महानगरों की छाया से कला को बाहर निकालने की एक कोशिश
समकालीन वैश्विक कला का संसार निरंतर नए प्रयोगों और नवाचारों से समृद्ध होता रहा है। सामान्यतः इसकी धुरी पश्चिमी देशों और महानगरों को माना जाता है, जहाँ बड़े संग्रहालय, कला दीर्घाएं, बिएनाले और कला बाजार केंद्रित रहे हैं। किंतु पिछले दो दशकों में यह परिदृश्य बदलने लगा है। दक्षिण-पूर्व एशिया, विशेषकर थाईलैंड, ने समकालीन कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय सक्रियता दिखाई है। बैंकॉक के संग्रहालयों, निजी कला फाउंडेशनों, कला मेलों और मुक्ताकाश कला परियोजनाओं ने उसे एशिया के उभरते सांस्कृतिक केंद्रों में स्थापित किया है। परिणामस्वरूप भारतीय कलाकारों, क्यूरेटरों और कला-प्रेमियों की रुचि भी अब थाईलैंड की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है।
कुछ दशक पहले तक एशियाई देशों के बीच कला-संवाद अपेक्षाकृत सीमित था। भारतीय समकालीन कला का झुकाव मुख्यतः यूरोप, विशेषकर फ्रांस, की ओर रहा। फ्रांसिस न्यूटन सूजा, सैयद हैदर रजा और रामकुमार जैसे अनेक प्रमुख भारतीय कलाकारों ने अपने जीवन और सृजन का महत्वपूर्ण समय फ्रांस में बिताया। फ्रांसीसी छात्रवृत्तियां भी लंबे समय तक भारतीय कला विद्यार्थियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहीं। बाद के वर्षों में वेनिस बिएनाले जैसे अंतर्राष्ट्रीय आयोजनों ने भारतीय कलाकारों को वैश्विक कला-विमर्श से और अधिक निकटता से जोड़ा। दूसरी ओर, एशिया के भीतर भी सांस्कृतिक आदान-प्रदान के उल्लेखनीय उदाहरण मिलते हैं। भारतीय लोककलाओं के संदर्भ में जापान का मिथिला म्यूजियम एक महत्वपूर्ण संस्था के रूप में स्थापित हुआ, जहां जनगढ़ सिंह श्याम तथा मिथिला चित्रकला के अनेक अग्रणी कलाकारों की कृतियां सुरक्षित हैं। संग्रहालय के संस्थापक टोकियो हसेगावा का नाम भारतीय लोककला जगत में अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने न केवल भारतीय लोककलाओं के संरक्षण और प्रदर्शन में उल्लेखनीय भूमिका निभाई, बल्कि भारत और जापान के बीच सांस्कृतिक संवाद को भी नई दिशा दी।
जारी है परियोजना का विस्तार
प्रमुख आकर्षणों में जापानी कलाकार फुजिको नाकाया की कृति ‘फॉग लैंडस्केप #48435’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जो निश्चित अंतराल पर घना कृत्रिम कोहरा छोड़ती है और पूरे परिदृश्य को एक रहस्यमय अनुभव में बदल देती है। इसके अतिरिक्त बर्लिन स्थित कलाकार-युगल एल्मग्रीन एंड ड्रैगसेट की कृति ‘के-बार’ भी दर्शकों को आकर्षित करती है। जंगली घासों के बीच बनी एक पगडंडी से पहुंचा जाने वाला यह छोटा-सा स्थापत्य, प्रकृति और मानवीय हस्तक्षेप के बीच संबंधों पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है। यही कलाकार टेक्सास के मार्फा के निकट स्थापित प्रसिद्ध ‘प्राडा मार्फा’ आर्ट इंस्टॉलेशन के लिए भी विश्वविख्यात हैं। परियोजना का विस्तार अभी जारी है। निकट भविष्य में यहां फ्रांसीसी कलाकार-युगल सीनोकोस्म की एक साउंड इंस्टॉलेशन तथा कोलंबियाई कलाकार डेल्सी मोरेलोस की एक मोनुमेंटल अर्थवर्क स्थापित की जाएगी।
