कारी बदरिया बहनी लागे, बदरा भैया लगे हमार
बरसात का महीना बड़ा सुहावना होता है। सावन और भादों दोनों महीनों में झमाझम पानी बरसता है। किसान, मयूर और धरती थिरकने लगती है। अनेक तीज त्योहार मनाए जाते हैं। अवध, बृज और बुंदेलखंड आदि क्षेत्र में वर्षा का आगमन होते ही धरती की प्यास बुझ जाती है। सूखे खेतों में पानी बरस जाने से कृषक अपनी खरीफ की फसल की तैयारी करने लगते हैं। बरखा से कुंए ताल-तलैया, पोखर और झील लबालब हो जाते हैं। नदी नाले अपने तट तोड़ कर बहने लगते हैं। झरने गीत गाने लगते हैं।
वर्षा ऋतु के सुहावन सावन और भादों मास में अंधेरी रात में बिजली के चमकने, पपीहा के पिउ-पिऊ की टेर वन में मोरों का नाचना, मेंढ़कों की टर्र-टर्र की ध्वनि और नदियों प्रवाह मन को लुभाने लगता है। युवतियां गा उठती हैं- सावन मास सुहावन महिमा निसि अंधियारी रे।/बिजली चमक जो जियरा ललचे, छतियन छलकत यौवन रे।। भादों मास भयंकर महिना, चारउ दिसि नदियां धाई रे।/दादुर बोलें, पपहिया बोले वन कॉकत है मोर रे।।
एक समय था जब सावन के प्रारंभ होते ही गांव-गांव में स्थान-स्थान पर नीम आम के वृक्षों पर झूले पड़ जाते थे। इन झूलों पर कन्याएं और वधुएं बड़े जोर सो पेंग भरती हुई गीत गा गाकर खुशी से झूम उठती थीं। एक चना दो देवली, माई सावन आयो।/ को कोसी बिटियां दूर री माई, सावन आयो।।/ का को से भईया लिखाउन जो बुलाउन जैहें।/नीले से घुड़ला ,कुदाउत जै हैं, लाल छडी बमकाउत जैहें।। भाइयों और बहनों का नाम लेकर गीत को आगे बढ़ाया जाता है। बहुत से भाई अपनी बहनों को ससुराल से लिवा लाए हैं, जो मायके में झूला झूलकर सावन की बहार का आनंद ले रही हैं। परंतु बहुत सी बहन ऐसी भी हैं, जो ससुराल में अपने भाइयों के आने की प्रतीक्षा में हैं। मान सिंह की बहन सुभद्रा भी उनमें से एक है, जो अभी मायके न जा सकने के कारण बहुत दुखी है। मान सिंह का रामरो गीत में लोक गायक ने उसकी वेदना का मार्मिक चित्र खींचा है।
या सबकी बहिनियां झूले हिंडोरा/तुमरी बहिन बिसूरे परदेस।/ कि मोउआ पते दो बमना पढ़ दो/ बैड़या जू को दिन घर आए। कजली अथवा कजरिया बुंदेलखंड, अवध और भोजपुरी का प्रमुख त्योहार है। एक नवयुवती अपनी सहेलियों के साथ कजलियां खेलने जाना चाहती है। परंतु आकाश में बादल घिर आए हैं और वर्षा होने से वह कजरी खेलने नहीं जा सकी, जिसकी उसके मन में बड़ी ललक थी। कैसे खेलन जैहों सावन में कजरियां/ बदरिया घिर आई री सखी।। बिजुरी चमकन लागी/ बादर गर्जन लागे।।/मेरो धक-धक होय करेजवा, बदरिया धिर आई री सखी।।/ पवन सन सन हे सखि,बादर कड़ कड़ वा तो पवन चले पुरवइया,/बदरिया घिर आई री सखी।। नायिका बादल-बदरी से भाई-बहन का नाता जोड़कर उससे अपनी अटरिया छत पर बरसने का निवेदन करती है, जिससे उसका प्रियतम परदेस न सके और वह प्रिय के साथ एक रात और बिता सके। कारी बदरिया बहना लागे, बदरा भैया लगे हमार।/आज बरस जा मोरी अटरिया बालम आज घरे रह जाएं।
बुंदेलखंड और अवध क्षेत्र ब्रज क्षेत्र तथा भोजपुरी क्षेत्रों में सावन और भादो मास में अनेक तीज-त्योहार मनाया जाते हैं। झूला झूला जाता है और गौरा शिव पार्वती की पूजा की जाती है। देवी गीत के साथ ही कजरी गीत गाने की परंपरा आज भी है। महोबा में कजरी मेला लगता है, तो बनारस, मिर्जापुर और रामनगर में कजरी गाई जाती है। झूला झूला जाता है और लोक कवियों के कजरी गायन दंगल होते हैं। अब यह परंपरा लुप्त होती जा रही है। इसे पुनः जीवंत करने की जरूरत है।
