नाथ नगरी का तुलसी मठ और रामभक्ति की विरासत

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Edited By Anjali Singh
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अलखनाथ मंदिर के पास स्थित तुलसी मठ आस्था, इतिहास और आध्यात्मिक परंपरा का अनोखा संगम है। मान्यता है कि गोस्वामी तुलसीदास ने यहां तपस्या की और राम भक्ति का संदेश दूर-दूर तक फैलाया। कभी घने जंगलों से घिरा यह क्षेत्र साधु-संतों की तपस्थली रहा, जहां रामगंगा के निकट होने से साधना के लिए अनुकूल वातावरण मिलता था। समय के साथ यह स्थान तुलसी मठ और राम दरबार मंदिर के रूप में बरेली की धार्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। श्रद्धालु यहां आते हैं और इस पावन स्थल पर भक्ति, शांति के साथ आध्यात्मिक विरासत का अनुभव करते हैं। कहा जाता है कि तुलसीदास के आगमन के बाद ही इसे तुलसी मठ की पहचान मिलरी थी।
 
नाथ नगरी बरेली के किला क्षेत्र में स्थित तुलसी मठ का इतिहास बहुत पुराना माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गोस्वामी तुलसीदास ने इस जगह पर तपस्या की और रामभक्ति का संदेश जन-जन तक पहुंचाया। प्राचीन समय में यह पूरा क्षेत्र घने जंगलों और रामगंगा के निकट होने के कारण साधु-संतों की तपोस्थली हुआ करती थी। मठ में प्राचीन शिवालय, श्रीराम दरबार और हनुमानजी के दुर्लभ स्वरूप श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हैं। कई भाषाओं के जानकार महंत नीरज नयन दास के अनुसार,  तुलसी मठ केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि बरेली की सांस्कृतिक पहचान भी है। यह मठ रामचरितमानस की परंपरा, राम दरबार की उपासना, गुरुकुल परंपरा और सामाजिक-धार्मिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा है। नित्य यहां भजन-कीर्तन होता है। दशहरा, गुरुपूर्णिमा और गोवर्धन पूजा जैसे पर्वों पर विशेष आयोजन किए जाते हैं।

एक दूसरे से जुड़े है तुलसी मठ और राम दरबार मंदिर

महंत बताते हैं कि तुलसीदास के आगमन के बाद इस स्थान की पहचान और मजबूत हुई। लगभग 1600 . के आसपास तुलसीदास ने इस स्थान को अपनी साधना स्थली बनाया और यहीं से उनकी भक्ति परंपरा का प्रभाव दूर दूर तक फैला। तुलसी मठ के साथ ही शहर के भीतर स्थित राम दरबार मंदिर का भी विशेष महत्व है। मान्यता के अनुसार यहां भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण के साथ विराजमान हैं। यही कारण है कि तुलसी मठ और राम दरबार मंदिर को एक दूसरे से जुड़ा हुआ माना जाता है। समय के साथ यह पूरा क्षेत्र बरेली की धार्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। मुगल काल से लेकर अंग्रेजी शासनकाल तक बरेली एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है और इसी दौरान यहां कई धार्मिक स्थलों का विकास हुआ। आज तुलसी मठ और राम दरबार मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि बरेली की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत के प्रतीक हैं।

मठ में साधु-संत नित्य करते थे प्रभू राम की पूजा

तुलसी मठ का श्रीराम जन्मभूमि से आध्यात्मिक नाता रहा है। यहां के महंत नीरज नयन दास बताते हैं कि रामानंदीय संप्रदाय के इस प्रमुख और प्राचीन मंदिर में अयोध्या के कनक भवन के स्वरूप में श्रीराम दरबार प्रतिष्ठित है। यहां के पूर्व आचार्यों ने शताब्दियों तक श्रीराम जन्मभूमि की पूजा-अर्चना एवं सेवा प्रमुखता से की है। श्रीराम जन्मभूमि की पूजा पहले तुलसी मठ के अधीन ही थी। यहां से आचार्य और पुजारी बारी-बारी से श्रीराम जन्मभूमि की सेवा में आते-जाते रहते थे। रामानंदीय वैष्णव परंपरा के तहत निर्मोही अखाड़े के वैष्णव पूरी व्यवस्था देखते थे। यहां संचालित गुरुकुल के छात्र देश-विदेश में तुलसी मठ का नाम रोशन कर रहे हैं। वर्ष 1950 तक महंत स्वामी प्रमोदवन बिहारीदास ने इस व्यवस्था का निर्वहन किया। बाद में उन्होंने अयोध्या में निर्मोही अखाड़े के दूसरे संतों को यह व्यवस्था सौंप दी थी। उनके झंडे का निशान और चित्र आज भी तुलसी मठ में है। उसमें हनुमान और सूर्य भगवान विराजमान हैं।

सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल शिवालय

तुलसी मठ में शिवालय सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक है। इसमें इस्लाम का प्रतीक चिह्न (चांद-तारा) विपरीत दिशा में लगवाया गया है, जो आज भी दिखाई देता है। महंत बताते हैं कि नवाब आसिफउद्दौला दोबारा यहां आया था और महात्मा के चरणों में गिरकर रोने लगा। पूछने पर ज्ञात हुआ कि वह भयंकर व्याधि से पीड़ित है। इस पर महात्मा ने उसे श्रीराम नाम सुमिरन करने की सलाह दी। संत की अप्रतिम दिव्यता से अभिभूत नवाब ने यवन होते हुए भी रातभर राम का नाम लिया। इससे उसकी मनोकामना पूर्ण हुई। नवाब ने संत को बहुत कुछ देना चाहा पर उन्होंने अस्वीकार कर दिया। बाद में नवाब की संतान हुई, तो उसने तुलसी मठ को 12 गांवों की जमींदारी सौंपने का आग्रह किया, लेकिन संत ने फिर इसे अस्वीकार कर दिया। नवाब के काफी विनय करने पर उन्होंने शिवालय निर्माण में उसका सहयोग स्वीकार किया था।

तुलसी मठ की प्रमुख बातें

n प्राचीन शिवालय और हनुमानजी का दुर्लभ विग्रह मौजूद यहां

n धार्मिक गतिविधियों के साथ सामाजिक शैक्षिक कार्यक्रम

n गुरुपूर्णिमा, दशहरा और गोवर्धन पूजा पर विशेष आयोजन

n बरेली की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत का प्रमुख केंद्र

 

दिग्विजय मिश्रा, बरेली