भारतीय जंगलों के पोषक हैं बाघ
बाघ केवल भारत का राष्ट्रीय पशु नहीं, बल्कि भारतीय वनों की आत्मा, जैव विविधता का सबसे सशक्त प्रहरी और पारिस्थितिक तंत्र का सर्वोच्च संरक्षक है। जिस जंगल में बाघ सुरक्षित है, वह जंगल स्वस्थ माना जाता है और जहां जंगल स्वस्थ हैं, वहां जल, जलवायु, वनस्पति, वन्यजीव तथा मानव जीवन भी सुरक्षित रहता है। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सत्य है कि भारतीय जंगलों के वास्तविक पोषक बाघ ही हैं।
भारत का प्रकृति से संबंध केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक भी है। हिमालय की हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाओं से लेकर सुंदरवन के मैंग्रोव वनों तक, पश्चिमी घाट की पर्वतमालाओं से लेकर मध्य भारत के सघन साल वनों तक, प्रकृति ने इस देश को असाधारण जैव विविधता प्रदान की है। इसी जैविक समृद्धि का सबसे प्रभावशाली प्रतिनिधि बाघ है। विश्व के लगभग पचहत्तर प्रतिशत जंगली बाघ भारत में पाए जाते हैं।
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण तथा भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा प्रकाशित अखिल भारतीय बाघ आकलन–2022 के अनुसार भारत में बाघों की संख्या 3,682 है। यह उपलब्धि विश्व के लिए एक प्रेरक उदाहरण है, क्योंकि जब अनेक देशों में बाघ विलुप्त हो चुके हैं या विलुप्ति के कगार पर हैं, तब भारत ने संरक्षण के माध्यम से उनकी संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि कर यह सिद्ध किया है कि इच्छाशक्ति, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और जनसहभागिता के बल पर प्रकृति का पुनरुत्थान संभव है।
उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में शिकार को राजसी वैभव और साहस का प्रतीक माना जाता था। तत्कालीन राजघरानों और औपनिवेशिक अधिकारियों के लिए बाघों का शिकार प्रतिष्ठा का विषय था। हजारों बाघ केवल मनोरंजन और ट्रॉफी के लिए मार दिए गए। स्वतंत्रता के बाद भी अनियंत्रित वन कटान, कृषि विस्तार, अवैध शिकार और बढ़ती जनसंख्या के दबाव ने स्थिति को और गंभीर बना दिया। सन् 1972 में जब देश में बाघों की स्थिति का वैज्ञानिक आकलन किया गया, तब उनकी संख्या लगभग 1,800 के आसपास रह गई थी। यह केवल एक वन्यजीव का संकट नहीं था, बल्कि भारतीय जंगलों के भविष्य पर मंडराता हुआ खतरा था।
इसी पृष्ठभूमि में सन् 1973 में भारत सरकार ने दूरदर्शी निर्णय लेते हुए प्रोजेक्ट टाइगर का शुभारम्भ किया। यह विश्व के सबसे सफल वन्यजीव संरक्षण अभियानों में से एक माना जाता है। प्रारम्भ में केवल नौ बाघ अभयारण्यों से शुरू हुई यह योजना आज देश के अनेक राज्यों में विस्तृत हो चुकी है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण की स्थापना, आधुनिक निगरानी प्रणाली, कैमरा ट्रैप, उपग्रह आधारित मानचित्रण, वैज्ञानिक गणना, प्रशिक्षित वनकर्मी तथा स्थानीय समुदायों की सहभागिता ने इस अभियान को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। यही कारण है कि आज भारत वैश्विक बाघ संरक्षण का नेतृत्व करने वाला देश माना जाता है।
