संपादकीय : जापानी निवेश से उम्मीदें
उत्तर प्रदेश और जापान के बीच नई दिल्ली में हुए यूपी-जापान इन्वेस्टमेंट मीट में करीब 3,191 करोड़ रुपये के निवेश समझौतों पर सहमति निवेश की एक और घोषणा मात्र नहीं है। इससे स्पष्ट हुआ है कि जापान उत्तर प्रदेश को एक बड़े बाजार के साथ ही दीर्घकालिक विनिर्माण, तकनीक और आपूर्ति-श्रृंखला के केंद्र के रूप में देख रहा है। भारतीय कंपनियों के साथ मिलकर उसकी परियोजनाएं सूबे की आर्थिकी और रोजगार की तस्वीर बदल सकती हैं।
यमुना एक्सप्रेसवे क्षेत्र में प्रस्तावित ‘जापानी सिटी’ में जापानी कंपनियों को मात्र औद्योगिक भूखंड आवंटन तक सीमित न रखकर उनके छोटे-बड़े आपूर्तिकर्ताओं, स्थानीय एमएसएमई, लॉजिस्टिक्स, कौशल प्रशिक्षण, परीक्षण और अनुसंधान केंद्रों से जोड़ा गया तो यह एक पूरा औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र खड़ा हो सकेगा। इससे एक जापानी कंपनी के साथ अनेक स्थानीय उद्यमों के लिए बाजार और रोजगार पैदा होंगे। यही वह ‘मल्टीप्लायर इफेक्ट’ है जिसकी उत्तर प्रदेश को सबसे अधिक जरूरत है।
सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, ईवी, ऑटो कंपोनेंट, हरित ऊर्जा और फार्मास्यूटिकल्स में उत्तर प्रदेश पिछले कुछ वर्षों में नई औद्योगिक पहचान बनाने की कोशिश कर रहा है। जेवर में सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स परियोजनाओं, डिफेंस कॉरिडोर, मेडिकल डिवाइस और बल्क ड्रग पार्क जैसी पहलों ने इस दिशा में आधार तैयार किया है। जापानी पूंजी और तकनीकी विशेषज्ञता इस आधार को मजबूत कर सकती है। खासकर यामानाशी प्रीफेक्चर के साथ स्वच्छ ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन, तकनीक, कौशल और पर्यटन में सहयोग की संभावनाएं निवेश से आगे की साझेदारी का संकेत देती हैं।
करीब 25 करोड़ लोगों का विशाल बाजार, दिल्ली-एनसीआर से निकटता, एक्सप्रेसवे और हवाई अड्डों का विस्तार, बेहतर औद्योगिक आधार, उपलब्ध भूमि और निवेश-अनुकूल नीतियां निश्चित ही जापान की उत्तर प्रदेश में बढ़ती रुचि की वजहें हैं। इन आंकड़ों की चमक के पीछे एक जरूरी सवाल भी है- क्या ये प्रस्ताव वास्तव में कारखानों, उत्पादन और स्थायी रोजगार में बदलेंगे? सरकार को 2023 के ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट का अनुभव नहीं भूलना चाहिए। उस समय 32 लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश प्रस्ताव आए थे, लेकिन प्रस्ताव और वास्तविक निवेश के बीच बड़ा अंतर रहा।
यही सावधानी इस बार भी जरूरी है, इसलिए 3,191 करोड़ रुपये और 10 हजार रोजगार को उपलब्धि मानने से पहले उनकी वास्तविक जमीन तलाशनी होगी। जमीन आवंटन, निर्माण, मशीनरी स्थापना, उत्पादन शुरू होना और फिर वास्तविक नियुक्तियां—निवेश की सफलता की यही क्रमिक कसौटियां हैं। जापानी निवेशक केवल बड़ा बाजार नहीं देखते; वे गुणवत्ता, प्रशासनिक स्थिरता, कुशल श्रम और विश्वसनीय आपूर्ति-श्रृंखला भी चाहते हैं, इसलिए उनका यहां टिकना इस बात का प्रमाण होगा कि प्रदेश इन कसौटियों पर कितना खरा उतरता है। अभी समूचे निवेश प्रस्तावों को वास्तविक निवेश मानना उचित नहीं होगा।
उत्तर प्रदेश को एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लिए ऐसे निवेश जरूरी हैं, लेकिन अकेले पर्याप्त नहीं। असली जरूरत निवेश को उत्पादन, उत्पादन को निर्यात और उद्योग को स्थानीय आपूर्ति-श्रृंखला तथा स्थायी रोजगार से जोड़ने की है। जापान के साथ बनता यह रिश्ता इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण अवसर है। अब उत्तर प्रदेश की अग्निपरीक्षा यह है कि वह ‘प्रस्तावों से मशीन’ और ‘निवेश से रोजगार’ तक कितनी तेजी और विश्वसनीयता से पहुंचता है।
