भौंरा : बरेली की आषाढ़ी पूजा का विलुप्त होता महाप्रसाद
बरेली जिले के ग्रामीण अंचलों की लुप्तप्राय लोक-परंपराओं में एक अत्यंत विशिष्ट, शुद्ध और पारंपरिक व्यंजन है—‘भौरा’ (या भौंरा)। उत्तर प्रदेश के रुहेलखंड क्षेत्र, विशेषकर बरेली और उसके आसपास के ग्रामीण अंचलों में यह केवल एक पकवान नहीं था, बल्कि आषाढ़ मास में श्रद्धा, पारिवारिक एकता और लोक-आस्था से जुड़ी एक पावन परंपरा का अभिन्न अंग था। आज यह परंपरा धीरे-धीरे स्मृतियों तक सीमित होती जा रही है। प्रस्तुत लेख उसी अमूल्य लोक-विरासत को शब्दों में संजोने का एक विनम्र प्रयास है।
आषाढ़ी पूजा - सादगी का पर्व
यह परंपरा प्रतिवर्ष आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष में, गुरु पूर्णिमा से ठीक पहले आने वाले किसी रविवार या गुरुवार को निभाई जाती थी। किसी विशेष लोक-देवता के बड़े आडंबरों से दूर, परिवार के मुखिया द्वारा अत्यंत सादगी और अटूट श्रद्धा के साथ भगवान के नाम पर यह पूजा संपन्न की जाती थी। इस पूजा का मुख्य केंद्र-बिंदु होता था—घर में शुद्धता से तैयार किया गया महाप्रसाद ‘भौरा’।
‘भौरा’ की संरचना और निर्माण का पारंपरिक अनुपात
‘भौरा’ अपने विशाल आकार, वजन और बनावट के लिए जाना जाता था। एक ही पीस (इकाई) के रूप में बनने वाले इस महाप्रसाद का वजन लगभग 4 से 5 किलोग्राम, कभी-कभी इससे भी अधिक होता था। इसकी मोटाई सामान्य रोटियों जैसी न होकर लगभग 2 से 3 इंच होती थी तथा इसका आकार एक बहुत बड़ी, चपटी रोटी जैसा होता था।
इसे बनाने के लिए निम्नलिखित पारंपरिक अनुपात अपनाया जाता था
मोटा गेहूँ का आटा : 2.5 किलोग्राम
बारीक कटा हुआ गुड़ : 1 से 1.25 किलोग्राम
देसी घी (मोयन) : 250 से 300 ग्राम
हल्की कुचली हुई सौंफ : 3 से 4 बड़े चम्मच
नारियल का बुरादा : 200 से 250 ग्राम
सूखे मेवे (या ड्राई फ्रूट) : इच्छानुसार
खसखस (पोस्तादाना) इच्छानुसार 50 ग्राम तक
पानी : केवल 3 से 4 कप (गुड़ का शीरा तैयार करने और सख्त आटा गूँथने भर के लिए)
सबसे पहले आटे में घी को अच्छी तरह मसलकर मोयन लगाया जाता था। इसके बाद उसमें कुटी हुई सौंफ, नारियल का बुरादा तथा इच्छानुसार सूखे मेवे मिलाए जाते थे। फिर गुड़ के ठंडे शीरे की सहायता से अत्यंत कड़ा आटा गूंथा जाता था। इस विशाल लोई के ऊपर सलाई या सींक से गहरे छेद किए जाते थे, ताकि सेंकते समय गर्मी उसके भीतरी भाग तक पहुंच सके।
‘ऊपर-नीचे की आँच’ से सेंकने की अनूठी विधि