बाघ को पारिस्थितिकी विज्ञान में “शीर्ष शिकारी” कहा जाता है। यह शब्द केवल उसकी शक्ति का परिचायक नहीं, बल्कि उसकी पारिस्थितिक भूमिका का वैज्ञानिक प्रमाण है। किसी भी वन क्षेत्र में शाकाहारी जीवों की संख्या यदि अनियंत्रित हो जाए, तो वे नई वनस्पतियों, पौधों और घास के मैदानों को तीव्र गति से नष्ट कर देते हैं। इससे जंगलों का प्राकृतिक पुनर्जनन बाधित होता है, मिट्टी का कटाव बढ़ता है और जलधारण क्षमता घटने लगती है। बाघ इन शाकाहारी जीवों की संख्या को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित रखता है। इस प्रकार वह किसी एक प्रजाति का नहीं, बल्कि पूरे वन पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बनाए रखता है। यही कारण है कि वैज्ञानिक बाघ को “छत्र प्रजाति” भी कहते हैं, क्योंकि उसके संरक्षण से असंख्य अन्य प्रजातियों का संरक्षण स्वतः सुनिश्चित हो जाता है।
आर्थिक दृष्टि से भी बाघों का महत्व अत्यंत व्यापक है। भारत के प्रमुख बाघ अभयारण्य प्रतिवर्ष लाखों देशी और विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। इससे स्थानीय युवाओं को मार्गदर्शक, वाहन चालक, प्रकृति व्याख्याता, आतिथ्य सेवा, हस्तशिल्प और अन्य अनेक क्षेत्रों में रोजगार प्राप्त होता है। प्रकृति पर्यटन से प्राप्त आय ग्रामीण क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाती है। अनेक अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि संरक्षित वन क्षेत्रों से प्राप्त पारिस्थितिक सेवाओं जैसे स्वच्छ जल, कार्बन अवशोषण, मिट्टी संरक्षण और जलवायु संतुलन का आर्थिक मूल्य प्रतिवर्ष अरबों रुपये के बराबर आँका जा सकता है। इस दृष्टि से बाघ संरक्षण केवल पर्यावरणीय निवेश नहीं, बल्कि राष्ट्र की दीर्घकालिक आर्थिक सुरक्षा का भी आधार है।
आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन की चुनौती से जूझ रही है। बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा, वनाग्नि और चरम मौसमी घटनाओं ने प्राकृतिक पारिस्थितिकी को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। ऐसे समय में बाघों के जंगल पृथ्वी के लिए प्राकृतिक कवच का कार्य कर रहे हैं। घने वन वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण कर तापवृद्धि को कम करने में सहायक होते हैं। यदि बाघों के आवास सुरक्षित रहेंगे, तो विशाल वन क्षेत्र भी सुरक्षित रहेंगे, और यही वन भविष्य की जलवायु सुरक्षा के सबसे बड़े प्राकृतिक साधन सिद्ध होंगे।
प्रकृति ने प्रत्येक जीव को एक विशिष्ट भूमिका प्रदान की है, किंतु बाघ की भूमिका उन सभी में सबसे अधिक निर्णायक है। यदि किसी वन से बाघ लुप्त हो जाएं, तो उसका प्रभाव केवल एक प्रजाति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरा पारिस्थितिक तंत्र धीरे-धीरे असंतुलित होने लगता है। शाकाहारी जीवों की अनियंत्रित वृद्धि से वनस्पतियों का पुनर्जनन रुक जाता है, घास के मैदान समाप्त होने लगते हैं, मिट्टी का अपरदन बढ़ता है और अंततः जलस्रोत भी प्रभावित होने लगते हैं। यही कारण है कि विश्वभर के पारिस्थितिकी वैज्ञानिक बाघ को केवल एक वन्यजीव नहीं, बल्कि “पारिस्थितिकी अभियंता” के रूप में देखते हैं, जो अपने अस्तित्व मात्र से पूरे वन तंत्र को स्वस्थ बनाए रखता है।
भारतीय संस्कृति ने सदैव प्रकृति को पूजनीय माना है। हमारे वेद, उपनिषद, पुराण और लोकपरंपराएँ वन, नदी, पर्वत तथा वन्यजीवों के प्रति सम्मान का संदेश देती हैं। शक्ति की अधिष्ठात्री माँ दुर्गा का वाहन बाघ है। यह केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि यह संदेश है कि शक्ति और प्रकृति का संबंध अविभाज्य है। आधुनिक विज्ञान आज जिस जैव विविधता संरक्षण की बात करता है, भारतीय संस्कृति हजारों वर्ष पूर्व उसी विचार को जीवन का आधार मान चुकी थी। इसलिए बाघ संरक्षण केवल वैज्ञानिक आवश्यकता नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत की रक्षा का भी दायित्व है।
डॉ. जितेंद्र शुक्ला (वन्यजीव विशेषज्ञ)
