गंगा किसकी, पानी किसका और दर्द बिहार का
नदी का पानी खेत में उतरता है, तो किसान उसे बाढ़ कहता है और वही पानी गर्मियों में कम पड़ जाए तो प्यास। बिहार में गंगा का यही सबसे बड़ा विरोधाभास है।
नदी का पानी खेत में उतरता है तो किसान उसे बाढ़ कहता है और वही पानी गर्मियों में कम पड़ जाए तो प्यास। बिहार में गंगा का यही सबसे बड़ा विरोधाभास है। एक ओर नदी किनारे बसे गांव हर साल कटाव और बाढ़ की मार झेलते हैं, दूसरी ओर गर्मी में सिंचाई, पेयजल, नौवहन और मत्स्य जीवन के लिए पर्याप्त प्रवाह का सवाल खड़ा रहता है, इसलिए गंगा का हिसाब केवल क्यूसेक में नहीं हो सकता। उसका हिसाब खेत, मछली, मिट्टी, भूजल, गांव और नदी पर निर्भर लोगों की जिंदगी में भी दर्ज होना चाहिए।
इसी संदर्भ में दिसंबर 2026 में 1996 की भारत-बांग्लादेश गंगा जल संधि के 30 वर्ष पूरे होने और उसकी समीक्षा का प्रश्न महत्वपूर्ण हो गया है। जनता दल (यू) के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्यसभा सदस्य संजय कुमार झा ने मांग की है कि संधि का उसी रूप में नवीनीकरण करने के बजाय वर्ष 2050 तक गंगा बेसिन से जुड़े राज्यों की जल जरूरतों का वैज्ञानिक आकलन किया जाए और बिहार की कृषि, पेयजल, उद्योग, भूजल, मत्स्य तथा पर्यावरणीय जरूरतों को इसमें उचित स्थान मिले। इस मांग पर राजनीतिक मतभेद भी सामने आ गए हैं।
बक्सर के सांसद सुधाकर सिंह ने 24 अगस्त 2026 को पटना में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर संजय झा के बयान को भ्रामक बताया और कहा कि भारत-बांग्लादेश जल संधि जैसे संवेदनशील विषय पर बोलने से पहले इतिहास और उपलब्ध दस्तावेजों का अध्ययन जरूरी है। उन्होंने कहा कि बिहार के हितों और जल अधिकारों को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव तथा तत्कालीन जल संसाधन मंत्री जगदानंद सिंह पहले भी आवाज उठाते रहे हैं। सुधाकर सिंह का मूल सवाल इससे आगे जाता है- जब बिहार के पास गंगा का पानी है, तो उसका उपयोग क्यों नहीं हो रहा? उनका कहना है कि कभी बिहार में गरमा धान की खेती होती थी, लेकिन पानी के अभाव में वह व्यवस्था खत्म होती गई।
यही वह विरोधाभास है जिसे फरक्का के प्रश्न के केंद्र में रखना होगा। फरक्का बैराज पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में गंगा पर बनाया गया और 1975 में चालू हुआ। इसका उद्देश्य गंगा से पानी मोड़कर भागीरथी-हुगली तंत्र में प्रवाह बढ़ाना और कोलकाता बंदरगाह में गाद की समस्या को कम करना था। इसके लिए लगभग 38 किलोमीटर लंबी फीडर नहर बनाई गई। उस समय यह एक बड़ी इंजीनियरिंग परियोजना थी, लेकिन नदी पर किसी बड़े अवरोध का असर केवल पानी की मात्रा तक सीमित नहीं रहता। नदी के साथ गाद, पोषक तत्व, मछलियां और पूरा पारिस्थितिक तंत्र भी चलता है।
बिहार में लंबे समय से यह सवाल उठता रहा है कि फरक्का के कारण नदी की धारा और गाद के व्यवहार में क्या परिवर्तन आया। स्थानीय समाज का अनुभव है कि कई इलाकों में कृषि भूमि पर बालू जमने से खेती प्रभावित हुई और कटाव ने लोगों को विस्थापित किया, हालांकि बिहार की हर बाढ़ या कटाव के लिए केवल फरक्का को जिम्मेदार ठहराना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा। नेपाल और हिमालय से आने वाला पानी, मानसूनी वर्षा, कोसी, गंडक और घाघरा जैसी सहायक नदियां, तटबंध, जल निकासी, नदी की प्राकृतिक संरचना और जलवायु परिवर्तन भी इसके महत्वपूर्ण कारण हैं।
इसका अर्थ यह भी नहीं कि फरक्का के प्रभाव का अध्ययन ही न किया जाए। पिछले पांच दशकों के जलप्रवाह, गाद, नदी तल, कटाव और कृषि भूमि के आंकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन ही इस बहस को तथ्य तक पहुंचा सकता है। यही वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण है जिसकी जरूरत आज है। इस बहस में मछुआरों की आवाज भी महत्वपूर्ण है। लोक में गाया जाता है-
गंगा जी में मिले न मछरिया
केना के दिनमा जयते हो भाय...
यह पंक्ति वैज्ञानिक प्रमाण नहीं, लेकिन नदी किनारे रहने वाले समाज के अनुभव का दस्तावेज जरूर है। मछुआरा नदी में परिवर्तन को सबसे पहले महसूस करता है। धारा बदले, पानी की गुणवत्ता बदले, मछलियों का प्रवास प्रभावित हो या प्रजनन क्षेत्र बदलें- उसकी रोजी-रोटी सीधे प्रभावित होती है।
गंगा में गांगेय डॉल्फिन और अनेक जलीय प्रजातियां भी हैं। हिलसा जैसी मछलियों के प्राकृतिक प्रवास का प्रश्न भी फरक्का से जुड़ा रहा है, इसलिए भविष्य की जल नीति में यह केवल नहीं पूछा जाना चाहिए कि भारत और बांग्लादेश के बीच कितना पानी बांटा जाए। यह भी पूछा जाना चाहिए कि गंगा को जीवित रखने के लिए कितना और किस प्रकार का प्रवाह आवश्यक है।
यहीं पर्यावरणीय प्रवाह का प्रश्न सामने आता है। नदी में केवल न्यूनतम क्यूसेक छोड़ देना पर्याप्त नहीं है। मौसम के अनुसार प्रवाह का स्वाभाविक उतार-चढ़ाव, मछलियों के प्रजनन, डॉल्फिन के आवास, भूजल पुनर्भरण और जैव विविधता के लिए आवश्यक है। नदी को केवल पानी की पाइपलाइन में बदल देना उसके साथ अन्याय होगा।
