बाबा भूतनाथ मंदिर की रहस्यमयी लोकपरंपराएं
लखीमपुर खीरी जिले में छोटी काशी के नाम से विख्यात गोला गोकर्णनाथ शिवभक्ति की उस पावन परंपरा का केंद्र है, जहां सावन माह में आस्था अपने चरम पर दिखाई देती है। प्रसिद्ध गोकर्णनाथ मंदिर के अलावा यहां अनेक प्राचीन शिवालय और सिद्ध स्थल श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। इन्हीं में से एक है बाबा भूतनाथ का अनोखा जुड़वा मंदिर, जो अपनी लोककथाओं, धार्मिक मान्यताओं और रहस्यमयी परंपराओं के कारण विशेष पहचान रखता है।
नगर से लगभग दो किलोमीटर दूर रेलवे लाइन के किनारे वन क्षेत्र से सटा यह मंदिर सावन के दिनों में श्रद्धा का प्रमुख केंद्र बन जाता है। नागपंचमी के बाद पड़ने वाले सोमवार को यहां विशाल मेला आयोजित होता है, जिसमें दूर-दूर से हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। यह मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि क्षेत्र की लोक संस्कृति, लोकविश्वास और सामाजिक परंपराओं का भी जीवंत उत्सव है। बाबा भूतनाथ मंदिर में आने वाले श्रद्धालु एक अनूठी परंपरा निभाते हैं। मंदिर परिसर स्थित प्राचीन कुएं में गिटकी फेंककर "हू-हू" की आवाज लगाई जाती है। मान्यता है कि ऐसा करने से बाबा तक भक्तों की प्रार्थना पहुंचती है। इसके बाद श्रद्धालु आसपास लगी पतावर में अपनी मनोकामना व्यक्त करते हुए गांठ बांधते हैं। जब उनकी इच्छा पूरी हो जाती है तो वे पुनः यहां आकर गांठ खोलते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी लोगों की अटूट आस्था का प्रतीक बनी हुई है। सावन के दिनों में मंदिर परिसर में बंधी हजारों गांठें भक्तों के विश्वास की कहानी कहती नजर आती हैं।
रावण और चरवाहे की लोककथा
बाबा भूतनाथ मंदिर से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा लंकापति रावण और भगवान शिव से संबंधित है। लोकश्रुति के अनुसार, रावण ने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया था। प्रसन्न होकर शिवजी रावण के साथ लंका चलने को तैयार हुए, लेकिन उन्होंने शर्त रखी कि यदि यात्रा के दौरान उन्हें कहीं धरती पर रख दिया गया तो वे वहीं स्थापित हो जाएंगे कहते हैं कि इस स्थान पर पहुंचने पर शिव की माया से रावण को लघुशंका का अनुभव हुआ। उसने पास में पशु चरा रहे एक चरवाहे को अपनी कांवड़ पकड़ाते हुए कहा कि उसे जमीन पर न रखे। इसी बीच शिवजी ने अपना भार इतना बढ़ा दिया कि चरवाहा उसे अधिक देर तक संभाल नहीं सका और कांवड़ धरती पर रख दी। परिणामस्वरूप भगवान शिव यहीं स्थापित हो गए। लौटकर आने पर रावण ने जब यह दृश्य देखा तो वह क्रोधित हो उठा और चरवाहे का पीछा किया। भयभीत चरवाहा पास के कुएं में कूद गया। मान्यता है कि उसी घटना के बाद यह स्थान बाबा भूतनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
संत बाबा भूतनाथ और नाग विद्या की कथा
मंदिर से जुड़ी एक दूसरी किवदंती भी स्थानीय जनमानस में प्रचलित है। इसके अनुसार सरस्वती नदी के तट पर शैव संप्रदाय के सिद्ध संत बाबा भूतनाथ का आश्रम था। बाबा सर्प विद्या के अद्भुत ज्ञाता माने जाते थे और उनके आश्रम में अनेक प्रजातियों के नाग और सर्प विचरण करते थे। लोकमान्यता है कि महाभारत काल में महाराजा परीक्षित के पुत्र जन्मेजय द्वारा देवकली तीर्थ में आयोजित नाग यज्ञ के दौरान बाबा भूतनाथ ने अपनी सर्प विद्या का प्रभाव दिखाया था। नागपंचमी के अवसर पर उनके आश्रम में विशाल मेला लगता था, जिसमें हजारों श्रद्धालु जुटते थे। बाबा के पंचतत्व में विलीन होने के बाद यह मेला नागपंचमी के बाद पड़ने वाले सोमवार को आयोजित होने लगा। शिव के अनन्य भक्त बाबा भूतनाथ की स्मृति में स्थापित शिवलिंग आज भी उनके नाम से पूजी जाती है और श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनी हुई है।
जुड़वा शिव मंदिर की अनोखी पहचान
बाबा भूतनाथ मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसका जुड़वा स्वरूप है। स्थानीय लोगों का दावा है कि इस प्रकार का जुड़वा शिव मंदिर देश में विरले ही देखने को मिलता है। मंदिर परिसर के निकट स्थित प्राचीन कुआं भी श्रद्धालुओं के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना स्वयं मंदिर। सावन के महीने में यहां का वातावरण शिवमय हो उठता है। हर-हर महादेव के जयघोष, घंटों की ध्वनि, श्रद्धालुओं की भीड़ और लोकविश्वासों से जुड़ी परंपराएं इस स्थान को एक अद्भुत आध्यात्मिक पहचान प्रदान करती हैं।
आस्था और लोकसंस्कृति का संगम
बाबा भूतनाथ मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि लोकजीवन और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत केंद्र है। यहां की कथाएं, मान्यताएं, मेले और परंपराएं क्षेत्र की सामूहिक स्मृति का हिस्सा हैं। यही कारण है कि सावन आते ही हजारों श्रद्धालुओं के कदम स्वतः इस पवित्र धाम की ओर बढ़ जाते हैं। आस्था, इतिहास, लोककथाओं और सांस्कृतिक परंपराओं का अद्भुत संगम समेटे बाबा भूतनाथ मंदिर आज भी श्रद्धालुओं के लिए विश्वास का ऐसा केंद्र है, जहां हर वर्ष सावन में भक्ति की नई कहानी लिखी जाती है।
गांठों में बंधा विश्वास
मंदिर परिसर में बंधी हजारों गांठें भक्तों की मनोकामनाओं का प्रतीक हैं। स्थानीय मान्यता है कि बाबा भूतनाथ के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई मुराद अवश्य पूरी होती है। इसी विश्वास के साथ श्रद्धालु गांठ बांधते हैं और मनोकामना पूर्ण होने पर वापस आकर उसे खोलते हैं।
विकास शुक्ल, वरिष्ठ पत्रकार
