किस्सा: थप्पड़

Amrit Vichar Network
Edited By Anjali Singh
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सर्वेश सिंह एक साधारण किसान थे। उनके बेटे अजय सिंह ने इंटरमीडिएट पास किया तो पिता की इच्छा थी कि वह इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़कर कुछ बड़ा बने। खेती से घर का खर्च चलता था, इसलिए बेटे को इलाहाबाद छोड़ते समय उन्होंने कहा, “बेटा, मन लगाकर पढ़ना। हम अमीर नहीं हैं। खेती से जो मिलता है, उसी से तुम्हारी पढ़ाई और घर का खर्च चलता है।” अजय ने भरोसा दिलाया कि वह पूरी मेहनत करेगा। 

विश्वविद्यालय में पढ़ाई शुरू हुई। गांव के सीधे-सादे माहौल से निकला अजय पहली बार सहशिक्षा के वातावरण में आया था। धीरे-धीरे उसकी नजर रोज सामने की सीट पर बैठने वाली अनुपमा सिंह पर टिकने लगी। पढ़ाई के साथ-साथ उसका मन अनुपमा की ओर खिंचने लगा। वह कमरे पर लौटता तो किताबों से अधिक अनुपमा का चेहरा याद आता। एक साल इसी उधेड़बुन में बीत गया और पढ़ाई पर असर पड़ने लगा।

दूसरे वर्ष उसने हिम्मत जुटाकर अनुपमा के नाम एक प्रेम-पत्र लिखा। उसमें उसने अपने मन की सच्ची भावनाएं व्यक्त करते हुए लिखा कि यदि कोई बात गलत लगे तो क्षमा कर देना, लेकिन उसे उससे प्रेम हो गया है। कई दिनों तक पत्र देने की हिम्मत नहीं हुई। आखिर एक दिन उसने कांपते हाथों से पत्र अनुपमा को दे दिया। अनुपमा ने बहुत आग्रह करने पर पत्र तो ले लिया, लेकिन अगले दिन पूरी कक्षा के सामने उसे बुलाकर जोरदार थप्पड़ मार दिया। अजय के लिए यह घटना किसी बड़े आघात से कम नहीं थी। कई दिनों तक वह कॉलेज नहीं गया। उसे लगा कि अब सब उसका मजाक उड़ाएंगे। तभी उसे पिता की बातें याद आईं“मन लगाकर पढ़ना।” उसने खुद को संभाला और तय किया कि वह गांव लौटकर हार नहीं मानेगा। धीरे-धीरे उसने अपना पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगा दिया। 

किताबें ही उसकी सबसे बड़ी मित्र बन गईं। उसने स्नातक पूरा किया और वर्षों की मेहनत के बाद पुलिस सेवा में चयनित होकर डीएसपी बन गया। जिस थप्पड़ ने कभी उसे तोड़ दिया था, वही उसके जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा बन गया। उधर अनुपमा सिंह की कहानी भी संघर्ष और सफलता की मिसाल थी। वह एक संपन्न परिवार की इकलौती बेटी थी। मां की सोच परंपरागत थी और वह जल्द विवाह कर देना चाहती थीं, जबकि पिता शिक्षा के समर्थक थे।

इंटरमीडिएट में प्रथम श्रेणी आने के बाद अनुपमा ने आगे पढ़ने की इच्छा जताई और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी जाने की जिद की। घर में विरोध हुआ, लेकिन उसने हार नहीं मानी। अंततः पिता बेटी की इच्छा के आगे झुक गए और बोले, “तुम्हें पढ़ने भेज रहा हूं, बस हमारे विश्वास और सम्मान को बनाए रखना।”

इलाहाबाद पहुंचकर अनुपमा ने पूरी निष्ठा से पढ़ाई की। उसके लिए किताबें ही सबसे बड़ा लक्ष्य थीं। उसने स्नातक और परास्नातक उत्कृष्ट अंकों से पूरा किया, फिर जेआरएफ परीक्षा उत्तीर्ण की। आगे चलकर वह डिग्री कॉलेज में प्राध्यापक नियुक्त हुई। जब वह सफलता हासिल कर घर लौटी तो मां की आंखों में भी गर्व था। पिता मुस्करा रहे थे। अनुपमा ने भावुक होकर कहा, “पिताजी, आप मेरे लिए केवल पिता नहीं, महामानव हैं। यदि आपने मुझ पर विश्वास न किया होता, तो मैं यहां तक कभी नहीं पहुंच पाती।”

यह कहानी केवल अजय और अनुपमा की नहीं, बल्कि जीवन के दो महत्वपूर्ण सत्य सिखाती है। असफलता और अपमान को यदि सकारात्मक ऊर्जा में बदल दिया जाए तो वही सफलता की सीढ़ी बन जाते हैं। वहीं बेटियों पर विश्वास, शिक्षा और अवसर उन्हें आत्मनिर्भर बनाकर पूरे परिवार और समाज का गौरव बढ़ाते हैं। पिता का विश्वास और संतान का परिश्रम मिल जाए तो सपनों को मंजिल तक पहुंचने से कोई नहीं रोक सकता।


राहुल सिंह, शाहजहांपुर