प्रकृति के मौन प्रहरी : पतंगों के बिना अधूरी है जैव विविधता
पतंगे (मॉथ) प्रकृति के उन अनदेखे नायकों में शामिल हैं, जिनके बिना हमारी जैव विविधता, कृषि व्यवस्था और खाद्य श्रृंखला अधूरी पड़ सकती है। वैसे दुनियाभर में तितलियों के संरक्षण की बातें होती हैं, मधुमक्खियों के महत्व पर चर्चा होती है, लेकिन पतंगों को शायद ही कभी वह महत्व मिलता है, जिसके वे हकदार हैं। हाल ही में ब्रिटेन में रॉयल हॉर्टिकल्चरल सोसाइटी और वाइल्डलाइफ ट्रस्ट्स ने लोगों से अपील की कि वे अपने बगीचों में पतंगों और उनके कैटरपिलरों को पनपने दें। इस अभियान का संदेश सरल है। यदि हमें प्रकृति को बचाना है, तो हमें उन छोटे जीवों के लिए भी जगह बनानी होगी, जिन्हें हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। भारत जैसे जैव विविधता-समृद्ध देश में यह संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है।
भारत पतंगों की दृष्टि से दुनिया के सबसे समृद्ध देशों में से एक है। यहां लगभग 12,000 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं। हिमालय की ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं से लेकर पश्चिमी घाट के वर्षावनों तक, सुंदरबन के मैंग्रोव जंगलों से लेकर राजस्थान के शुष्क इलाकों तक, पतंगों की विविधता चकित कर देने वाली है। भारत में पाए जाने वाले कुछ पतंगे तो इतने आकर्षक होते हैं कि उन्हें देखकर किसी कलाकार की कल्पना का भ्रम हो सकता है। पूर्वोत्तर भारत में मिलने वाला एटलस मॉथ दुनिया के सबसे बड़े पतंगों में गिना जाता है। इसके पंखों का फैलाव लगभग 30 सेंटीमीटर तक हो सकता है। वहीं इंडियन मून मॉथ की हरी चमकदार रंगत और लंबी पूंछनुमा संरचना उसे किसी जीवित कलाकृति जैसा बना देती है।
फिर भी तितलियों की तुलना में पतंगे हमेशा उपेक्षित रहे हैं। इसका एक कारण उनका रात्रिचर होना भी है। जो जीव दिन में दिखाई देते हैं, उन्हें हम आसानी से पहचान लेते हैं, लेकिन रात के अंधेरे में अपना काम करने वाले जीव अक्सर हमारी नजर से दूर रह जाते हैं। कई पौधे ऐसे हैं, जो शाम ढलने के बाद खिलते हैं और अपनी तीव्र सुगंध के माध्यम से पतंगों को आकर्षित करते हैं। भारत में रजनीगंधा, रात की रानी, चमेली, बेला और हरसिंगार जैसे पौधे इसी श्रेणी में आते हैं। इनके फूल रात में खुलते हैं और उनकी खुशबू दूर तक फैलती है। यह सुगंध दरअसल पतंगों के लिए एक निमंत्रण होती है। जब पतंगे इन फूलों से रस ग्रहण करते हैं, तो अनजाने में परागण की प्रक्रिया भी पूरी करते हैं। यदि पतंगों की संख्या घटती है, तो इन पौधों के प्रजनन और जैव विविधता पर भी असर पड़ सकता है। अक्सर बागवान और किसान कैटरपिलरों (इल्लियों) को देखकर परेशान हो जाते हैं। पत्तियों में छेद दिखाई देते ही कीटनाशकों का छिड़काव शुरू हो जाता है, लेकिन हमें यह समझना होगा कि हर इल्ली किसी न किसी पतंगे या तितली का शुरुआती जीवन चरण है। यदि हम हर इल्ली को नष्ट कर देंगे, तो आगे चलकर पतंगों और तितलियों की संख्या भी घटेगी।
प्रकृति में कोई भी जीव अकेले नहीं रहता। एक कैटरपिलर किसी पक्षी के बच्चे का भोजन हो सकता है। वही आगे चलकर एक पतंगे में बदलकर फूलों का परागण कर सकता है। इसलिए पौधों की कुछ पत्तियों का नुकसान वास्तव में पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को जीवित रखने की कीमत है। ब्रिटेन के संरक्षण अभियान का एक महत्वपूर्ण संदेश यही है कि लोग पौधों को थोड़ा-बहुत नुकसान सहन करना सीखें। प्रकृति में पूर्णता नहीं, संतुलन महत्वपूर्ण है। पतंगे केवल परागणकर्ता ही नहीं हैं, बल्कि खाद्य श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण आधार भी हैं। पक्षियों