इंटरनेट के दौर में बदलती भाषा का प्रश्न

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इंटरनेट मीडिया ने भारतीय युवाओं की पारंपरिक सोच पर खासा असर डाला है। यहां तक कि गांव भी इसके असर से अछूते नहीं हैं। अहम सवाल यह है कि क्या इसका असर हमारी भाषा-संस्कृति पर भी पड़ रहा है?

अनिल त्रिगुणायत
अनिल त्रिगुणायत, लखनऊ 

प्रत्येक पीढ़ी के लोगों को अपना अतीत सुनहरा लगता है। ऐसे लोग उस वक्त की भाषा, अभिव्यक्ति, समरसता, सम्मान, अनुशासन, माहौल, मर्यादा तथा उत्तम जीवन शैली को सर्वोपरि मानते रहे हैं। समय के साथ हमारे देश में आम बोलचाल के तौर-तरीके भी बदले हैं। संचार क्रांति ने हमारे जीवन को प्रभावित किया है। कभी एक टेलिफोन लगवाने को दर-दर भटकने वाले सामान्य भारतीय के हाथ में आज इंटरनेट से सुसज्जित मोबाइल है। देश-दुनिया की गतिविधियों से वे रोजाना रूबरू हो रहे हैं। वैश्विक वातावरण, संस्कृति व रहन-सहन से दो-चार भी खूब हो रहे हैं। इंटरनेट मीडिया लोगों की पारंपरिक सोच भी बदलते दिख रहा है। इसकी वजह से शहर और गांव का विभेद मिट सा गया है। 

विश्व फैशन नगरी पेरिस (फ्रांस) का नवीनतम पहनावा व पाश्चात्य देशों में जीवन स्तर कैसा है, वह भारत के सुदूरवर्ती गांव के लोगों को भी पल भर में पता चल जा रहा है। भारत में रहते हुए वे हॉलीवुड के धनवान सेलिब्रेटी बनने की चाह रखने लगे हैं। विकसित राष्ट्रों की सामाजिक गतिविधियों से जुड़ने के बाद देश के लोगों में उन्मुक्त जीवन जीने की प्रवृत्ति व मानसिक स्वच्छंदता बढ़ गई है। इस जुड़ाव ने हमारी भाषा, परंपरा व जीवन मूल्यों को बेहद प्रभावित किया है। शहर या गांव के अधिकांश लोग सामाजिक दबावों को अपनी स्वतंत्रता में बाधक मानने लगे हैं। रूढ़िवादी परंपरा व मर्यादा को आउटडेटेड व दकियानूसी बताने लगे हैं।

तमाम लोग सामाजिक रीतियों को धता बताते हुए स्वच्छंद जीवन शैली की ओर मुखातिब होते दिख रहे हैं। हमारी समृद्ध संस्कृति व परंपराएं पाश्चात्य दिशा में जाने को आतुर हैं। कभी ‘तोल-मोल’ कर बोली जाने वाली हमारी भाषा अब कदाचित विद्रूप स्वरूप लेने लगी है। अधपकी जानकारी से आज के अधिकांश लोग न चिंतक बन पा रहे, न ही विश्लेषक। इंटरनेट मीडिया के टूल अर्थात व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, मेल तथा एसएमएस की भाषा व अभिव्यक्ति से भान हो रहा कि हमारी मर्यादित वाणी अधोगति की ओर जा रही है। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर बिना किसी सेंसरशिप के गाली-गलौच व अश्लील संवादों को 'कूल' या 'आधुनिक' दिखाकर परोसा जा रहा है। 

कभी सामान्य भाषा पर भी लजा जाने वाले तमाम लोग आज सार्वजनिक स्थलों पर धड़ल्ले से अश्लील बातें करने में अपनी शान समझने लगे हैं। माध्यमिक व उच्च शिक्षण संस्थानों के साथ ही सार्वजनिक जगहों पर अभद्र भाषा का मुखरता से प्रयोग करते देखा जा सकता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भाषा ही वह औजार है जो मनुष्य को पशु से भिन्न करती है, विचारवान बनाती है। भाषा, संस्कार व संस्कृति का आपस में गहरा संबंध है। व्यक्ति की भाषा ही उसके संस्कारों का आइना होती है। वह वही बोलता है जो सोचता व समझता है। भाषा ही हमारी संस्कृति की रीढ़ होती है। शब्दों से हमारे संस्कार झलकते हैं। जब भाषा का स्वरूप बिगड़ता है, तो समाज की वैचारिक और सांस्कृतिक नींव भी कमजोर होने लगती है। 

