फर्स्ट राइड:स्टीयरिंग से दोस्ती

Amrit Vichar Network
Edited By Anjali Singh
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कार चलाना सीखने का मेरा पहला दिन आज भी स्मृतियों में ताजा है। सुबह ड्राइविंग स्कूल के प्रशिक्षक मुझे खाली मैदान में ले गए। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "घबराइए मत, कार आपकी दोस्त है।" मैंने हल्के कांपते हाथों से स्टीयरिंग पकड़ा। क्लच, ब्रेक और एक्सीलेरेटर को समझने की कोशिश कर ही रहा था कि पहली बार कार स्टार्ट की। उत्साह में क्लच जल्दी छोड़ दिया और कार झटके के साथ बंद हो गई। प्रशिक्षक मुस्कुरा दिए, लेकिन मेरे चेहरे पर घबराहट साफ दिखाई दे रही थी।

दूसरी कोशिश में मैंने धीरे-धीरे क्लच छोड़ा। इस बार कार धीरे-धीरे आगे बढ़ी। जैसे ही पहिए घूमे, मेरे भीतर भी आत्मविश्वास का एक नया पहिया घूमने लगा। कुछ मीटर चलने के बाद स्टीयरिंग संभालना, गियर बदलना और ब्रेक लगाना पहले से आसान लगने लगा। हर छोटी सफलता मेरे चेहरे पर मुस्कान ला रही थी। जब पहली बार मैंने बिना इंजन बंद किए एक पूरा चक्कर लगाया, तो ऐसा लगा जैसे कोई बड़ी मंजिल हासिल कर ली हो। उस दिन महसूस हुआ कि कार चलाना केवल मशीन को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि अपने डर पर विजय पाना भी है।

घर लौटते समय मन में एक अलग ही खुशी थी। पहली ड्राइव ने मुझे सिखाया कि शुरुआत में हर काम कठिन लगता है, लेकिन धैर्य, अभ्यास और सही मार्गदर्शन से वही काम सहज हो जाता है। आज भी जब स्टीयरिंग थामता हूं, तो पहली ड्राइव का वह रोमांच, घबराहट और आत्मविश्वास से भरा पल अनायास ही याद आ जाता है। वही अनुभव हर नई यात्रा के लिए प्रेरणा बन जाता है।