ओ. सी. गांगुली: भारतीय कला इतिहास का वो ‘मौन पुरोधा’, जिसे हिंदी समाज ने भुला दिया
कला इतिहासकार, संपादक और दस्तावेज़कार ओ. सी. गांगुली ने भारतीय कला को व्यवस्थित अध्ययन की मजबूत जमीन दी, फिर भी हिंदी भाषी समाज में उनका नाम आज तक सीमित दायरे में ही जाना जाता है।
भारतीय आधुनिक कला के इतिहास में कुछ ऐसे नाम हैं जिनके बिना इस इतिहास की कल्पना अधूरी है, किंतु विडंबना यह है कि वे स्वयं इतिहास के हाशिए पर चले गए। ओ. सी. गांगुली (1881–1974) ऐसा ही एक नाम है। आनंद कुमारस्वामी, ई. बी. हैवेल और पर्सी ब्राउन की तरह उन्होंने भी भारतीय कला के इतिहास-लेखन, दस्तावेज़ीकरण और वैचारिक स्थापना में असाधारण योगदान दिया, किंतु हिंदी भाषी समाज में उनका नाम आज भी लगभग अपरिचित है। कला इतिहास के विद्यार्थियों तक के बीच उनकी पहचान सीमित है, जबकि आधुनिक भारतीय कला के आरंभिक बौद्धिक ढाँचे के निर्माण में उनकी भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही।
ओर्धेन्द्र कुमार गांगुली का जन्म बंगाल में हुआ। वे ऐसे समय में सक्रिय हुए जब भारत में कला को लेकर एक नए राष्ट्रीय विमर्श का उदय हो रहा था। एक ओर औपनिवेशिक कला शिक्षा यूरोपीय अकादमिक यथार्थवाद को आदर्श मान रही थी, तो दूसरी ओर ई. बी. हैवेल और अबनीन्द्रनाथ ठाकुर भारतीय कला की स्वायत्त पहचान स्थापित करने का प्रयास कर रहे थे। गांगुली इसी वैचारिक वातावरण में विकसित हुए। वे स्वयं चित्रकार के रूप में नहीं, बल्कि कला इतिहासकार, आलोचक, संपादक, संग्रहकर्ता और दस्तावेज़कार के रूप में अधिक प्रसिद्ध हुए।
उनका सबसे बड़ा योगदान भारतीय कला को व्यवस्थित रूप से दर्ज करने का था। उन्होंने केवल कलाकृतियों का सौंदर्य-विवेचन नहीं किया, बल्कि उनके इतिहास, कलाकारों, शैलीगत विकास और सांस्कृतिक संदर्भों को भी गंभीरता से समझने का प्रयास किया। भारतीय लघुचित्र परंपराओं, विशेषकर मुगल, राजस्थानी और पहाड़ी चित्रकला, पर उनके अध्ययन ने उस समय की कला-चर्चा को नई दिशा दी। आज जब भारतीय कला इतिहास इन परंपराओं को स्वाभाविक रूप से स्वीकार करता है, तब यह याद रखना चाहिए कि एक समय इन्हें गंभीर अध्ययन का विषय बनाने का श्रेय कुछ गिने-चुने विद्वानों को जाता है, जिनमें ओ. सी. गांगुली प्रमुख थे। उनकी दूसरी महत्वपूर्ण भूमिका इंडियन सोसाइटी ऑफ ओरिएण्टल आर्ट से जुड़ी थी। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में यह संस्था भारतीय कला के पुनर्जागरण का प्रमुख केंद्र थी। यहीं से भारतीय कला को औपनिवेशिक दृष्टि से अलग देखने की वैचारिक प्रक्रिया मजबूत हुई। गांगुली इस संस्था के सक्रिय कार्यकर्ता ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने उसके प्रकाशनों और बौद्धिक गतिविधियों को भी दिशा दी।
कला-पत्रिका ‘रूपम’ का उल्लेख किए बिना उनके योगदान की चर्चा अधूरी रहेगी। रूपम केवल एक पत्रिका नहीं थी, वह भारतीय कला इतिहास के लिए एक दस्तावेज़ थी। इसमें प्रकाशित शोध-लेख, कलाकारों के परिचय, दुर्लभ चित्रों के पुनर्मुद्रण और कला-विमर्श ने भारतीय कला लेखन को एक गंभीर शैक्षणिक आधार प्रदान किया। उस समय जब कला पर नियमित लेखन की परंपरा विकसित ही हो रही थी, रूपम ने भारतीय और अंतरराष्ट्रीय विद्वानों के बीच संवाद का मंच उपलब्ध कराया।
गांगुली ने अबनीन्द्रनाथ ठाकुर सहित अनेक कलाकारों पर मोनोग्राफ लिखे। यह उस समय की एक नई विधा थी। उन्होंने कलाकारों को केवल जीवनी के स्तर पर प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि उनके कलादर्शन और रचनात्मक प्रक्रिया का विश्लेषण किया। आज कलाकारों पर मोनोग्राफ सामान्य बात लगती है, किंतु भारत में इसकी आरंभिक परंपरा विकसित करने वालों में गांगुली अग्रणी थे। फिर प्रश्न उठता है कि इतना महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व हिंदी भाषी समाज की स्मृति से लगभग अनुपस्थित क्यों है?
