औलिया की जूती

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Edited By Anjali Singh
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अमीर खुसरो निजामुद्दीन औलिया का शागिर्द और काबुल के हाकिम का मुलाजिम था। बड़ा कमाई वाला भक्त था। किसी बात पर उसकी हाकिम से अनबन हो गई और उसने नौकरी छोड़ दी। उन दिनों पक्की सड़कें नहीं होती थीं और न ही वाहन चलते थे। अमीर खुसरो ने अपना सामान ऊंटों पर लदवाया और मुर्शिद के दर्शनों के लिए दिल्ली की ओर चल पड़े। उधर, एक गरीब आदमी हजरत निजामुद्दीन औलिया के पास गया और कहा कि मेरी लड़की की शादी है, मैं गरीब हूं, कुछ दो। अब फकीरों के पास क्या होता है, उनका लंगर ही मुश्किल से चलता था। इसलिए उन्होंने कहा कि तीन दिन ठहर जा, जो भेंट आएगी तू ले जाना। मालिक की मौज उस दिन कुछ न आया। 

दूसरे दिन भी कुछ नहीं आया और तीसरे दिन भी कुछ नहीं आया। यह देखकर वह गरीब आदमी बोला हजरत मैं अब जाता हूं मेरी किस्मत में ही कुछ नहीं है। तब निजामुद्दीन ने कहा, अच्छा यह जूती ले जा, मेरे पास तो बस एक यही वस्तु है। तुम इसे बेचकर कम से कम एक दिन के लिए खाने की सामग्री खरीद सकते हो। उसने टूटे हुए दिल से पीर का धन्यवाद किया। जूती ले ली और घर की ओर चल पड़ा। जब वह थका हुआ धूल भरे कच्चे रास्ते पर अपने घर जा रहा था, तो उसने देखा कि सामने कीमती सामान से लदे हुए ऊंटों का एक काफिला आ रहा है। यह अमीर खुसरो का काफिला था, जो काबुल के हाकिम की नौकरी से सेवामुक्त होकर आ रहा था। 

ऊंट की सवारी करता हुआ अमीर खुसरो काफिले की अगुवाई कर रहा था। जब वह उस गरीब आदमी के पास पहुंचा, तो उसे महसूस हुआ कि कहीं से पीर की खुशबू आ रही है। पता नहीं कहां से आ रही है। जब वह आदमी सामने से आकर उसके पास से गुजर गया तो खुशबू पीछे की ओर से आनी शुरू हो गई, तो वह हैरान हो गया, समझ गया कि इस आदमी के पास कोई भेद है। ऊंट से नीचे उतरकर उसे अपने पास बुलाकर पूछा तू कहां से आया है। उसने जवाब दिया की दिल्ली गया था निजामुद्दीन औलिया के पास, गरीब हूं, लड़की की शादी है। मैंने कहा कुछ दो, लेकिन फकीर भूखे-नंगे होते हैं। जब खुदा कुछ नहीं दे, तो फकीर भी कुछ नहीं देते। अमीर खुसरो बहुत ही प्रेमी शिष्य थे। इस बात से उसके दिल को ठेस लगी और पूछा कुछ दिया भी। 

मुसाफिर ने कहा हां यह पुरानी जूती दी हैं। अमीर खुसरो ने कहा कि क्या इसे बेचना चाहते हो, मैं तुझे इसकी मुंह मांगी कीमत दे सकता हूं। उसने जवाब दिया हां ले लो मैं तो इसे अगले गांव में किसी को बेचकर कुछ खाने के लिए लेना चाहता था। क्योंकि मुझे भूख लगी है। अमीर खुसरो ने एक ऊंट अपना और एक अपनी स्त्री तथा बच्चों के लिए रख लिया, बाकी सारे ऊंट माल समेत उसको दे दिए और कहा, जा लड़की की शादी कर लेना। 

मुसाफिर खुसरो का बार-बार शुक्रिया अदा करता हुआ माल से लदे ऊंट लेकर चला गया। इधर, जब अमीर खुसरो अपने पीर के दरबार में पहुंचे तो जूती झाड़ पोंछकर मुर्शिद के आगे रख दीं। पीर ने पूछा इसका मोल क्या दिया है। खुसरो ने अर्ज किया हजरत मैं जो कुछ भी दे सकता था सब दे दिया है। निजामुद्दीन ने कहा फिर भी सस्ती है। इसके बाद अमीर खुसरो के इश्क को देखकर निजामुद्दीन ने यहां तक कह दिया था कि खुसरो को मेरी कब्र पर न आने देना, कहीं ऐसा न हो कि उससे मिलने के लिए मेरी कब्र फट जाए। यह अवस्था प्रेमियों की है। कबीर साहिब का कथन है कि शीश दिए जो गुरु मिले तो भी सस्ता जान।

करन सिंह मौर्य, (वरिष्ठ पत्रकार)