरह से प्रभावित कर रहा है। उदाहरण के तौर पर, 
मीडिया को लें। वह अपनी स्वायत्तता खोकर एकरेखीय राजनीतिक-व्यापारिक प्रचार का हथियार बन गया है। उसमें फेक न्यूज और अज्ञानता का प्रचार छाया है। इस प्रकार लोकतंत्र का चौथा खंभा जर्जर है, भले चमक से भरा हो। उसकी नई भूमिका से लोगों की सही खबरें पाने की स्वाधीनता छिनी है।

कॉरपोरेट संस्कृति में श्रमिकों की स्वतंत्रता का अर्थ बदला है। स्वाधीनता अधिक वेतन और सुख-सुविधाओं का पर्याय है, इससे अधिक नहीं। इसके विपरीत करोड़ों आम मनुष्य धार्मिक अंधविश्वास, जाति, प्रांत आदि के संकुचित घेरे में पहले से ज्यादा कैद हैं। उनका जीवन अभाव, दु:ख और निराशाओं से भरा है। ऐसे वंचित हर धर्म, हर जाति, हर देश-प्रांत में हैं। आम लोग अलग ढंग से स्वाधीनता से वंचित होते हैं। उन्हें स्वाधीनता की चिंता नहीं होती। उन्हें राहत चाहिए, कुछ रुपये व चीजें बस।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों को पहचानें और देश के हर आखिरी व्यक्ति तक न्याय, समानता व वास्तविक स्वाधीनता का लाभ पहुंचाएं। गरीब और अमीर के बीच बढ़ती खाई को पाटना आवश्यक है। श्रम और अधिकारों का हनन रुकना चाहिए। सच और झूठ के फर्क को समझना आजादी को बचाए रखने के लिए अनिवार्य है। 

आज भी समाज का एक बड़ा वर्ग गरीबी, बेरोजगारी और सामाजिक भेदभाव के बंधनों में जकड़ा हुआ है। जब तक हर नागरिक खुद को सुरक्षित और समर्थ महसूस नहीं करता, स्वतंत्रता का उत्सव अधूरा है। स्वतंत्रता कोई उपहार में मिली वस्तु नहीं है। यह हर दिन जीने और इसे बनाए रखने की एक सतत प्रक्रिया है। जब तक समाज का कोई भी व्यक्ति लाचार या डरा हुआ है, तब तक हमारी स्वतंत्रता अधूरी है। आजादी का असली अर्थ अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों को निभाना भी है। 

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