की अनेक प्रजातियां अपने बच्चों को कैटरपिलर खिलाती हैं, क्योंकि उनमें प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है। चमगादड़ों का प्रमुख भोजन भी पतंगे ही हैं। इसके अलावा छिपकलियां, मेंढक और कई अन्य जीव इन पर निर्भर रहते हैं। यदि किसी क्षेत्र में पतंगों की संख्या कम होती है, तो उसका असर पूरे पारिस्थितिक तंत्र पर पड़ता है। इसीलिए वैज्ञानिक उन्हें पर्यावरणीय स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण संकेतक मानते हैं। जहां पतंगे स्वस्थ संख्या में मौजूद हैं, वहां आमतौर पर जैव विविधता भी बेहतर स्थिति में होती है।
दुर्भाग्यवश, दुनिया के कई हिस्सों की तरह भारत में भी पतंगों के सामने अनेक चुनौतियां हैं। शहरीकरण के कारण प्राकृतिक आवास तेजी से घट रहे हैं। खेतों और बगीचों में कीटनाशकों का बढ़ता उपयोग उनके जीवन चक्र को प्रभावित कर रहा है। जलवायु परिवर्तन भी उनके व्यवहार और प्रजनन पर असर डाल रहा है, लेकिन सबसे कम चर्चा जिस खतरे पर होती है, वह है प्रकाश प्रदूषण। आधुनिक शहरों की तेज कृत्रिम रोशनी पतंगों को भ्रमित कर देती है। वे दिशा खो बैठते हैं, ऊर्जा खर्च करते हैं और कई बार समय से पहले मर जाते हैं। रात को जगमगाते शहर हमारे लिए विकास का प्रतीक हो सकते हैं, लेकिन कई रात्रिचर जीवों के लिए यह एक गंभीर संकट है।
अच्छी बात यह है कि पतंगों के संरक्षण के लिए बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं है। छोटे-छोटे प्रयास भी बड़ा अंतर ला सकते हैं। यदि हम अपने घरों, बालकनियों या बगीचों में रात को खिलने वाले पौधे लगाएं, तो पतंगों के लिए भोजन उपलब्ध हो सकता है। चमेली, बेला, हरसिंगार, रातरानी और रजनीगंधा जैसे पौधे इस दिशा में उपयोगी हैं। देशी पेड़-पौधों को प्राथमिकता देना भी महत्वपूर्ण है। नीम, पीपल, बरगद, अर्जुन और करंज जैसे पौधे अनेक कीट प्रजातियों के लिए आश्रय प्रदान करते हैं,
जहां संभव हो, रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग कम करना चाहिए। कुछ पत्तियां इल्लियों के लिए छोड़ देना भी जैव विविधता संरक्षण में योगदान हो सकता है। विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि रात के समय अनावश्यक बाहरी रोशनी को सीमित किया जाए। इससे पतंगों और अन्य रात्रिचर जीवों को लाभ मिलता है।
दुनिया भर में ‘मॉथ वॉचिंग’ यानी पतंगों को देखने का शौक तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। भारत में भी प्रकृति प्रेमियों और शोधकर्ताओं के बीच इसकी रुचि बढ़ रही है। एक सफेद कपड़ा और हल्की रोशनी के सहारे लोग रात में पतंगों की अनेक प्रजातियों का अवलोकन कर सकते हैं। मोबाइल ऐप और नागरिक विज्ञान (सिटिजन साइंस) मंचों के माध्यम से आम लोग भी वैज्ञानिक अनुसंधान में योगदान दे रहे हैं। यह केवल एक शौक नहीं, बल्कि प्रकृति को समझने और उससे जुड़ने का माध्यम भी है।
पतंगे हमें एक महत्वपूर्ण सबक सिखाते हैं प्रकृति का हर जीव महत्वपूर्ण है, चाहे वह कितना ही छोटा या अनदेखा क्यों न हो। हम अक्सर जैव विविधता संरक्षण को बाघ, हाथी या गैंडे जैसे बड़े जीवों तक सीमित कर देते हैं, लेकिन पारिस्थितिकी की वास्तविक ताकत उन असंख्य छोटे जीवों में छिपी है, जो चुपचाप अपना काम करते रहते हैं। रात के अंधेरे में फूलों का परागण करने वाले ये नन्हें जीव हमें याद दिलाते हैं कि प्रकृति का संतुलन अनेक अदृश्य धागों से बुना गया है। यदि इनमें से कोई एक धागा टूटता है, तो पूरा ताना-बाना कमजोर पड़ सकता है। पतंगे को हम केवल एक कीट की तरह न देखें। वह शायद उस विशाल प्राकृतिक व्यवस्था का प्रतिनिधि है, जिसके सहारे हमारी खेती, हमारे जंगल और हमारा जीवन टिके हुए है।
