जॉब का पहला दिन: जिम्मेदारी की एहसास 

Amrit Vichar Network
Edited By Anjali Singh
On

मेरी नौकरी का प्रथम दिन अप्रैल 1995 में शुरू हो गया था। मुझे एक टीचर की नौकर मिली थी, जो मैं हमेशा से बनना चाहती थीं। ये नौकरी भी मुझे उसी कॉलेज में मिली जहां से मैंने एमएससी की पढ़ाई की थी। नौकरी के बाद ही मुझे पता चला की मेरे टीचर, जिन्हें में बहुत सख्त समझती थी वो मेरा कितना सहयोग कर रहे हैं। मेरा ऑफिस एक मेरे टीचर के साथ ही शेयर हो रहा था और उन्होंने अपनी अलमारी की चाबी मुझे दे दी की तुम इसमें आधे में अपना सामान रखना।

नीचे की दो लेयर्स उन्होंने खाली की थी, जिसमें उन्होंने मुझे सामान रखने के लिए कहा। मुझे मेरी हेड और सहयोगियों को इतना साथ मिला जितना की मैंने सोचा भी नहीं था। मुझे अपनी छात्राओं का भी बहुत सहयोग मिला, मुझे छात्राओं की क्लास लेने में कोई समस्या नहीं आई, क्योंकि यह पूरी तरह प्रयोगात्मक क्लास थी। 

शायद मेरी हेड को लगा होगा की शुरुआत में प्रयोगात्मक क्लास से मुझ में थोड़ा आत्मविश्वास आ जाएगा। मुझे मुझसे पूछ कर मेरा पसंदीदा सब्जेक्ट बढ़ाने के लिए दिया गया था, उस दौरान मैं अपनी हेड से या टीचर्स से जो भी रहती थीं, वो उसे तुरंत मान जाते थे। मुझे गाइड भी करते थे क्या सही है क्या गलत है। यह नौकरी एक साल के लिए थी और उस दौरान मैंने तीन शोध पत्र अपनी गुरुजनों के सहायता से लिखे।

कॉलेज में पढ़ाने और शोध पत्र लिखने से मुझ में बहुत ही उत्साह था। पहली नौकरी पहला दिन आज इस बात को 31 वर्ष हो गए हैं। इस बीच कई खट्टे-मीठे और कड़वे अनुभवों से गुजर चुकी हूं, पर जब बात आती है पहली नौकरी पहले दिन की, तो बस यही कह पाती हूं कि, खुशी मिली इतनी मेरे दिल में न समाए।


डॉ ऋतु पांडेय , एसोसिएट प्रोफ़ेसर