चातुर्मास के दिव्य ज्ञान-विज्ञान को हृदयंगम करे युवा पीढ़ी

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Edited By Anjali Singh
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सनातन हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी विशेषता इसमें श्रद्धा और तर्क दोनों का अद्भुत समन्वय है। इस सनातनी ज्ञान-विज्ञान को जांचने-परखने और अनुभव करने का सर्वाधिक फलदायी साधनाकाल है ‘चातुर्मास’ यानी वर्षाकाल के चार महीने। मन और जीवन को श्रेष्ठ व उन्नत बनाने वाले चातुर्मास के नियम वैज्ञानिकता से भी जुड़े हैं। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी से कार्तिक माह की देवोत्थानी एकादशी तक की चार महीनों की इस अवधि का सनातन हिन्दू संस्कृति में विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व तो है ही; संयम, मौन और सहिष्णुता की सीख देने वाली यह विशेष कालावधि सांस्कृतिक और व्यावहारिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। ज्ञात हो कि इस वर्ष 25 जुलाई से शुरू हो चुकी यह अवधि 20 नवंबर तक रहेगी। देश की युवा पीढ़ी को सनातन ज्ञानतंत्र की इस अनूठी वैज्ञानिकता को आधुनिक सन्दर्भों में कहीं अधिक गहराई व बारीकी से समझने व आत्मसात करने की जरूरत है।

राष्ट्र की सांस्कृतिक संचेतना की पर्याय हैं कांवड़ यात्राएं


वैदिक मान्यता के अनुसार सृष्टि के संचालक श्रीहरि विष्णु के इस चार मासीय योगनिद्रा काल की अवधि में सृष्टि संचालन का दायित्व देवाधिदेव महादेव स्वयं अपने कन्धों पर उठाते हैं। शास्त्रीय कथानक के अनुसार समुद्र मंथन की घटना श्रावण मास में घटी थी जिसमें निकले हलाहल विष को कंठ में धारण कर सृष्टि के सभी जीवधारियों को जीवनदान दिया था। शास्त्र कहते हैं कि इस विषपान से जब महादेव की देह का तापमान बहुत बढ़ गया तो सर्वप्रथम महर्षि परशुराम ने कांवर में गंगाजल भर कर उनका जलाभिषेक किया था। तभी से श्रावण मास में महाधिदेव के जलाभिषेक की परम्परा का शुभारम्भ माना जाता है। श्रावण माह में देश भर में निकलने वाली कांवड़ यात्राएं हमारी इसी सांस्कृतिक संचेतना का पर्याय मानी जाती हैं। 

स्व से समष्टि की यात्रा  
 
गायत्री महाविद्या के महामनीषी पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य चातुर्मास की महत्ता पर प्रबोधित करते हुए कहते हैं, “परम प्रभु का योगनिद्रा काल मनुष्य के दैविक जीवन में ही नहीं, दैहिक जीवन भी दिव्य जागृति लेकर आता है। इस चार मासीय योगनिद्रा काल में मानव खुद की अंतर्यात्रा कर स्व से समष्टि की ओर बढ़ सकता है। प्रतिवर्ष चार माह की यह कैवल्य अवधि आंतरिक प्रकृति की शुद्धि द्वारा बाहरी प्रकृति व पर्यावरण की शुद्धि हेतु स्वयं को समर्पित करने का सुअवसर प्रदान करती है। जीवन का एक-एक क्षण मूल्यवान है। जो क्षण चला गया, वह कभी लौटकर नहीं आता और आने वाला क्षण हमारे हाथ में नहीं है, इसलिए वर्तमान क्षण का सर्वोत्तम  सदुपयोग कर उसे सार्थक बनाना, यही हमारे वश में है। जीवन में सेवा के बीजों को अंकुरित, पल्लवित व पुष्पित होने दें। इससे स्वयं का जीवन तो उमंग व तरंग से खिल उठेगा ही, औरों के जीवन में भी उल्लास का संचार होगा। चातुर्मास आध्यात्मिक जागरण के साथ अपने मूल, मूल्य, जड़ों से जुड़ने, नूतन व श्रेष्ठ विचारों पर चितंन करने का अवसर प्रदान करता है। इस समय का सर्वश्रेष्ठ सदुपयोग कर हम अतीत का मंथन, वर्तमान में जीवन और भविष्य का चितंन कर नवजीवन की ओर आगे बढ़ सकते हैं। जब हम एकांत में होते हैं तो वह समय दुनिया को समझने, सही और गलत के बीच निर्णय लेने में हमारी मदद करता है। यदि आज के युवा चातुर्मास के इस महत्व को जान लें, तो उन्हें अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने में अत्यधिक मदद मिलेगी। उनके ज्ञान और रचनात्मकता को बढ़ाने में भी उनकी सहायता होगी।      

