रहस्य और रोमांच से भरा ऐतिहासिक लोहागढ़ किला

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Edited By Anjali Singh
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महाराष्ट्र की सह्याद्री पर्वत श्रृंखला में लोनावला की खूबसूरत वादियों के बीच स्थित लोहागढ़ मतलब लोहे का किला अपने इतिहास और प्रकृति के प्रेमियों के साथ रोमांच के शौकीन लोगों के बीच खासा प्रसिद्ध है। यह किला अतीत की आकर्षक झलक, वास्तुकला के शानदार नमूने और चुनौतीपूर्ण लेकिन आनंददायक ट्रेकिंग मार्ग के लिए जाना जाता है। लोहागढ़ किला पास के विसापुर किले से एक छोटी पर्वत श्रृंखला द्वारा जुड़ा हुआ है, और समुद्र तल से 1,033 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। मानव कौशल के शानदार उदाहरण के साथ अपनी दृढ़ता, स्थापत्य कला की प्रतिभा और प्राकृतिक जीवंतता के चलते यह स्थान इतिहास प्रेमियों, पर्वतारोहियों या प्रकृति की गोद में सुकून खोजने वालों को अनूठा अनुभव प्रदान करता है। इसके प्राचीन रास्तों पर चलते हुए या ऐतिहासिक दीवारों को छूते हुए अथवा किले की विशाल प्राचीरों से आसपास नीचे के दृश्य को निहारते समय ऐसा लगता है, जैसे आप समय में काफी पीछे चले गए हैं।

मुंबई और पुणे से पहुंच सकते

Lohagad Fort

लोहागढ़ किला मुंबई और पुणे दोनों शहरों से आसानी से जुड़ा है। मुंबई से सड़क मार्ग से लोहागढ़ लगभग 100 किमी और पुणे से 56 किमी दूर है। मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे से लोनावला तक जाकर वहां से मालवली पहुंच सकते हैं। पुणे से लोनावला और मालवली के लिए बसें और टैक्सियां उपलब्ध हैं। लोनावला से ऑटो-रिक्शा और टैक्सियां मालवली या भाजा गांव तक ले जाती हैं। मालवली ही सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन है, जो किले से मात्र 6 किमी दूर है। निकटतम हवाई अड्डा पुणे में है, जो 70 किमी दूर है

मानसून के बाद सुहावना मौसम और हरियाली बढ़ा देती सुंदरता

Lohagad Fort (2)

लोहागढ़ किले की यात्रा के लिए सबसे अच्छा समय मानसून की बारिश के बाद अक्टूबर से मार्च के बीच है। मौसम सुहावना, परिदृश्य हराभरा और आरामदायक होने से ट्रेकिंग का भरपूर मजा उठाया जा सकता है। हालांकि जून से सितंबर तक मानसून के महीनों में भी बड़ी संख्या में पर्यटक यहां आते हैं। इस दौरान झरने और जलधाराएं प्राकृतिक सुंदरता और बढ़ा देती हैं। लेकिन रास्ते फिसलन भरे होने से चलने में मुश्किल होती है। अप्रैल से मई के बीच गर्मी और उमस के कारण ट्रेकिंग  थका देने वाली हो सकती है। किले से सूर्योदय और सूर्यास्त के मनमोहक दृश्य देखे जा सकते हैं। ट्रेकिंग का सबसे पसंदीदा ट्रेक मालवली रेलवे स्टेशन से शुरू होता है, जो लगभग 10 किलोमीटर का है। यह ट्रेकिंग मनमोहक रास्तों से  गुजरती है और प्राचीन भाजा गुफाओं के पास से जाती है। जो लोग आसान मार्ग पसंद करते हैं, उनके लिए लोहागढ़वाड़ी गांव से किले तक मोटरेबल सड़क जाती है।

बिच्छू की पूंछ जैसी चट्टानों पर ट्रेकिंग है रोमांचकारी अनुभव

Lohagad Fort (1)