चूंकि यह 2–3 इंच मोटा और अत्यंत भारी होता था, इसलिए इसे तवे पर पकाना संभव नहीं था। इसके लिए ‘सैंडविच बेकिंग’ (Sandwich Baking) जैसी अद्भुत देसी तकनीक अपनाई जाती थी। सर्वप्रथम कच्ची जमीन को गोबर और पीली मिट्टी के मिश्रण से लीपा जाता था। इसके बाद उस पवित्र स्थान पर गोबर के सूखे उपले सुलगाए जाते थे। जब उपले अच्छी तरह सुलग जाते और धुआँ निकलना बंद हो जाता, तब आग को थोड़ा हटाकर उसी स्थान पर भौरा रखा जाता था, ताकि उसकी सतह कुछ सख्त हो जाए और उसे उलटने-पलटने में सुविधा रहे। इसके ऊपर आधी आग छोटे-छोटे टुकड़ों में रख दी जाती थी। सतह सख्त होने पर ऊपर की आग नीचे कर दी जाती और नीचे की शेष आग ऊपर रख दी जाती थी। बीच-बीच में थोड़ा-सा भाग हटाकर उसके पकने की स्थिति परखी जाती थी। इस प्रकार उसे बार-बार उलट-पलट कर तब तक सेंका जाता था, जब तक उसका रंग गहरा भूरा (डार्क ब्राउन) न हो जाए। विशेष ध्यान रखा जाता था कि किनारे अच्छी तरह सिकें, पर जलने न पाएँ।
सफाई की अनूठी विधि
पूरी तरह सिक जाने पर गरम-गरम भौरे को सादे पानी से धोया जाता था। उसकी गर्म सतह पर पड़ा पानी तुरंत भाप बनकर उड़ जाता था, जिससे वह पुनः नमी-रहित हो जाता था। इसके बाद गरम-गरम भौरे पर अच्छी तरह देसी घी लगाया जाता था। घर के मुखिया स्नान के उपरांत सादगी और श्रद्धा के साथ सर्वप्रथम भगवान अथवा अपने इष्टदेव को भौरे का भोग लगाते थे।
हंसिये का प्रयोग और पारंपरिक भंडारण
धीमी आंच पर पूरी तरह नमी-मुक्त सिकने के बाद ठंडा होने पर यह किसी कड़े बिस्किट या ब्लॉक की तरह अत्यंत सख्त और कुरकुरा हो जाता था। इसे सामान्य घरेलू चाकू से काटना लगभग असंभव था, इसलिए इसे काटने के लिए हंसिए (दरांती) का प्रयोग किया जाता था। हँसिये के दबाव से इसे छोटे-छोटे चौकोर टुकड़ों में काटा जाता था। इसके बाद परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करते थे।
चूंकि इसका स्वाद इतना लाजवाब होता था कि पूरे परिवार, विशेषकर बच्चों के चाव के कारण यह एक सप्ताह भी मुश्किल से चल पाता था, इसलिए इसके दीर्घकालिक भंडारण की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। इसे सुरक्षित रखने का तरीका भी अत्यंत सरल और वैज्ञानिक था। एक बड़ी पीतल की परात (तसले जैसे बर्तन) में साफ सूती कपड़ा बिछाकर भौरे के टुकड़े रख दिए जाते थे और ऊपर से थाली से ढक दिया जाता था। सूती कपड़ा अतिरिक्त नमी सोख लेता था तथा हवा का संतुलित प्रवाह बने रहने से इसका कुरकुरापन लंबे समय तक बना रहता था।
ऋ तु के अनुकूल अनूठे स्वाद का संगम
आषाढ़ का महीना उत्तर भारत में आमों का प्रमुख मौसम होता है। इस पूजा में किसी अन्य नमकीन सब्जी, कढ़ी या चने की घुघनी का प्रचलन नहीं था। खस्ते और मीठे भौरे के टुकड़ों को दूध में डुबोकर, ताज़े आम के रस (रसिया) के साथ अथवा ऐसे ही बड़े स्वाद से खाया जाता था। गुड़ और सौंफ के सौंधेपन तथा आम के रसीले स्वाद का यह अद्भुत संगम अपने आप में संपूर्ण और शाही तृप्ति प्रदान करता था।
