आकाश में टूटते तारों की सबसे भव्य बारिश पर्सिड
उल्का वर्षा एक ऐसी खगोलीय घटना है, जिसमें आकाश में बड़ी संख्या में उल्काएं यानी मेट्योर्स एक ही दिशा से टूटती या निकलती हुई प्रतीत होती हैं। इन्हें सामान्य बोलचाल में ‘टूटते तारे’ भी कहा जाता है, यद्यपि इनका तारों या टूटते तारों से कोई संबंध नहीं होता। अंतरिक्ष विज्ञान का अध्ययन करें, तो पाएंगे कि जब कोई धूमकेतु या क्षुद्रग्रह अपनी कक्षा में धूल, बर्फ और चट्टानों के सूक्ष्म कण छोड़ता है, तब पृथ्वी अपनी परिक्रमा के दौरान इन कणों के समूह से होकर गुजरती है। ये कण पृथ्वी के वायुमंडल में अत्यधिक वेग से प्रवेश करते हैं और वायु के साथ घर्षण के कारण गर्म होकर चमकने लगते हैं।
इसी चमकती हुई रेखा को उल्का कहा जाता है। जब ऐसी अनेक उल्काएं एक निश्चित अवधि में दिखाई देती हैं, तो उसे उल्का वर्षा यानी मेट्योर शॉवर कहा जाता है। उल्का वर्षा का नाम उस तारामंडल के नाम पर रखा जाता है, जहां से उल्काएं निकलती हुई प्रतीत होती हैं। इस साल 12-13 अगस्त, 2026 की रात खगोल प्रेमियों के लिए वर्ष की सबसे शानदार रातों में से एक होगी। पर्सिड उल्का-वर्षा अपने चरम (पीक) पर होगी और इस वर्ष इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि चरम के समय चंद्रमा का प्रकाश लगभग नहीं होगा, जिससे आकाश अत्यंत अंधकारमय रहेगा।
क्या है पर्सिड उल्का-वर्षा
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पर्सिड उल्काएं वास्तव में धूमकेतु 109पी/स्विफ्ट-टटल द्वारा छोड़े गए धूल और चट्टानी कण हैं। जब पृथ्वी अपनी कक्षा में घूमते हुए इन कणों के प्रवाह से गुजरती है, तो ये कण लगभग 59 किमी/सेकंड की गति से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते हैं और घर्षण के कारण जल उठते हैं। हमें ये चमकीली रेखाओं या टूटते तारों के रूप में दिखाई देते हैं। इन उल्काओं का उद्गम बिंदु (रेडियंट) आकाश में पर्सियस तारामंडल की दिशा में दिखाई देता है, इसलिए इन्हें पर्सियस कहा जाता है। वास्तव में उल्काएं पूरे आकाश में दिखाई देती हैं, केवल उनका काल्पनिक स्रोत पर्सियस तारामंडल लगता है।
ऐसे बनती है पर्सिड उल्का-वर्षा
जब धूमकेतु सूर्य के निकट आता है तब
- उसकी बर्फ गर्म होकर वाष्पित होती है।
- गैस और धूल अंतरिक्ष में फैल जाती है।
- धूमकेतु की कक्षा में धूल की एक लंबी धारा बन जाती है।
- पृथ्वी प्रत्येक वर्ष अगस्त में इस धूल-पट्टी से गुजरती है।
- तब ये कण लगभग 59 किमी/सेकंड की गति से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते हैं। ये कण जलकर चमकदार रेखाएं बनाते हैं और लोग इन्हें हम टूटते तारे समझते हैं।
कारक धूमकेतु को जानें
