जब कैनवास पर उभर आया जलवायु संकट
कला कई बार वह कह देती है, जिसे आंकड़े, सरकारी रिपोर्टें और नीतिगत दस्तावेज नहीं कह पाते। एक चित्र, एक रेखा, एक रंग या एक छायाचित्र किसी समाज की पीड़ा, प्रतिरोध और उम्मीद को उस तीव्रता से व्यक्त कर सकता है, जहां शब्द भी कम पड़ जाते हैं। रांची के ऑड्रे हाउस में आयोजित ‘जलवायु अखड़ा 2026’ की पेंटिंग और छायाचित्र प्रदर्शनी इसी अर्थ में केवल कला प्रदर्शन नहीं, बल्कि जलवायु संकट, विकास मॉडल और सामाजिक न्याय पर एक गंभीर सांस्कृतिक हस्तक्षेप है।
सारथी द्वारा आयोजित इस आयोजन में देशज अभिक्रम, असर एवं लिव फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में लगी प्रदर्शनी दर्शकों को यह सोचने के लिए विवश करती है कि जलवायु परिवर्तन का संकट केवल बढ़ते तापमान या बदलते मौसम का प्रश्न नहीं है। यह जंगलों के उजड़ने, नदियों के सूखने, आदिवासियों के विस्थापन, महिलाओं के बढ़ते श्रम और समुदायों की टूटती सांस्कृतिक स्मृतियों का भी संकट है। प्रदर्शनी का सबसे सशक्त और भावनात्मक पक्ष ‘जेंडर और क्लाइमेट चेंज’ विषय पर आधारित झारखंड की उन्नीस युवा महिला कलाकारों की पेंटिंग श्रृंखला है। दिव्याश्री, अनुकृति टोप्पो, सस्मि रेखा पात्र, अर्पिता राज नीरद, सुधा कुमारी, निशी कुमारी, सृजिता, रोशनी खलखो, मनिता कुमारी उरांव, ज्योति वंदना लकड़ा, मानसी टोप्पो, रितेश्ना राज, चांदनी कुमारी, काराबी दास, सोफिया मिंज, तान्या मिंज, नीलम नीरद, रंजीता सिंह और पिंकी कुमारी की कृतियां इस प्रदर्शनी की आत्मा बनकर सामने आती हैं।
इन चित्रों में जलवायु परिवर्तन किसी वैज्ञानिक अवधारणा की तरह नहीं, बल्कि एक स्त्री के रोजमर्रा के जीवन की कठिनाई के रूप में उपस्थित है। कहीं पानी के लिए लंबी दूरी तय करती महिलाएं हैं, कहीं जंगल कटने के बाद ईंधन और चारे की तलाश करती आकृतियां हैं, तो कहीं विस्थापन के बाद अपनी पहचान बचाने का संघर्ष करती आदिवासी महिलाएं।
इन कलाकारों ने यह स्थापित किया है कि प्रकृति और स्त्री का रिश्ता केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि जीवन और अस्तित्व का रिश्ता है। जब जंगल कटते हैं, सबसे पहले महिलाओं की दिनचर्या बदलती है। जब जलस्रोत सूखते हैं, सबसे अधिक बोझ उनके कंधों पर आता है। इसलिए जलवायु न्याय की चर्चा महिलाओं की भागीदारी के बिना अधूरी है। वरिष्ठ चित्रकार शेखर की श्वेत-श्याम चित्र श्रृंखला ‘सिम्फ़नी इन ब्लैक’ प्रदर्शनी का दूसरा महत्वपूर्ण पड़ाव है।
अमूर्त चित्रों का श्रृंखला

तीन अमूर्त चित्रों की यह श्रृंखला किसी प्रत्यक्ष दृश्य को नहीं दिखाती, बल्कि दर्शक के भीतर बेचैनी पैदा करती है। काले और सफेद रंगों का तीखा विरोधाभास विकास और विनाश के बीच के द्वंद्व का रूपक बन जाता है। चित्रों में कहीं ज्यामितीय संरचनाएं मशीनों का बोध कराती हैं, कहीं टूटती रेखाएं उजड़ते भूगोल का संकेत देती हैं, तो कहीं रिक्त स्थान उस मौन को व्यक्त करते हैं जिसे विस्थापित समुदाय वर्षों से जी रहे हैं।
शेखर की यह श्रृंखला किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचाती, बल्कि दर्शक से प्रश्न पूछती है- क्या विकास केवल खनन, उद्योग और कंक्रीट की इमारतों का नाम है? क्या प्रकृति का विनाश विकास की अपरिहार्य कीमत है? क्या आधुनिकता का अर्थ अपने पारिस्थितिक संतुलन को खो देना है? इन चित्रों की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वे दर्शक को देखने से अधिक सोचने के लिए बाध्य करते हैं।