सामान्य भारतीयों की भाषा ने जहां समाज को आज प्रभावित किया है, वहीं राजनीतिज्ञों की भाषा भी पटरी से उतरते दिख रही है। सत्ता में बैठे लोगों द्वारा इस्तेमाल किए गए शब्द प्रशासनिक संस्थाओं, राजनीतिक कार्यकर्ताओं, नागरिक समाज व आमजन की सोच पर असर डालते हैं। भारतीय संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है, हालांकि ये अधिकार युक्तिसंगत संवैधानिक प्रतिबंधों के अधीन हैं। सत्ता-शक्ति असंतुलन ने भी भाषा, तीक्ष्ण वाद-विवाद व वाकपटुता को प्रभावित किया है। अमर्यादित भाषा शैली ने संसद से सड़क तक को आगोश में ले लिया है। 

लोकतंत्र की शक्ति सर्वसम्मति में नहीं, असहमति को संभालने की क्षमता में होती है। मजबूत लोकतंत्र वह नहीं, जिसमें हर नागरिक सत्ता की प्रशंसा करे। बल्कि वह है, जिसमें नागरिक वाजिब व तीखे प्रश्न पूछ सकें और सरकार उन प्रश्नों का तथ्यपूर्ण उत्तर देने के लिए तैयार रहे। यदि कोई आरोप गलत है तो तथ्य उसे गलत सिद्ध कर सकते हैं। यदि कोई नीति सही है, तो उसके परिणाम उसका बचाव कर सकते हैं। यदि कोई व्यक्ति वास्तव में कानून तोड़ता है तो न्यायिक प्रक्रिया उसके विरुद्ध कार्रवाई का रास्ता तय कर सकती है, इसलिए भारत को ऐसी राजनीतिक संस्कृति की आवश्यकता है, जिसमें हिंसा के प्रति शून्य सहनशीलता हो, लेकिन शांतिपूर्ण असहमति के लिए पर्याप्त लोकतांत्रिक स्थान भी हो। 

आपसी वाद-विवाद में भाषा की मर्यादा को उच्च स्थान देना ही होगा। नाराज समूह की भाषा व भावनाएं लक्ष्मण रेखा पार न करें, इसके लिए सिस्टम की संस्थाओं को निष्पक्ष रहना होगा। संसद व विधानसभाओं को सार्थक संवाद का मंच बनना होगा। राजनीतिक दलों को शब्दों की जिम्मेदारी समझनी होगी। अमर्यादित भाषा समाज के नैतिक व सामाजिक ताने-बाने को नष्ट करने वाला एक ऐसा नासूर है, जो हमारे संबंधों में जहर घोलता है। वाणी की मधुरता व तार्किकता समाज को जोड़ती है। अपशब्द, गाली-गलौच व अमर्यादित टिप्पणियां समाज में मानसिक प्रदूषण फैलाने को काफी होती हैं। 

जान लें, अभद्र भाषा अक्सर छोटी-मोटी बहस को भी गंभीर शारीरिक या कानूनी हिंसा में बदल देती है। इंटरनेट मीडिया पर अमर्यादित भाषा के कारण ट्रोलिंग, साइबर बुलिंग व सामाजिक वैमनस्यता ‘सुरसा की मुंह’ की भांति बढ़ रहा है। हमारे यहां तो लिखा और कहा भी गया है कि ‘ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय। औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय।’ बोले गए एक-एक शब्द हमारे आंतरिक गुण व दोष को समाज के सामने रख देते हैं। अतएव भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि हमारे चरित्र का आईना भी है। समाज को सही राह दिखाने को हमें वाणी की मर्यादा का पालन करना ही होगा।

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