मुट्ठी में सिर्फ तकदीर नहीं, भारत का भविष्य भी है
नन्हें-मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है…! बचपन में सुना यह गीत आज अचानक जैसे नए अर्थों के साथ हमारे सामने खड़ा है। तब यह एक मासूम गीत था। आज यह सवाल है। सवाल सत्तापक्ष से है, तो विपक्ष से भी है। सवाल लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को चलाने वाली संस्थाओं से है। हमें भी इस सवाल का जवाब अब तलाशना ही होगा कि क्या देश की नई पीढ़ी उन लोगों की ज्यादा समीक्षा करने लगी है, जो उसके भविष्य के फैसले लेने का दावा करते हैं?
असल में, जेन-जी ने केवल भारतीय राजनीति को आईना नहीं दिखाया है। उसने लोकतंत्र के चारों स्तंभों को भी यह सोचने पर मजबूर किया है कि कहीं वे उस समाज से पीछे तो नहीं छूट गए, जिसकी सेवा और प्रतिनिधित्व का दावा वे करते हैं। यह किसी एक सरकार या किसी एक राजनीतिक दल का सवाल नहीं है। यह पूरी व्यवस्था की परीक्षा है। युवा सिर्फ नाराज नहीं है। वह बेचैन है। वह सवाल पूछ रहा है। वह अपने भविष्य को लेकर आश्वस्त होना चाहता है। वह पूछता है- शिक्षा मिलेगी तो उसके बाद रोजगार कहां है? डिग्री मिलेगी तो अवसर कहां हैं? मेहनत करेगा तो व्यवस्था उसे पहचानने के लिए तैयार है या नहीं? और अगर वह सवाल पूछेगा तो क्या उसे असहमति के बजाय समस्या समझा जाएगा?
यही वह स्थितियां है, जहां पुरानी राजनीति और नई पीढ़ी के बीच सबसे बड़ी दूरी दिखाई देती है। पुरानी राजनीति अक्सर युवा को चुनाव के समय याद करती है। नई पीढ़ी चाहती है कि उसे चुनाव के बीच के पांच वर्षों में भी सुना जाए। यही अंतर आने वाले समय की राजनीति की दिशा तय करेगा। लोकतंत्र के चारों स्तंभों को आज एक-एक आईने के सामने खड़ा होने की जरूरत है।
विधायिका से पूछा जाना चाहिए- क्या संसद और विधानसभाओं में होने वाली बहसें उस युवा की बेचैनी को आवाज दे रही हैं, जो अपने भविष्य को लेकर चिंतित है? क्या राजनीति का विमर्श रोजगार, शिक्षा, तकनीक, जलवायु, मानसिक स्वतंत्रता और अवसर की समानता जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द पर्याप्त मजबूती से घूम रहा है? कार्यपालिका से सवाल है- नीतियां कागज से निकलकर नागरिक के जीवन तक कितनी तेजी से पहुंच रही हैं? क्या सरकारी तंत्र युवा को सुविधा देने वाली व्यवस्था बन रहा है या प्रक्रियाओं और प्रमाणपत्रों के जाल में उसे उलझा रहा है?
