पौराणिक कथा : सच्ची भक्ति
प्राचीन काल में एक सुंदर राज्य के घने वन के बीच भगवान शिव का एक अत्यंत प्राचीन मंदिर स्थित था। दूर-दूर से श्रद्धालु वहां दर्शन करने आते थे। उसी गांव में एक निर्धन लकड़हारा रहता था। वह प्रतिदिन सुबह जंगल में लकड़ियां काटने जाने से पहले मंदिर पहुंचता, पास की नदी से एक लोटा स्वच्छ जल भरकर शिवलिंग पर अर्पित करता और हाथ जोड़कर कहता, “हे भोलेनाथ! मुझे इतना सामर्थ्य देना कि मैं ईमानदारी से अपने परिवार का पालन-पोषण कर सकूं।”
उसके पास महंगे फूल, फल या मिठाइयां नहीं थीं, लेकिन उसका मन श्रद्धा और विश्वास से भरा रहता था। उसी नगर का एक धनी व्यापारी भी प्रतिदिन मंदिर आता था। वह सोने-चांदी के पात्रों में दूध, घी, शहद और बहुमूल्य वस्तुएं चढ़ाता। उसे अपने दान और वैभव पर बड़ा गर्व था।
एक दिन उसने लकड़हारे को देखकर व्यंग्य से कहा, “केवल एक लोटा जल चढ़ाने से क्या भगवान प्रसन्न हो जाएंगे?” लकड़हारे ने शांत स्वर में उत्तर दिया, “भगवान वस्तु का मूल्य नहीं, भक्त के भाव का मूल्य देखते हैं।” कुछ समय बाद उस राज्य में भयंकर सूखा पड़ गया। खेत सूख गए, कुएं खाली हो गए और लोगों के सामने जीवन का संकट खड़ा हो गया। व्यापारी ने अपने धन के बल पर सब कुछ बचाने की कोशिश की, लेकिन उसे कहीं शांति नहीं मिली। उसी रात भगवान शिव ने उसे स्वप्न में दर्शन देकर कहा, “तुमने बहुत कुछ अर्पित किया, लेकिन उसमें अहंकार था। उस गरीब लकड़हारे का एक लोटा जल प्रेम, विश्वास और समर्पण से भरा था, इसलिए वह हमें अधिक प्रिय है।”
सुबह होते ही व्यापारी का अहंकार टूट गया। वह मंदिर पहुंचा, लकड़हारे से क्षमा मांगी और उसके साथ मिलकर गांव में कुएं खुदवाने, तालाबों की सफाई कराने और जरूरतमंद लोगों की सहायता करने लगा। कुछ ही दिनों बाद घनघोर वर्षा हुई। सूखी धरती फिर से हरी-भरी हो गई और पूरे राज्य में खुशहाली लौट आई। तभी लोगों ने समझा कि सच्ची पूजा केवल मंदिर में चढ़ावे से नहीं, बल्कि विनम्रता और निष्काम भक्ति से होती है।