इस विशाल भू-दृश्य कलाकृति का केंद्र लगभग 1,000 फुट लंबी सामुदायिक मेज होगी, जिसे एक तैरती हुई छत के नीचे निर्मित किया जा रहा है। यह केवल एक कलाकृति नहीं, बल्कि सामुदायिक सहभागिता और साझा सांस्कृतिक अनुभव का प्रतीक भी होगी। खाओ याई आर्ट फॉरेस्ट यह संकेत देता है कि इक्कीसवीं सदी की कला केवल दीर्घाओं और महानगरों की मोहताज नहीं है। वह प्रकृति, पर्यावरण और स्थानीय समुदायों के साथ नए संबंध स्थापित करते हुए ऐसे सांस्कृतिक भू-दृश्य भी रच सकती है, जहां कला और जीवन एक-दूसरे के पूरक बन जाएं।
खाओ याई आर्ट फॉरेस्ट का उदय
इस बदलते परिदृश्य में थाईलैंड के पोंग ता लॉन्ग स्थित खाओ याई आर्ट फॉरेस्ट का उदय विशेष महत्व रखता है। यह केवल एक मुक्ताकाश कला-संग्रहालय नहीं, बल्कि समकालीन कला, पर्यावरण संरक्षण और भूमि-पुनर्जीवन को एक साथ जोड़ने वाला प्रयोग है। यदि अब तक कला संस्थानों का विकास महानगरों के इर्द-गिर्द होता रहा है, तो यह परियोजना उस प्रवृत्ति से आगे बढ़कर कला को प्राकृतिक परिवेश और ग्रामीण भू-दृश्य के बीच स्थापित करने का प्रयास करती है। संभव है कि भविष्य में भारत में भी इस प्रकार की पहल देखने को मिले।
टाइम पत्रिका के ताजा विशेषांक में प्रकाशित दुनियाभर के घूमने योग्य 100 प्रमुख स्थानों की सूची में खाओ याई आर्ट फॉरेस्ट को भी स्थान दिया गया है। यह लगभग 89 एकड़ में फैला मुक्ताकाश संग्रहालय बैंकॉक से लगभग तीन घंटे की सड़क यात्रा की दूरी पर स्थित है। यह परियोजना ऐसे क्षेत्र में विकसित की गई है, जो पूर्व में वनों की कटाई और भूमि-क्षरण से प्रभावित रहा था। आज वही क्षेत्र कला और प्रकृति के सहअस्तित्व का उदाहरण बन रहा है। इस परियोजना की शुरुआत बैंकॉक स्थित परोपकारी मारिसा चेरावानोन्ट तथा इतालवी वास्तुकार से क्यूरेटर बने स्टेफानो राबोली पानसेरा ने की। उनका उद्देश्य केवल समकालीन कलाकारों के लिए एक नया मंच तैयार करना नहीं था, बल्कि कला के माध्यम से पर्यावरणीय पुनर्जीवन की प्रक्रिया को भी गति देना था।
इस दृष्टि से खाओ याई आर्ट फॉरेस्ट एक सांस्कृतिक परियोजना होने के साथ-साथ एक पारिस्थितिक पहल भी है। आज यहां आने वाले आगंतुक धान के खेतों, जंगलों और वृक्षाच्छादित पहाड़ियों के बीच फैले प्राकृतिक परिदृश्य में कला का अनुभव करते हैं। बांस से निर्मित कैफे, खुला भू-दृश्य और विभिन्न स्थानों पर स्थापित कलाकृतियां इस परिसर को पारंपरिक संग्रहालयों से अलग पहचान देती हैं। यहां कला किसी बंद भवन की दीवारों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि प्रकृति के साथ संवाद करती है।
- सुमन सिंह, कला लेखक