न्यायपालिका के सामने सवाल अलग लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण है- न्याय की गरिमा तभी कायम रहेगी, जब आम नागरिक को न्याय समय पर, सुलभ और भरोसेमंद तरीके से मिले। और पत्रकारिता? उसके सामने शायद सबसे कठिन आईना है। जिस पत्रकारिता से जनता सत्ता से सवाल पूछने की उम्मीद करती है, अगर वही पत्रकारिता राजनीतिक खेमों की आवाज बन जाए तो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कमजोर होता है। पत्रकारिता का काम किसी सरकार को गिराना या बचाना नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल और समाज से संवाद करना है। विश्वास खोने वाली पत्रकारिता चाहे कितनी ऊंची आवाज में बोले, उसकी विश्वसनीयता कम होती जाती है।
दरअसल, दुनिया के कई देशों में युवाओं ने राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था को झकझोरा है। कहीं बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठी, कहीं राजनीतिक जवाबदेही के लिए, तो कहीं लोकतांत्रिक अधिकारों और बेहतर भविष्य के लिए। इन आंदोलनों का परिणाम हर जगह एक जैसा नहीं रहा।
कहीं व्यवस्था को झुकना पड़ा, कहीं नीतियां बदलीं, कहीं नेतृत्व बदला और कहीं आंदोलन अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच सके, लेकिन एक बात लगभग हर जगह समान रही- व्यवस्था को यह एहसास हुआ कि युवा को अनदेखा करना आसान नहीं है।
आज एक युवा के हाथ में सिर्फ मोबाइल फोन नहीं है, उसके हाथ में सूचना है, संवाद है, संगठन की क्षमता है और अपनी बात दुनिया तक पहुंचाने का माध्यम है। इसलिए आज की पीढ़ी को पुराने राजनीतिक चश्मे से देखना सबसे बड़ी भूल होगी।
प्रकृति का नियम भी यही है- संतुलन। प्रकृति किसी एक शक्ति को अनंत समय तक हावी नहीं रहने देती। जंगल में यदि किसी एक प्रजाति की संख्या जरूरत से ज्यादा बढ़ जाए, तो पूरा पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ता है। फिर प्रकृति किसी दूसरे तत्व को सक्रिय करती है और धीरे-धीरे एक नया संतुलन बनता है।
सच पूछिए तो लोकतंत्र भी इसी सिद्धांत पर चलता है। सत्ता मजबूत हो, तो विपक्ष संतुलन बनाता है। सरकार से सवाल कमजोर पड़ें, तो जनता चुनाव में जवाब देती है। संस्थाएं कमजोर हों, तो नागरिक समाज आवाज उठाता है। मीडिया पर भरोसा घटे तो वैकल्पिक माध्यम सामने आते हैं और जब पुरानी राजनीतिक भाषा नई पीढ़ी की बेचैनी को समझने में असफल होती है, तो युवा अपनी भाषा खुद गढ़ लेता है। यही लोकतंत्र का प्राकृतिक संतुलन है।
इसे विद्रोह कहकर दबाने की कोशिश करना उतना ही खतरनाक है, जितना हर विरोध को क्रांति मान लेना।
युवा की आवाज को सुनना होगा, लेकिन युवाओं को भी समझना होगा कि लोकतंत्र सिर्फ सड़क पर नारों से नहीं, बल्कि संस्थाओं, संविधान, तथ्यों और जिम्मेदार नागरिकता से मजबूत होता है। हमें समझना होगा कि हर युवा विरोधी नहीं है। वह सिर्फ अपने भविष्य का पक्षधर है। दलों को भी समझना होगा कि हर युवा उसका स्वाभाविक समर्थक नहीं है।
मुट्ठी में है तकदीर हमारी- इस पंक्ति को आज फिर से पढ़ने का समय है। क्योंकि इस बार मुट्ठी में केवल बच्चों की तकदीर नहीं है। इसमें भारत की अगली राजनीतिक, सामाजिक और लोकतांत्रिक दिशा भी है। नई पीढ़ी पूछ रही है- हमारे नाम पर फैसले कब तक होंगे? हमारे भविष्य की चर्चा हमारे बिना कब तक होगी?
इन सवालों का जवाब डेमोक्रेसी चलाने वाली सभी संस्थाओं को और अंततः पूरे समाज को देना है। क्योंकि लोकतंत्र केवल संस्थाओं का ढांचा नहीं है। लोकतंत्र जनता का भरोसा है। आज की जेन-जी उस भरोसे का नया पैमाना लेकर सामने खड़ी है। अब सवाल यह नहीं कि युवा क्या चाहता है। यक्ष प्रश्न यह है कि क्या व्यवस्था खुद को इतना बदलने के लिए तैयार है कि युवा उसमें अपना भविष्य देख सके?
