लक्ष्मीपुर से लखीमपुर तक : इतिहास के धुंधले पन्नों से उभरती एक गौरवगाथा
तराई की उर्वर धरती, घने जंगल, पौराणिक आस्थाएं और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से परिपूर्ण लखीमपुर खीरी का इतिहास आज भी अनेक रहस्यों और अनछुए अध्यायों को अपने भीतर समेटे हुए है। जनपद की इसी गौरवशाली विरासत को प्रमाणिक रूप में सामने लाने का बीड़ा उठाया है श्री गोकर्ण शोध कला एवं संस्कृति संस्थान तथा श्री गोकर्ण फाउंडेशन ने। संस्थान द्वारा किए जा रहे शोध में खीरी के इतिहास से जुड़ी ऐसी जानकारियां सामने आ रही हैं, जो न केवल जनपद की पहचान को नई दृष्टि देती हैं, बल्कि इतिहास के अनेक स्थापित और लोकप्रचलित तथ्यों की भी पुनर्व्याख्या करती हैं। संस्थान का उद्देश्य उपलब्ध ग्रंथों, पुरातात्विक प्रमाणों, अभिलेखों और पांडुलिपियों के आधार पर जनपद का एक प्रामाणिक इतिहास तैयार करना है।
लक्ष्मीपुर था खीरी का प्राचीन नाम

संस्थान के सचिव इंजीनियर मिलिंद कुमार शुक्ला के अनुसार उपलब्ध ऐतिहासिक प्रमाणों और ग्रंथों के अध्ययन से यह तथ्य सामने आया है कि वर्तमान लखीमपुर खीरी का प्राचीन नाम लक्ष्मीपुर था। इसका उल्लेख लगभग 1890 के आसपास महेवागढ़ी राजघराने के राजा बलभद्र सिंह चौहान के काल में रचित ग्रंथ बलभद्र विलास में मिलता है, जिसकी रचना कवि माधव ने की थी। ग्रंथ के अनुसार माता रुक्मिणी, भगवान श्रीकृष्ण और पांडवों के साथ नेपाल स्थित पशुपतिनाथ की यात्रा पर जाते समय इस क्षेत्र में रुकी थीं और मां लक्ष्मी की विशेष आराधना की थी। वर्तमान में यह स्थान महेवागढ़ी स्थित माता संकटा देवी मंदिर के रूप में प्रसिद्ध है। इसी लक्ष्मी पूजन की परंपरा के आधार पर क्षेत्र का नाम लक्ष्मीपुर पड़ा, जो कालांतर में परिवर्तित होकर वर्तमान स्वरूप में पहुंचा।
महेवागढ़ी: जहां इतिहास और आस्था का संगम है
खीरी का इतिहास महेवागढ़ी के उल्लेख के बिना अधूरा माना जाता है। शोध के अनुसार मंदिर के वर्तमान गर्भगृह और प्रमुख संरचनाओं का निर्माण लगभग वर्ष 1750 में महेवा के राजा केदार सिंह चौहान द्वारा कराया गया था। उन्हें महेवा का मूल पुरुष भी माना जाता है। महेवागढ़ी क्षेत्र आज भी जनपद की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्मृतियों का महत्वपूर्ण केंद्र है।--
ओयल का मेंढक मंदिर: तंत्र, वास्तु और विश्वास की अनोखी मिसाल
देशभर में चर्चित ओयल का मेंढक मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि अद्भुत स्थापत्य और तांत्रिक परंपराओं का जीवंत उदाहरण भी है। शोध के अनुसार वर्ष 1836 में राय बख्त सिंह ने इस मंदिर का निर्माण कराया था। उस समय ओयल राज्य उत्तराधिकार संकट और भीषण सूखे की समस्या से जूझ रहा था। तांत्रिक सलाह के आधार पर निर्मित इस मंदिर को उर्वरता और समृद्धि का प्रतीक माना गया। मंदिर की संरचना इसे और विशिष्ट बनाती है। सबसे नीचे मगरमच्छ, उसके मुंह में मछली, उसके ऊपर विशाल मेंढक और फिर उस पर स्थापित तंत्र कला से सुसज्जित शिव मंदिर भारतीय स्थापत्य कला का दुर्लभ उदाहरण प्रस्तुत करता है।
खीरी नाम के पीछे छिपे तीन ऐतिहासिक आधार
खैर के जंगल
तराई क्षेत्र में खैर के वृक्षों की भरपूर उपलब्धता थी। कत्था बनाने वाले इन वृक्षों के कारण क्षेत्र को खीरी कहा जाने लगा।
खेरी नस्ल की गाएं
यहां पाई जाने वाली विशेष देसी गायों की नस्ल अपने मजबूत बैलों के लिए प्रसिद्ध थी। कृषि कार्यों में इन बैलों का विशेष महत्व था।
प्राचीन व्यापारिक गतिविधियां
गोला गोकर्णनाथ और कोटवारा वन क्षेत्र से प्राप्त विशेष लकड़ियों का व्यापार दूरस्थ क्षेत्रों तक होता था। यह क्षेत्र प्राचीन काल में व्यापारिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता था।
गोला का अर्थ व्यापारिक केंद्र, ग्वाला नहीं
लोक मान्यताओं से अलग शोध में यह तथ्य सामने आया है कि गोला शब्द का संबंध ग्वाला या पशुपालन से नहीं, बल्कि एक बड़े व्यापारिक केंद्र से है। ऐसे केंद्रों में मसालों, लकड़ियों और अन्य मूल्यवान वस्तुओं का व्यापार होता था। इसी कारण देश के कई व्यापारिक नगरों में गोला नाम देखने को मिलता है।
गोकर्णनाथ धाम के चार द्वार और पंच तीर्थ की परंपरा
संस्थान के अध्ययन में भगवान गोकर्णनाथ मंदिर से जुड़ी एक महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है। शोध के अनुसार प्राचीन काल में मंदिर के चार प्रमुख द्वार थे
◾ पूर्वी द्वार – देवकली मंदिर
◾ दक्षिणी द्वार – पालननाथ मंदिर (मोहम्मदी क्षेत्र)
◾ उत्तरी द्वार – शाहगढ़ स्थित प्राचीन मंदिर
◾ पश्चिमी द्वार – माटी (वर्तमान मातिन क्षेत्र)
इन चारों द्वारों के साथ स्वयं गोकर्णनाथ धाम मिलकर एक व्यापक धार्मिक क्षेत्र का निर्माण करते थे, जिसे पंच तीर्थ परंपरा का हिस्सा माना जाता था।
500 से अधिक पांडुलिपियों का संरक्षण
इतिहास संरक्षण के क्षेत्र में संस्थान ने महत्वपूर्ण कार्य करते हुए मितौलगढ़ नरेश महाराजा लोनेसिंह अहबन की पांडुलिपियों का संरक्षण कराया है। जिला प्रशासन के सहयोग से ज्ञानभारतम् अभियान के अंतर्गत 500 से अधिक पांडुलिपियों को राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण में अपलोड कराया गया है। यह कार्य जनपद की सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने की दिशा में एक उल्लेखनीय उपलब्धि माना जा रहा है।
