रैगिंग रोधी नियम-कानून नहीं बचा पा रहे जिंदगी

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हमारी शिक्षा व्यवस्था ऐसी हो जो छात्रों को आसमान पर ले जाए। रैगिंग और प्रताड़ना उन्हें अवसाद के साथ ही मौत के मुंह में न ढकेले।

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प्रमोद भार्गव, वरिष्ठ पत्रकार

गुजरात में सूरज के सरकारी चिकित्सा महाविद्यालय में नवागंतुक छात्र का वरिष्ठ छात्रों द्वारा किया उत्पीड़न इतना भयावह साबित हुआ कि पहले साल के हर्ष पांड्या नामक छात्र ने मौत को गले लगा लिया। हर्ष के साथ चार वरिष्ठों द्वारा इतनी बेलगाम और बेरहम रैगिंग की गई, जिसे वह बर्दाश्त नहीं कर पाया। मामले के तूल पकड़ने के बाद कॉलेज प्रशासन ने आरोपी रेजिडेंट डॉक्टरों को छह माह के लिए निलंबित करने के साथ छात्रावास खाली करने का आदेश भी दे दिया।

इनके विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने के साथ ही प्राध्यापकों को भी समय रहते कदम नहीं उठाने के लिए नोटिस जारी किए गए हैं। साफ है कि जिम्मेदार घटना को टालते रहे, नतीजतन पीड़ित छात्र की वेदना इतनी बढ़ गई कि उसे आत्महत्या जैसा कदम उठाना पड़ा। यदि पीड़ा के दौरान समय पर प्रशासन संवेदना जताता तो यह घटना शायद टल जाती।

रैगिंग को लेकर शिक्षा संस्थानों में संवैधानिक प्रावधानों की कोई कमी नहीं है, लेकिन न तो उनका समय पर असरकारी पालन होता है और न ही जवाबदेहों के विरुद्ध कोई कठोर कार्रवाई। इसी का नतीजा है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में रैगिंग का त्रासद चलन प्रतिबंध के बावजूद व्यापक रूप में उपस्थित है। शीर्ष न्यायालय के कठोर दिशा-निर्देशों के बावजूद इस दिशा में ऐसी कानूनी पहल नहीं हुई कि इस अव्याहारिक क्रूरता पर पूर्ण विराम लग जाए।

संस्थानों में आज तक ऐसा प्रबंधन देखने में नहीं आ रहा है कि छात्र और छात्राएं निर्भय और निःसंकोच संस्थान की देहरी पर कदम रख पाएं। उन्हें पहले पाठ के रूप में वरिष्ठ छात्र अपने श्रेष्ठता बोध को थोपते हुए अपमान बोध कराने से नहीं चूकते हैं। यहां तक कि यदि छात्र आरक्षित कोटे से कम अंक पाकर चयनित हुआ है, तो उसे जातीय और आरक्षण की मिली वैधानिक सुविधा के बहाने भी प्रताड़ना का दंश झेलना पड़ता है।

बढ़ती शिकायतें और छात्र आत्महात्याओं से भी यह सत्यापित होता है कि अधिकारी शिकायत मिलने पर पहले तो मामले को दबाने की कोशिश करते हैं और मामला तूल पकड़ता है, तो एंटी रैगिंग समिति से अपने फेवर में लिखित प्रमाण ले लिए जाते हैं। पीड़ित को हेल्पलाइन से दी जाने वाली सलाहें भी बेनतीजा साबित हो रही हैं। गोया, जो चिकित्सा छात्र भविष्य में दूसरों का जीवन बचाने की शिक्षा ले रहे होते हैं, वे खुद रैगिंग का शिकार होकर अपना दम तोड़ रहे हैं, तो कई छात्र बीच में पढ़ाई भी छोड़ जाते हैं। 

संसद में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में तब के केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री सुभाष सरकार ने लिखित उत्तर में कहा था कि 2019 से लेकर 2023 तक 32,000 छात्र उच्च शिक्षण संस्थानों में ड्रॉप आउट हुए हैं। वहीं इन्हीं पांच वर्षों में इन संस्थानों में पढ़ने वाले 98 छात्रों ने आत्महत्याएं की है। इनमें देशभर के केंद्रीय विश्वविद्यालय, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, भारतीय प्रबंधन संस्थान और राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी जैसे उच्च कोटि के शिक्षा संस्थान शामिल हैं।

केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा उपलब्ध कराए गए इन खौफनाक आंकड़ों से पता चलता है कि शिक्षा संस्थान विद्यार्थियों में उम्मीदों की उड़ान पैदा करने के बजाय निराशा और अवसाद का भी माहौल रच रहे हैं। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का उत्साहजनक असर इन संस्थानों में पड़ा हो, ऐसा एकाएक कहना मुश्किल है। 

कुछ साल पहले केंद्रीय विश्वविद्यालय हैदराबाद के छात्र रोहित वेमुला और फिर तमिलनाडु के प्राकृतिक शिक्षा एवं योग महाविद्यालय की तीन छात्राओं द्वारा एक साथ आत्महत्या किए जाने के मामले सामने आए थे। कोटा और इंदौर से कोचिंग ले रहे छात्रों की खुदकुशी के मामले तो निरंतर सामने आते ही रहते हैं। देश के युवाओं की ये मौतें, संभावनाओं की मौतें हैं। ऐसे में यदि छात्र एवं छात्राओं की मौतों का यही सिलसिला बना रहता है, तो देश के बेहतर भविष्य की संभावना क्षीण हो जाएगी।

ये मौतें अध्ययन-अध्यापन से उपजी परेशानियों के चलते सामने आ रही हैं। देखने में आ रहा है कि राजनीतिक दलों के रहनुमा मौतों को केवल राजनीतिक चश्मे से देख रहे हैं, लिहाजा समस्या के समाधान की दिशा में ठोस पहल होती नहीं दिख रही है। यदि आने वाले समय में छात्र आत्महत्याओं को शिक्षा के व्यापक परिदृश्य में नहीं देखा गया तो आगे इन मौतों पर विराम लग जाएगा यह कहना मुश्किल है।

कोटा के कोचिंग संस्थानों में निरतंत छात्रों द्वारा की जा रही खुदकुशियों की पड़ताल करने से पता चलता है कि छात्रों को अभिभावक अपनी इच्छा के अनुसार महान बनाने की होड़ में लगे हैं। केरल के रहने वाले छात्र अनिल कुमार ने आत्महत्या पूर्व लिखे पत्र में लिखा था, ‘सॉरी मम्मी-पापा, आपने मुझे जीवन दिया, लेकिन मैंने इसकी कद्र नहीं की।’ यह पीड़ादायी कथन उस किशोर का था, जो आईआईटी की तैयारी में जुटा था। (ये लेखक के निजी विचार हैं)

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