जॉब का पहला दिन : जब मैंने अपने सपनों को नौकरी की मेज पर रखा

Amrit Vichar Network
Edited By Anjali Singh
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जीवन में कुछ तारीखें कैलेंडर के पन्नों पर दर्ज होती हैं और कुछ सीधे दिल पर। मेरी नौकरी का पहला दिन भी ऐसी ही एक तारीख है, जिसे मैं आज भी याद करती हूं, तो मन के किसी कोने में वही उत्साह, वही घबराहट और वही चमक लौट आती है।

सुबह जब आंख खुली तो सबसे पहले यही ख्याल आया। आज मेरा पहला दिन है। रोज की सुबह से वह सुबह बिल्कुल अलग थी। कपड़े चुनने से लेकर बाल संवारने तक, हर छोटी बात पर मेरा विशेष ध्यान था। मन में एक अजीब-सी बेचैनी थी। खुशी इस बात की थी कि मुझे नौकरी मिल गई थी और चिंता इस बात की कि न जाने नए लोग मुझे कैसे स्वीकार करेंगे, काम कितना कठिन होगा और मैं अपनी जिम्मेदारियां कितनी अच्छी तरह निभा पाऊंगी।

घर से निकलते समय मां की आंखों में मेरे लिए गर्व साफ दिखाई दे रहा था। उन्होंने हमेशा की तरह छोटी-सी हिदायत दी- “अपना ध्यान रखना और मन लगाकर काम करना।” उनके ये साधारण से शब्द उस दिन मेरे लिए किसी आशीर्वाद से कम नहीं थे। जब जीवन बीमा कंपनी के कार्यालय के सामने पहुंची तो कुछ पल के लिए ठिठक गई। सामने वही इमारत थी, जहां से मेरे जीवन का एक नया अध्याय शुरू होने वाला था। भीतर कदम रखते हुए मन में आया-कल तक मैं इस जगह के बारे में केवल सोचती थी, आज यही मेरी कर्मभूमि है।

कार्यालय में प्रवेश किया, तो चारों ओर अनजान चेहरे थे। कोई फाइलों में व्यस्त था, कोई कंप्यूटर पर काम कर रहा था और कहीं ग्राहकों से बातचीत चल रही थी। मुझे लगा जैसे हर व्यक्ति अपने काम को लेकर कितना सहज है और केवल मैं ही हूं, जिसे कुछ पता नहीं, लेकिन धीरे-धीरे परिचय हुआ। वरिष्ठ सहकर्मियों ने काम समझाया। किसी ने पॉलिसी के बारे में बताया, किसी ने ग्राहकों से बातचीत करने का तरीका समझाया। जब एक सहकर्मी ने मुस्कुराकर कहा, “पहले दिन किसी को सब कुछ नहीं आता,” तो मेरी झिझक कुछ कम हुई।

उस दिन मैंने जाना कि जीवन बीमा केवल कागजों, प्रीमियम और पॉलिसियों का काम नहीं है। यह लोगों के भविष्य से जुड़ा विश्वास है। किसी परिवार का कमाने वाला व्यक्ति जब अपने परिवार की आर्थिक सुरक्षा के लिए बीमा करवाता है, तो वह वास्तव में अपने पीछे एक भरोसा छोड़ना चाहता है। इस जिम्मेदारी का एहसास मुझे नौकरी के पहले ही दिन हो गया था।

दिन कब बीत गया, पता ही नहीं चला। शाम को कार्यालय से बाहर निकली तो सुबह वाली घबराई हुई लड़की कहीं पीछे छूट चुकी थी। उसकी जगह एक नई पहचान जन्म ले चुकी थी- एक कामकाजी महिला की पहचान। घर लौटते समय मन में एक अजीब-सी खुशी थी। उस दिन मुझे लगा कि नौकरी केवल आर्थिक स्वतंत्रता का साधन नहीं होती, वह आत्मविश्वास भी देती है। वह हमें अपने फैसले लेने, अपनी पहचान बनाने और अपने सपनों को आकार देने का अवसर देती है। आज वर्षों बाद भी जब उस पहले दिन को याद करती हूं, तो लगता है, वह सिर्फ नौकरी का पहला दिन नहीं था। वह मेरे भीतर की उस लड़की के आत्मनिर्भर महिला बनने की शुरुआत थी, जिसने उस दिन पहली बार महसूस किया था कि मैं भी अपने सपनों को अपनी मेहनत से सच कर सकती हूं।


तन्या सिंह, लखनऊ