प्रकृति के संरक्षण व संवर्धन की सीख 

चातुर्मास के दौरान धरती पर अनगिनत जीव, नन्हे पौधे और वनस्पतियां विकसित होती हैं। यह कितनी सुन्दर बात है कि हमारी संस्कृति में पेड़-पौधों में भी जीवन और संवेदना का वास माना गया है। यही बात अब वैज्ञानिक शोध में भी साबित हो चुकी है। यही कारण है पर्यावरण को सहेजने का भाव हमारी सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा है। चातुर्मास में तुलसी, पीपल सींचने और अक्षय नवमी को आंवले के वृक्ष की पूजा की भी परंपरा है। इस परंपरा को हम प्रकृति और परमात्मा के प्रेम का प्रतीक भी मान सकते हैं। यह प्रकृति पूजन कहीं न कहीं स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का ही संदेश देता है। प्राणवायु देने वाले- तुलसी, आंवला और पीपल के पौधों को संरक्षित रखने की बात भी चातुर्मास के नियमों का हिस्सा है। यह किसी अंधविश्वास से नहीं, बल्कि पूरी तरह वैज्ञानिक और जनकल्याण के भाव से जुड़े हैं। आज के समय में जब हमें अपनी परंपराओं को जीवित रखने की जरूरत है, वैज्ञानिकता के साथ बनाये गये चातुर्मास के ये नियम सेहत, संयम और संस्कृति के सच्चे वाहक हैं।

चातुर्मास काल का अनूठा आहार विज्ञान 

वर्षाकाल में प्रकृति के सापेक्ष शरीर की जठराग्नि मन्द पड़ जाने से पाचन शक्ति कमजोर हो जाने से उदर व संक्रामक रोगों का प्रसार होने लगता है। मौसम में सूर्य के ताप में धीरे धीरे कमी और बरसात के साथ प्रकृति में जल तत्व की अधिकता से नमी या सीलन के कारण प्रतिरोधक क्षमता में कमी के चलते संक्रामक रोगाणुओं को पनपने का वातावरण मिल जाता है। अतः कमजोर पाचन के साथ त्वचा पर फोड़े-फुंसियां, घमौरी के अलावा सर्दी, जुखाम, बुखार आदि रोग बढ़ने लगते हैं। बरसात के कारण जगह जगह दूषित पानी व गन्दगी जमा होने से मक्खी, मच्छर या अन्य कीड़े मकोड़े के द्वारा होने वाले जैसे मलेरिया, टायफायड, चिकनगुनिया, डेंगू, ज्वर, पीलिया आदि में भी वृद्धि हो जाती है। प्रतीत होता है कि हमारे वैदिक मनीषी वर्षाकाल में पनपने वाली इन व्याधियों से भली भांति परिचित थे; तभी तो उन्होंने इन रोगों से बचाव के जो नियम सदियों पहले बनाये थे, उनकी प्रासंगिकता आज भी जस की तस है। हमारे स्वास्थ्य विज्ञानियों की वर्षा ऋतु में देर से पचने वाले गरिष्ठ मसालेदार तैलीय व बासी भोजन तथा मांसाहार से परहेज करने तथा सादा सात्विक आहार लेने की सलाह को अब आधुनिक एलोपैथिक चिकित्सक भी उचित मान रहे हैं।   

– पूनम नेगी