109 पी/स्विफ्ट-टटल सौरमंडल के सबसे प्रसिद्ध आवर्ती (पीरियोडिक) धूमकेतुओं में से एक है। यह वही धूमकेतु है, जिसके द्वारा छोड़े गए धूल और चट्टानी कण हर वर्ष अगस्त में पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करके प्रसिद्ध पर्सिड उल्का-वर्षा उत्पन्न करते हैं। इस धूमकेतु की खोज 16 जुलाई, 1862 को अमेरिकी खगोलविदों लुईस स्विफ्ट और होरेस पार्नेल टटल ने स्वतंत्र रूप से की थी। इसी कारण इसका नाम स्विफ्ट-टटल रखा गया। बाद में गणनाओं से ज्ञात हुआ कि यह एक आवर्ती धूमकेतु है, जो लगभग 133 वर्ष बाद पुनः सूर्य के निकट लौटता है। अर्थात धूमकेतु का अगला उपसौर (पेरिहेलियॉन पैसेज) 2126 में होगा। उस समय यह पृथ्वी के पर्यवेक्षकों के लिए अत्यंत चमकीला दिखाई दे सकता है और संभवतः पर्सिड उल्का-वर्षा भी असाधारण रूप से सक्रिय हो सकती है।
133 वर्ष बाद स्विफ्ट-टटल पुनः 1992 में दिखाई दिया। उस समय जापानी खगोलविद त्सुरुहिको किउची ने इसे पुनः खोजा। इसके बाद वैज्ञानिकों ने इसकी कक्षा का अत्यंत सटीक निर्धारण किया। स्विफ्ट-टटल की कक्षा अत्यधिक दीर्घवृत्ताकार (इाईली एलिप्टिकल) है। सूर्य के निकट आने पर यह पृथ्वी की कक्षा के आसपास पहुंचता है। दूर जाने पर यह नेप्च्यून से भी बाहर तक चला जाता है।
क्यों विशेष है 2026
2026 को खगोलविद उत्कृष्ट पर्सिड वर्ष मान रहे हैं, क्योंकि चरम 12-13 अगस्त की रात होगा। हालांकि इसके बाद भी दिखाई देगी। चंद्रमा का प्रकाश लगभग नहीं होगा (न्यू मून के आसपास की स्थिति)। अंधेरे स्थानों पर 50-100 उल्काएं प्रति घंटे तक दिखाई दे सकती हैं। कई चमकीले फायरबॉल (अत्यंत उज्ज्वल उल्काएं) भी देखने को मिल सकते हैं। पर्सियस तारामंडल रात बढ़ने के साथ ऊंचा उठता है, इसलिए आधी रात के बाद उल्काओं की संख्या अधिक दिखाई देती है।
देखने के लिए क्या करें?
सबसे अच्छी बात यह है कि इन उल्काओं को देखने के लिए
- दूरबीन की आवश्यकता नहीं।
- टेलीस्कोप की आवश्यकता नहीं।
- केवल खुला और अंधेरा आकाश चाहिए।
- शहर की रोशनी से दूर जाएं।
- उत्तर-पूर्व दिशा की ओर खुला क्षितिज हो।
- 20-30 मिनट तक आँखों को अंधेरे में अभ्यस्त होने दें।
- लेटकर या आरामदायक कुर्सी पर बैठकर पूरे आकाश को देखें।
- मोबाइल की तेज रोशनी से बचें।
वैज्ञानिक महत्व
पर्सिड केवल सुंदर दृश्य नहीं है, बल्कि स्विफ्ट-टटल का अध्ययन वैज्ञानिकों को निम्न विषयों को समझने में सहायता देता है
- धूमकेतुओं की संरचना समझते हैं।
- उल्का-वर्षाओं की उत्पत्ति को समझते हैं।
- उल्कापिंडों की रासायनिक संरचना का अध्ययन करते हैं।
- पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल की प्रक्रियाओं को समझते हैं।
- चंद्रमा के अत्यंत पतले वायुमंडल (एक्सोस्फीयर) पर उल्कापिंडों के प्रभावों का अध्ययन करते हैं।
- सौरमंडल की उत्पत्ति को समझते हैं।
- प्रारंभिक ग्रह निर्माण की प्रक्रिया को समझने में मदद।
- जल और कार्बनिक अणुओं के वितरण की समझ।
- पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करने वाले सूक्ष्म कणों का व्यवहार का अध्ययन।
