पौराणिक कथा : राजा कुंती के वरदान से माद्री का मातृत्व
महर्षि वैशंपायन ने महाराज जन्मेजय से कहा कि युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन के जन्म के एक समय बाद महाराज पांडु के मन में और संतान की इच्छा जागी। वे इस विषय में देवी कुंती से कुछ कहना चाहते थे, किंतु कुंती उनके मन की बात समझ गईं। उन्होंने दृढ़ स्वर में कहा कि शास्त्र आपत्तिकाल में भी तीन से अधिक संतान प्राप्त करने की अनुमति नहीं देते। इस दिव्य मंत्र का उद्देश्य केवल विशेष परिस्थिति में वंश रक्षा करना था, इसलिए उसका बार-बार प्रयोग उचित नहीं है। कुंती की स्पष्ट बात सुनकर पांडु मौन हो गए और उन्होंने अपनी इच्छा मन में ही दबा ली।
कुछ समय बाद छोटी रानी माद्री ने एकांत में पांडु के सामने अपना दु:ख प्रकट किया। उन्होंने कहा कि कुंती और गांधारी दोनों मातृत्व का सुख प्राप्त कर चुकी हैं, किंतु वह इस सौभाग्य से वंचित हैं। पांडु के शाप के कारण वह स्वयं संतान की इच्छा भी व्यक्त नहीं कर सकतीं। उन्होंने विनम्रतापूर्वक कहा कि यदि कुंती अपने दिव्य मंत्र के माध्यम से उन्हें भी संतान प्राप्ति का अवसर दें, तो उनका जीवन सफल हो जाएगा। पांडु ने उनकी पीड़ा समझी और आश्वासन दिया कि वह स्वयं कुंती से यह अनुरोध करेंगे। जब पांडु ने कुंती के सामने माद्री की इच्छा रखी, तो उन्होंने न्याय और धर्म दोनों दृष्टियों से इसे उचित माना। शुभ मुहूर्त में उन्होंने माद्री को स्नेहपूर्वक बुलाया और कहा कि वह किसी एक देवता का मन से स्मरण करें। उसी देवता के प्रभाव से उन्हें पुत्र की प्राप्ति होगी।
माद्री ने बड़ी चतुराई से जुड़वां देवताओं अश्विनी कुमारों का आह्वान किया। चूंकि दोनों देवता एक साथ माने जाते हैं, इसलिए उनके आशीर्वाद से माद्री को एक साथ दो पुत्र प्राप्त हुए। उनका नाम नकुल और सहदेव रखा गया। माद्री की इस बुद्धिमानी को देखकर कुंती को आश्चर्य भी हुआ और उनके मन में कुछ खिन्नता भी उत्पन्न हुई, क्योंकि उन्होंने एक मंत्र से दो पुत्र प्राप्त कर लिए थे। नकुल और सहदेव के जन्म के बाद पांडु ने पुनः कुंती से आग्रह किया कि वह माद्री के लिए एक बार और मंत्र का प्रयोग करें।
किंतु कुंती ने विनम्रता से इंकार करते हुए कहा कि माद्री पहले ही एक मंत्र से दो पुत्र प्राप्त कर चुकी हैं। यह वरदान केवल आपत्तिकाल के लिए था, उसका बार-बार उपयोग उचित नहीं। उन्होंने पांडु को यह भी स्मरण कराया कि आकाशवाणी के अनुसार उनके पांचों पुत्र महान पराक्रमी होंगे, इसलिए अब संतोष ही सबसे बड़ा धर्म है। पांडु भी उनकी बात से सहमत हो गए और फिर कभी इस विषय को नहीं उठाया। इस प्रकार युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव ये पांचों पांडव क्रमशः बड़े होने लगे। महर्षि वैशंपायन ने कहा कि शतशृंग पर्वत के शांत वन में पांडु का परिवार एक फलती-फूलती लता की भांति विकसित होने लगा।