प्रदर्शनी में पुनिता कुमारी की सोहराय शैली की पेंटिंग एक अलग सौंदर्यबोध रचती है। सोहराय केवल लोकचित्र नहीं, बल्कि मनुष्य, पशु, वनस्पति और धरती के बीच सह-अस्तित्व की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है। जब आधुनिक विकास प्रकृति को संसाधन भर मानता है, तब सोहराय कला हमें याद दिलाती है कि प्रकृति उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन-सहचर है। यह पेंटिंग प्रदर्शनी में परंपरा और आधुनिक पर्यावरणीय विमर्श के बीच एक सुंदर सेतु का कार्य करती है। यदि पेंटिंग अनुभूति का संसार रचती हैं, तो छायाचित्र यथार्थ की कठोरता सामने रखते हैं।
‘खनन, पर्यावरण और समुदाय’ विषयक फोटो प्रदर्शनी में गुड्डू वर्मा, शशि शंकर, फिलिप कुजूर, श्रीनिवास कुरूगंती, डॉ. नीतिश प्रियदर्शी, अपु पॉल और शेखर के छायाचित्र विकास के उस चेहरे को सामने लाते हैं जिसे अक्सर सरकारी प्रस्तुतियों और कॉरपोरेट विज्ञापनों में जगह नहीं मिलती। तस्वीरों में एक ओर झारखंड के हरे-भरे जंगल, पहाड़, नदियाँ और आदिवासी जीवन की सांस्कृतिक समृद्धि दिखाई देती है। दूसरी ओर विशाल खुली खदानें, उड़ती धूल, सूखते जलस्रोत, उजड़ते गांव और विस्थापन का मौन दर्द भी उतनी ही स्पष्टता से उपस्थित है।
इन तस्वीरों की शक्ति उनकी प्रामाणिकता में है। वे किसी दृश्य को सजाती नहीं, बल्कि उसकी वास्तविकता को सामने रखती हैं। विशेष रूप से महिलाओं, बच्चों और श्रमिकों की उपस्थिति यह रेखांकित करती है कि प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की सबसे बड़ी कीमत वे समुदाय चुकाते हैं जिन्होंने सदियों तक इन संसाधनों का संरक्षण किया। इस प्रदर्शनी का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह है कि यह जलवायु परिवर्तन को केवल पर्यावरणीय संकट के रूप में नहीं देखती। यह बार-बार संकेत करती है कि जलवायु संकट सामाजिक न्याय, लैंगिक समानता, आदिवासी स्वशासन, सांस्कृतिक अधिकार और लोकतांत्रिक भागीदारी से जुड़ा हुआ प्रश्न है।
खनन से प्रभावित इलाकों में केवल जंगल नहीं कटते, भाषाएं भी खो जाती हैं, केवल पहाड़ नहीं टूटते, सामुदायिक संबंध भी बिखरते हैं; केवल नदियाँ प्रदूषित नहीं होतीं, आजीविका और संस्कृति भी संकट में पड़ जाती है। यही कारण है कि प्रदर्शनी विकास की अवधारणा पर पुनर्विचार का आग्रह करती है। वह कहती है कि यदि विकास प्रकृति और मनुष्य दोनों को नष्ट कर दे, तो उसकी सफलता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। आज जब कला बाजार, निवेश और सजावटी वस्तु बनने के दबाव से गुजर रही है, तब जलवायु अखड़ा 2026 की यह प्रदर्शनी कला की सामाजिक भूमिका को पुनर्स्थापित करती है।
यहां चित्र बिकने के लिए नहीं, संवाद रचने के लिए हैं। यहाँ कैमरा दृश्य सुंदर बनाने के लिए नहीं, सच दिखाने के लिए है। यहाँ कलाकार दर्शक का मनोरंजन नहीं करता, बल्कि उसके विवेक को झकझोरता है। यही इस प्रदर्शनी की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
रांची के ऑड्रे हाउस में आयोजित यह कला और छायाचित्र प्रदर्शनी बताती है कि जलवायु परिवर्तन पर बहस केवल वैज्ञानिक सम्मेलनों, सरकारी बैठकों या अंतरराष्ट्रीय मंचों तक सीमित नहीं रह सकती। समाज की चेतना तक पहुंचने के लिए कला जैसी संवेदनशील भाषा की आवश्यकता है। ‘जलवायु अखड़ा 2026’ की यह प्रदर्शनी हमें याद दिलाती है कि जलवायु संकट का समाधान केवल तकनीक या नीतियों से नहीं निकलेगा। उसके लिए प्रकृति के साथ नए रिश्ते, समुदायों के अनुभवों का सम्मान, महिलाओं के नेतृत्व की स्वीकृति और विकास की अवधारणा की पुनर्समीक्षा आवश्यक है। जब रंग प्रतिरोध बन जाएं, जब कैमरा साक्ष्य बन जाए और जब कला समाज से सवाल पूछने लगे, तब वह केवल सौंदर्य की नहीं, परिवर्तन की शक्ति बन जाती है। रांची की यह प्रदर्शनी उसी परिवर्तनकारी कला का जीवंत उदाहरण है।
कुमार कृष्णन
