चातुर्मास: साधना और आत्मसंयम के माह 

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Edited By Anjali Singh
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देवशयनी एकादशी के साथ ही 25 जुलाई से 4 माह के चातुर्मास का आरंभ हो गया है। चातुर्मास को वर्ष का सबसे पवित्र आध्यात्मिक काल माना गया है। यह चार महीनों की समयावधि आत्मचिंतन, संयम, साधना और ईश्वर भक्ति का दिव्य पर्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आषाढ़ शुक्ल एकादशी अर्थात देवशयनी एकादशी से भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा धारण करते हैं और अगले चार महीनों तक विश्राम करते हैं। इसके पश्चात कार्तिक शुक्ल एकादशी अर्थात देवउठनी एकादशी के दिन भगवान पुनः जागृत होते हैं। यही चार माह “चातुर्मास” कहलाते हैं।

शास्त्रों में वर्णित है कि यह समय मनुष्य को सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर ईश्वर के निकट जाने का अवसर प्रदान करता है। सनातन परंपरा में चातुर्मास का अत्यंत विशेष स्थान है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान विष्णु के योगनिद्रा में जाने के पश्चात समस्त देवकार्य स्थिर हो जाते हैं। इसलिए विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों को इस अवधि में स्थगित रखा जाता है। दूसरी ओर यह समय साधना, आत्मसंयम और भक्ति के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। चातुर्मास की

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार असुरों के राजा बलि ने अपने अच्छे कर्मों और दानवीरता के बल पर तीनों लोकों पर अपना अधिकार जमा लिया था। देवताओं के आग्रह पर भगवान विष्णु ने वामन का रूप धारण किया और राजा बलि के पास भिक्षा मांगने पहुंचे। भगवान विष्णु के वामन अवतार ने बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी। जैसे ही बलि ने संकल्प लिया, भगवान ने विशाल रूप धारण कर लिया। पहले पग में पूरी पृथ्वी और दूसरे पग में सारा आकाश नाप लिया। जब तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान नहीं बचा, तो बलि ने अपना सिर आगे कर दिया। भगवान वामन बलि की इस उदारता और दानशीलता से बहुत प्रसन्न हुए। भगवान ने राजा बलि से वरदान मांगने को कहा। भक्तवत्सल बलि ने वरदान के रूप में मांगा कि ‘हे प्रभु, आप हमेशा मेरे साथ पाताल लोक में निवास करें।’ 

भगवान विष्णु ने उनकी बात मान ली और वे पाताल लोक चले गए। उधर बैकुंठ धाम में माता लक्ष्मी और अन्य देवी-देवता भगवान विष्णु की अनुपस्थिति से चिंतित हो गए। तब माता लक्ष्मी ने एक युक्ति निकाली और राजा बलि के पास जाकर उन्हें अपना भाई बनाया और उपहार स्वरूप भगवान विष्णु को बैकुंठ वापस ले आईं। हालांकि भगवान विष्णु को दिए गए वचन का पालन भी करना था, इसलिए यह तय हुआ कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक भगवान विष्णु राजा बलि के राज्य पाताल में विश्राम करेंगे और शेष समय बैकुंठ में रहेंगे। इसी चार महीने के समय को चातुर्मास के नाम से जाना जाता है।

आचार्य प्रदीप द्विवेदी