इसके कई कारण हैं, जिनमें पहला कारण भाषा है। गांगुली का अधिकांश लेखन अंग्रेजी में था। उनका बौद्धिक संसार बंगाल और अंग्रेजी भाषा के बीच निर्मित हुआ। उनकी पुस्तकों और लेखों का हिंदी में व्यवस्थित अनुवाद कभी नहीं हुआ। परिणामस्वरूप हिंदी के पाठकों तक उनका विचार ही नहीं पहुँच पाया।
दूसरा कारण हिंदी में कला लेखन की सीमित परंपरा है। बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में हिंदी क्षेत्र में कला पर व्यवस्थित आलोचनात्मक लेखन लगभग नहीं के बराबर था। साहित्यिक पत्रिकाओं में कला पर कभी-कभार लेख अवश्य प्रकाशित होते थे, किंतु कला इतिहास और कला आलोचना का स्वतंत्र अनुशासन विकसित नहीं हो पाया। इस कारण गांगुली जैसे विद्वानों के कार्य पर चर्चा का आधार ही नहीं बन सका।
तीसरा कारण कला शिक्षा का क्षेत्रीय असंतुलन है। आधुनिक भारतीय कला का प्रारंभिक नेतृत्व बंगाल, बंबई और मद्रास के हाथों में रहा। हिंदी क्षेत्र के कला महाविद्यालय अपेक्षाकृत बाद में सक्रिय हुए और लंबे समय तक बंगाल की शैक्षिक एवं वैचारिक परंपरा का अनुसरण करते रहे। विडंबना यह है कि उन्होंने उस परंपरा को अपनाया, किंतु उसके प्रमुख विचारकों का व्यवस्थित अध्ययन नहीं किया।
चौथा कारण संस्थागत विस्मृति है। भारत के अधिकांश कला महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों ने अपने बौद्धिक स्रोतों का अभिलेखीकरण नहीं किया। परिणामस्वरूप कला इतिहास केवल कुछ प्रसिद्ध कलाकारों तक सीमित होता गया, जबकि इतिहासकारों, संपादकों, संग्रहकर्ताओं और कला-आलोचकों का योगदान धीरे-धीरे ओझल हो गया। गांगुली भी इसी विस्मृति के शिकार हुए।
आज जब भारतीय कला इतिहास का पुनर्पाठ हो रहा है, तब ओ. सी. गांगुली को केवल बंगाल स्कूल के समर्थक के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय कला इतिहास के संस्थापक इतिहासकारों में एक के रूप में देखने की आवश्यकता है। उन्होंने भारतीय कला के लिए वह बौद्धिक आधार तैयार किया, जिस पर आगे चलकर अनेक विद्वानों ने अपना कार्य निर्मित किया। यदि आनंद कुमारस्वामी ने भारतीय कला को वैश्विक बौद्धिक प्रतिष्ठा दिलाई, तो ओ. सी. गांगुली ने उसके दस्तावेज़ीकरण, आलोचनात्मक अध्ययन और संस्थागत विमर्श को मजबूत आधार प्रदान किया।
हिंदी जगत के लिए अब समय आ गया है कि वह अपने कला-विमर्श का पुनर्मूल्यांकन करे। केवल कलाकारों का नहीं, बल्कि उन इतिहासकारों, संपादकों और आलोचकों का भी पुनर्पाठ आवश्यक है जिन्होंने भारतीय कला की बौद्धिक संरचना निर्मित की। ओ. सी. गांगुली का पुनर्स्मरण केवल एक भूले हुए विद्वान को श्रद्धांजलि देना नहीं होगा, बल्कि भारतीय कला इतिहास की उस उपेक्षित परंपरा को पुनः प्रतिष्ठित करना होगा, जिसके बिना आधुनिक भारतीय कला की कहानी अधूरी रह जाती है।
- सुमन कुमार सिंह
