रंग-तरंग : जब मंच पर जीवंत हुए महानायक मंगल पांडेय

Amrit Vichar Network
Edited By Anjali Singh
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बीते दिनों बलिया की पावन माटी में जन्मे अमर क्रांतिकारी मंगल पांडेय का अदम्य साहस, देशभक्ति की भावना और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह की पहली चिंगारी जब मंच पर जीवंत हुई, तो पूरा सभागार राष्ट्रभक्ति के रंग में रंग गया। उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, संस्कृति मंत्रालय तथा राष्ट्रीय कला मंच के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ऐतिहासिक नाटक ‘1857 के महानायक मंगल पांडेय’ का मंचन दर्शकों के लिए केवल एक सांस्कृतिक प्रस्तुति नहीं, बल्कि इतिहास के स्वर्णिम अध्याय से साक्षात्कार जैसा अनुभव बन गया।

गंगा बहुद्देशीय सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम की शुरुआत रायबरेली से आईं प्रसिद्ध आल्हा गायिका शीलू सिंह की ओजपूर्ण प्रस्तुति से हुई। उनके स्वर में गूंजती वीर रस की शौर्यगाथाओं, विशेषकर ‘वीर बहादुर मंगल पांडे...’ ने ऐसा वातावरण निर्मित किया कि सभागार देशभक्ति के जोश से भर उठा। हर प्रस्तुति के साथ दर्शकों की तालियां और ‘भारत माता की जय’ तथा ‘वंदे मातरम्’ के गगनभेदी नारे माहौल को और अधिक ऊर्जावान बनाते रहे।

निर्देशक आशीष त्रिवेदी के निर्देशन में मंचित नाटक ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के उस दौर को प्रभावशाली ढंग से जीवंत किया, जब अंग्रेजी शासन भारतीय सैनिकों और आम जनता पर अत्याचार कर रहा था। नाटक के मंचन में सैनिकों की विवशता, गांवों से आने वाली भावनात्मक चिट्ठियां, धार्मिक आस्थाओं पर हो रहे हमले और चर्बी लगे कारतूसों के कारण सैनिकों के भीतर पनपते आक्रोश को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया गया। इन्हीं घटनाओं से प्रेरित होकर मंगल पांडेय किस प्रकार विद्रोह का बिगुल फूंकते हैं, यह दृश्य दर्शकों को भावुक भी करता है और गर्व से भर भी देता है।

नाटक के कलाकारों ने अपने सशक्त अभिनय से ऐतिहासिक पात्रों को सजीव बना दिया। राहुल चौरसिया ने मंगल पांडेय की भूमिका में उनके साहस, स्वाभिमान और क्रांतिकारी व्यक्तित्व को प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त किया, जबकि रिया वर्मा ने भारत माता के रूप में भावपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराई। तुषार पांडे, अनुपम पांडे, यश गुप्त, प्रियांशु, संजीत और कुमार यादव ने सैनिकों की भूमिकाओं को जीवंत बनाया।

वहीं ऋ तिक गुप्त, मौसम कुमार और सूरज ग्रामीण पात्रों के रूप में नजर आए तथा उत्कर्ष शर्मा ने अंग्रेज अधिकारी की भूमिका को प्रभावशाली ढंग से निभाया। भाग्यलक्ष्मी, आरती रेखा और सुशील तिवारी के सुमधुर गायन ने प्रस्तुति को भावनात्मक गहराई प्रदान की, जबकि सह-निर्देशक ट्विंकल गुप्ता के संयोजन ने मंचन को और अधिक प्रभावशाली बनाया। कार्यक्रम ने यह संदेश भी दिया कि इतिहास केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं है, बल्कि रंगमंच के माध्यम से नई पीढ़ी तक उसे जीवंत और प्रेरणादायी रूप में पहुंचाया जा सकता है। मंचन समाप्त होने के बाद देर तक सभागार तालियों की गूंज और राष्ट्रभक्ति के नारों से गूंजता रहा।