भूजल में आर्सेनिक और क्रोमियम से जुड़े स्वास्थ्य जोखिम

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देश के कई इलाकों के भूजल में आर्सेनिक और क्रोमियम से जुड़े स्वास्थ्य जोखिम सामने आए हैं। हर आठ सेकेंड में एक बच्चा और हर साल पचास लाख से अधिक लोग दूषित भूजल के सेवन से मौत के मुंह में जा रहे हैं।

अरविंद जयतिलक
अरविंद जयतिलक
लेखक

देश के कई इलाकों के भूजल में आर्सेनिक और क्रोमियम से जुड़े स्वास्थ्य जोखिम का उजागर होना बेहद ही डरावना और चिंतित करने वाला है। यह खुलासा हाल ही में प्रकाशित इंडियन मेडिकल जर्नल के तथ्यों से हुआ है। मेडिकल जर्नल की इस समीक्षा के 63 स्टडी के विश्लेषण में आर्सेनिक को लेकर कैंसर का जोखिम सबसे बड़ी चिंता के तौर पर उभरकर सामने आया है।

स्टडी के आकलन में आर्सेनिक वाले पानी के सेवन से 49 फीसदी वयस्कों और 60 फीसदी बच्चों में संभावित गैर कैंसर वाले स्वास्थ्य के दूसरे जोखिम की आशंका जताई गई है। बच्चों में दूषित पानी के त्वचा के संपर्क से भी खतरा सामने आया है। कैंसर के जोखिम के आकलन में आर्सेनिक के संपर्क से जुड़े 72 फीसदी वयस्क और 69 फीसदी बच्चों के अध्ययनों में पानी पीने के जरिए जोखिम तय सीमा से अधिक पाया गया है। 

क्रोमियम के मामले में यह आंकड़ा वयस्कों में 50 फीसदी और बच्चों में 56 फीसदी रहा। चिंतित करने वाला तथ्य यह भी कि सतही पानी की तुलना मे भूजल में गैर-कैंसरकारी स्वास्थ्य जोखिम ज्यादा पाया गया है। देश के राज्यों की बात करें, तो पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, बिहार और जम्मू-कश्मीर समेत कई क्षेत्रों में आर्सेनिक को लेकर जोखिम बढ़ा है। पंजाब के तो कई जिलों में आर्सेनिक से दूषित भूजल से कैंसर का जोखिम तय सीमा से अधिक है। गौर करें तो यह पहली बार नहीं है, जब दूषित भूजल को लेकर उपजने वाले खतरों के संबंध में खुलासा हुआ है। 

रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली के पेयजल के नमूने 19 मानदंडों में से किसी पर खरे नहीं पाए गए थे। गौर करें तो देश के अधिकांश राज्यों की भी स्थिति कमोबेस ऐसी ही है। अमेरिका की ड्यूक यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा पहले ही दावा किया जा चुका है कि भारत के भूजल में हानिकारक यूरेनियम की मात्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों से अधिक है। यह शोध जर्नल ‘एनवायरमेंटल साइंस एंड टेक्नोलॉजी लेटर्स’ में प्रकाशित हुआ था, जिसमें भारत के 16 राज्यों के भूजल में खतरनाक स्तर पर यूरेनियम होने का दावा किया गया था।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत के लिए प्रति लीटर पेयजल में 30 माइक्रोग्राम यूरेनियम की मात्रा को सुरक्षित माना है, जबकि भारत के भूजल में यूरेनियम की मात्रा बहुत अधिक है। गत वर्ष ही विज्ञान पत्रिका नेचर जियोसाइंस द्वारा भी खुलासा किया जा चुका है कि सिंधु और गंगा नदी के मैदानी क्षेत्र का तकरीबन 60 फीसद भूजल दूषित हो चुका है। हालत यह है कि कहीं भूजल सीमा से अधिक खारा हो चुका है, तो कहीं उसमें आर्सेनिक की मात्रा खतरनाक स्तर पर पहुंच गई है। 

