मक्का समझौता : भारत की रणनीतिक चुनौती

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RAJESH
राजेश जैन,
वरिष्ठ पत्रकार

मक्का से निकली एक खबर ने पश्चिम एशिया से लेकर दक्षिण एशिया तक रणनीतिक समीकरणों पर नई बहस छेड़ दी है। 7 अगस्त को सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने मक्का में संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। समझौते का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान है कि तीनों में से किसी एक देश पर सशस्त्र हमला, तीनों पर हमला माना जाएगा। इसी प्रावधान ने इसे ‘इस्लामिक नाटो’ कहे जाने की चर्चा को जन्म दिया है, लेकिन असली सवाल यह है कि इससे क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन किस दिशा में जाएगा और भारत के लिए इसकी चुनौती कितनी गंभीर होगी।

पहली नजर में तीनों देशों की ताकत का मेल प्रभावशाली है। पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार और बड़ी सैन्य क्षमता है। तुर्किये के पास आधुनिक रक्षा उद्योग, ड्रोन तकनीक और नाटो का सैन्य अनुभव है। वहीं सऊदी अरब के पास आर्थिक ताकत, ऊर्जा संसाधन और अरब दुनिया में महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रभाव है। इसे अभी ‘इस्लामिक नाटो’ कहना जल्दबाजी होगी। नाटो के पीछे साझा कमान, एकीकृत सैन्य योजना, संयुक्त सैन्य ढांचा, नियमित अभ्यास और दशकों का संस्थागत अनुभव है। मक्का समझौते में मंत्रीस्तरीय समिति और स्थायी सचिवालय की व्यवस्था जरूर है, लेकिन इसकी ऑपरेशनल डिटेल्स आगे तय होनी हैं।

तीनों देशों के रणनीतिक हित भी पूरी तरह एक जैसे नहीं हैं। सऊदी अरब की प्राथमिकता खाड़ी की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता है। तुर्किये के हित पश्चिम एशिया, यूरोप और भूमध्य सागर तक फैले हैं। पाकिस्तान का रणनीतिक ध्यान मुख्य रूप से भारत पर केंद्रित रहा है। यदि खुफिया सहयोग, संयुक्त सैन्य अभ्यास और रक्षा तकनीक का हस्तांतरण बढ़ता है, तो यह क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।

भारत के लिए सबसे संवेदनशील पहलू पाकिस्तान की मौजूदगी है। पाकिस्तान को सऊदी अरब की आर्थिक ताकत और तुर्किये की रक्षा तकनीक से रणनीतिक सहारा मिल सकता है। इससे उसे भारत के साथ किसी संकट में अतिरिक्त राजनीतिक और सैन्य विकल्प मिल सकते हैं। मई 2025 के भारत-पाकिस्तान तनाव के दौरान तुर्किये का पाकिस्तान के पक्ष में राजनीतिक रुख भी भारत की चिंताओं को बढ़ाता है।

भारत को सबसे ज्यादा सावधानी सऊदी अरब को लेकर बरतनी होगी। रियाद के पाकिस्तान के साथ संबंध महत्वपूर्ण हैं, लेकिन भारत के साथ भी उसके गहरे आर्थिक और रणनीतिक हित जुड़े हैं। ऊर्जा, निवेश, व्यापार और भारतीय प्रवासी समुदाय दोनों देशों को जोड़ते हैं। इसलिए मक्का समझौते को सऊदी अरब का भारत-विरोधी मोर्चा मान लेना भूल होगी। भारत को रियाद के साथ संबंध गहरे करने चाहिए।

यह सवाल भी उठता है कि क्या मक्का समझौता शिया ईरान के खिलाफ सुन्नी गठजोड़ है। सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान तीनों सुन्नी-बहुल देश हैं और ईरान एक प्रमुख शिया शक्ति है, लेकिन इसे सीधे ईरान विरोधी सैन्य गठबंधन कहना जल्दबाजी होगी। समझौता आधिकारिक रूप से रक्षात्मक है और तीनों देशों के ईरान के साथ संबंध जटिल हैं। खासकर पाकिस्तान और तुर्किये के लिए ईरान के खिलाफ किसी स्पष्ट सैन्य मोर्चे का हिस्सा बनना आसान नहीं होगा।

भारत को मक्का समझौते के जवाब में किसी नए सैन्य गठबंधन में शामिल होने के बजाय अपनी बहु-संरेखीय कूटनीति को मजबूत करना चाहिए। अमेरिका के साथ हिंद-प्रशांत साझेदारी, रूस के साथ रक्षा संबंध, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के साथ रणनीतिक रिश्ते, इजराइल के साथ रक्षा-तकनीक सहयोग और ईरान के साथ चाबहार संपर्क भारत के अलग-अलग रणनीतिक विकल्प हैं। इन्हें एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करने के बजाय राष्ट्रीय हित के अनुरूप मजबूत करना अधिक उपयोगी होगा।

मक्का समझौता भारत को डरने का नहीं, अपनी ताकत बढ़ाने का संदेश देता है। इसकी असली परीक्षा आने वाले समय में होगी। क्या तीनों देश नियमित सैन्य अभ्यास करेंगे? क्या खुफिया सहयोग संस्थागत रूप लेगा? क्या रक्षा उत्पादन और तकनीक हस्तांतरण बढ़ेगा? क्या दूसरे देश इस व्यवस्था से जुड़ेंगे? इन्हीं सवालों के जवाब तय करेंगे कि यह समझौता प्रतीकात्मक पहल रह जाता है या क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था को वास्तव में बदल देता है।

आगे चलकर इसकी वास्तविक परीक्षा होगी। मक्का का सबसे बड़ा संदेश यही है कि दुनिया अब स्थायी खेमों से ज्यादा लचीले रणनीतिक नेटवर्क की ओर बढ़ रही है। ऐसे दौर में भारत के लिए सही नीति किसी एक गुट का हिस्सा बनना नहीं, बल्कि स्वयं इतना मजबूत शक्ति-केंद्र बनना है कि दूसरे देशों को अपनी रणनीति बनाते समय भारत के हितों और भूमिका को ध्यान में रखना पड़े। यही मक्का समझौते का सबसे व्यावहारिक और दूरगामी जवाब होगा। ( ये लेखक के निजी विचार हैं )

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