खोज : ऐसे हुआ लाउडस्पीकर का आविष्कार
आज सार्वजनिक सभाओं, धार्मिक आयोजनों, स्कूलों, रेलवे स्टेशनों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में लाउडस्पीकर आम उपकरण बन चुका है, लेकिन इसका विकास कई वैज्ञानिकों के योगदान का परिणाम है। लाउडस्पीकर के शुरुआती सिद्धांत की नींव वर्ष 1876 में अलेक्जेंडर ग्राहम बेल द्वारा टेलीफोन के आविष्कार के दौरान पड़ी। टेलीफोन में ध्वनि को विद्युत संकेतों में बदलने और फिर दोबारा ध्वनि में परिवर्तित करने की तकनीक ने आगे चलकर लाउडस्पीकर के विकास का मार्ग प्रशस्त किया।
आधुनिक मूविंग-कॉइल लाउडस्पीकर का आविष्कार वर्ष 1925 में अमेरिकी इंजीनियर चेस्टर डब्ल्यू. राइस और एडवर्ड डब्ल्यू. केलॉग ने किया। दोनों ने मिलकर ऐसा लाउडस्पीकर विकसित किया, जो विद्युत संकेतों को अधिक स्पष्ट, संतुलित और तेज ध्वनि में बदल सकता था। इसी तकनीक पर आधारित अधिकांश आधुनिक स्पीकर आज भी काम करते हैं। लाउडस्पीकर का कार्य सिद्धांत विद्युतचुंबकत्व पर आधारित है। इसमें एक चुंबक, वॉयस कॉइल और पतली डायफ्राम (कोन) होती है। जब विद्युत संकेत वॉयस कॉइल से गुजरते हैं, तो चुंबकीय क्षेत्र के प्रभाव से डायफ्राम तेजी से कंपन करता है और यही कंपन ध्वनि तरंगों के रूप में हमारे कानों तक पहुंचता है। रेडियो, टेलीविजन, मोबाइल फोन, कंप्यूटर, सिनेमा और सार्वजनिक उद्घोषणा प्रणालियों तक, लाउडस्पीकर ने संचार की दुनिया में क्रांतिकारी बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
वैज्ञानिक के बारे में
अमेरिकी इंजीनियर चेस्टर डब्ल्यू. राइस (1888-1951) और एडवर्ड डब्ल्यू. केलॉग (1882-1960) ध्वनि प्रौद्योगिकी के क्षेत्र के अग्रणी वैज्ञानिक थे। दोनों ने लंबे समय तक जनरल इलेक्ट्रिक में कार्य किया और ध्वनि पुनरुत्पादन पर महत्वपूर्ण शोध किए। राइस विद्युत अभियांत्रिकी और ध्वनि विज्ञान के विशेषज्ञ थे, जबकि केलॉग एक कुशल शोधकर्ता और आविष्कारक के रूप में प्रसिद्ध थे। दोनों वैज्ञानिकों का योगदान आज भी आधुनिक ऑडियो तकनीक की आधारशिला माना जाता है।