आंकड़ों में कहा गया है कि 200 मीटर की गहराई पर मौजूद भूजल का बड़ा हिस्सा दूषित हो चुका है वहीं 23 फीसद भूजल अत्यधिक खारा हो चुका है। 37 फीसद भूजल में आर्सेनिक की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुंच गई है। आर्सेनिक एक जहरीला तत्व होता है, जो प्राकृतिक रुप से भूजल में पाया जाता है, लेकिन मौजुदा समय में अत्यधिक खनन और फर्टिलाइजर के इस्तेमाल के कारण भूजल में आर्सेनिक की मात्रा लगातार बढ़ रही है। इसके उपयोग से डायरिया, उल्टी, खून वाली उल्टियां, पेशाब में खून आना, बाल गिरना और पेट दर्द जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। साथ ही इससे फेफड़े, त्वचा, किडनी और लिवर प्रभावित होते हैं।

दूषित भूजल में खतरनाक रोग उत्पन करने वाले जीव पाए जाते हैं, जो स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित करते हैं। दूषित भूजल में पाए जाने वाले विषाणु पीलिया, पोलियो, गैस्ट्रो इंटराइटिस और चेचक जैसे रोगों को जन्म देते हैं, वहीं जीवाणुओं द्वारा अतिसार, पेचिश, मियादी बुखार, हैजा, सुजाक व क्षय रोग उत्पन होते हैं। आर्सेनिक के अलावा दूषित भूजल में कैडमियम, लेड, मरकरी, निकल तथा सिल्वर की मात्रा भी बढ़ जाती है, जो सेहत के लिए बेहद खतरनाक साबित होता है।

दूषित भूजल में लोहा, मैगनीज, कैल्शियम, बेरियम, बोरान एवं अन्य लवणों जैसे नाइट्रेट, सल्फेट, बोरेट और कार्बोनेट इत्यादि की अधिकता भी मानव स्वास्थय पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। एक आंकड़े के मुताबिक हर आठ सेकेंड में एक बच्चा दूषित भूजल के सेवन से काल का ग्रास बन रहा है। हर साल पचास लाख से अधिक लोग दूषित भूजल के सेवन से मौत के मुंह में जा रहे हैं। यह समझना होगा कि भूजल जल आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण स्रोत है, जिसका उचित उपयोग और संरक्षण होना चाहिए।

देश में कुल वार्षिक पुनः पूरणयोग्य भूजल संसाधनों का मान 433 घन किमी है। प्राकृतिक निस्सरण के लिए 34 बीसीएम जल स्वीकार करते हुए नेट वार्षिक भूजल उपलब्धता का मान संपूर्ण देश के लिए 399 बीसीएम है। वार्षिक भूजल का मान 231 बीसीएम है, जिसमें सिंचाई उपयोग के लिए 213 बीसीएम तथा घरेलू एवं औद्योगिक उपयोग के लिए जल का मान 18 बीसीएम है। भूजल पीने के पानी के अलावा पृथ्वी में नमी बनाए रखने में भी मददगार साबित होता है। पृथ्वी पर उगने वाली वनस्पति तथा फसलों का पोषण भी इसी जल से होता है। यहां यह भी जानना जरूरी है कि अन्य देशों की तुलना में भारत में सालाना मीठे व स्वच्छ पानी की खपत अधिक होती है।

देश में जल संरक्षण तथा प्रबंधन कार्यक्रम को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए समय-समय पर अनेक उपाय किए गए हैं। 1945 में केंद्रीय जल आयोग का गठन किया गया, जो राज्यों के सहयोग से देश भर में जल संसाधनों के विकास, नियंत्रण, संरक्षण तथा समन्वय को आगे बढ़ाता है। 1970 में केंद्रीय भू-जल बोर्ड का गठन किया गया।

1980 में राष्ट्रीय जल बोर्ड तथा 2006 में भू-जल के कृत्रिम पुनर्भरण के लिए सलाहकार परिषद का गठन किया गया। 2012 में राष्ट्रीय जल नीति तैयार किया गया जिसके तहत सुनिश्चित किया गया कि जल की उपलब्धता बढ़ाने के लिए वर्षा का प्रत्यक्ष उपयोग एवं अपरिहार्य वाष्पोत्सर्जन को कम करने का प्रयास होगा। ( ये लेखक के निजी विचार हैं)

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