लोहागढ़ की सबसे मनमोहक विशेषता 'विंचुकटा' या 'बिच्छू की पूंछ' है। यह किले की मुख्य संरचना से फैली एक लंबी, संकरी, मजबूत पहाड़ी है। प्राकृतिक रूप से तराशी गई यह चट्टान बिच्छू के डंक जैसी दिखती है और आसपास के सह्याद्री पर्वतमाला के मनोरम दृश्य प्रस्तुत करती है। इस पथ पर ट्रेकिंग करना रोमांचकारी अनुभव है। इस कारण यह चट्टान जैसी पहाड़ी एडवंचर प्रेमियों और फोटोग्राफरों के बीच लोकप्रिय है। हालांकि 'विंचुकटा' सबसे ज्यादा पॉपुलर स्पॉट होने के साथ गहरी खाइयों के कारण खासा जोखिम भरा है।

सर्वाधिक समय मराठों का कब्जा

लोहागढ़ किला लंबे समय तक मराठा शासकों के पास रहा, जबकि केवल पांच वर्षों के लिए मुगल साम्राज्य के अधीन रहा।  इसकी स्थापना दसवीं शताब्दी में लोहतमिया राजवंश के दौरान हुई थी। समय के साथ, इसने चालुक्य, राष्ट्रकूट, यादव, बहमनी, निजाम, मुगल और मराठों के शासन को देखा है। 1648 में  छत्रपति शिवाजी महाराज ने लोहागढ़ की रक्षात्मक और रणनीतिक महत्ता को पहचानते हुए इस पर कब्जा किया। हालांकि 1665 की पुरंदर संधि में उन्हें यह किला मुगलों को सौंपना पड़ा। लेकिन 1670 में उन्होंने किले पर फिर कब्जा कर लिया और इसका इस्तेमाल  खजाने के रूप में किया। अलग-अलग राजाओं के दौर में इस किले की बनावट और सुरक्षा को और मजबूत किया गया। पेशवा काल में नाना फड़नवीस ने यहां शरण लेकर एक विशाल तालाब और सीढ़ीदार कुआं बनवाया था।

चार भव्य द्वार सुनाते हैं युद्ध और साहस की गाथा

किले में चार भव्य द्वार गणेश दरवाजा, नारायण दरवाजा, हनुमान दरवाजा और महा दरवाजा हैं। इन द्वारों पर जानवरों, पक्षियों, फूलों और ज्यामितीय आकृतियों की नक्काशी की गई है। प्रत्येक दरवाजा युद्ध और साहस की गाथा सुनाने के साथ अतीत के असाधारण अभियंता कौशल की गवाही भी देता है। गणेश दरवाजा के शीर्ष पर भगवान गणेश की प्रतिमा बनी है और इसके अंदर उनका एक छोटा सा मंदिर है। किले में लक्ष्मी कोठी विशाल गुंबददार कक्ष है, इसका उपयोग शिवाजी  खजाना रखने के लिए करते थे। इसमें मेहराबदार खिड़कियों और दरवाजे वाले तीन कमरे हैं। लक्ष्मी कोठी के पास ही नाना फड़नवीस का मकबरा गुंबद और शिखर वाली पत्थर की संरचना है।

डरावनी कहानियों के साथ धार्मिक आध्यात्मिक महत्व

लोहागढ़ का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व भी है। सितंबर 2019 में पुणे से आए पर्वतारोहियों के एक समूह ने किले के दक्षिणी भाग में स्थित एक गुफा में प्राचीन शिलालेख की खोज की थी। जैन ब्राह्मी लिपि में लिखित ईसा पूर्व दूसरी या पहली शताब्दी का यह शिलालेख बताता है कि यह गुफा कभी जैन धर्म का एक पवित्र स्थल थी। स्थानीय लोककथाओं और कहानियों में किले को लेकर तमाम डरावने दावे किए जाते हैं। इस प्राचीन किले के मजबूत बुर्जों के निर्माण के समय इंसानों की बलि देने की कहानियां और रात के समय भूत-प्रेत दिखने की अफवाहें यहां सुनी जा सकती हैं।

ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी की भाजा गुफाएं पास में स्थित

मालवली से दो किलोमीटर दूर स्थित भाजा गुफाएं ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी की हैं। यहां चट्टानों को काटकर बनाए गए शानदार स्तूप और जटिल नक्काशी देखने को मिलती है। पास ही स्थित विसापुर किला जो लोहागढ़ से अधिक ऊंचाई पर है, पश्चिमी घाट के मनोरम दृश्यों के साथ चुनौतीपूर्ण ट्रेक है।


महामंडलेश्वर स्वामी मनोजानंद, कानपुर