जयंती पर विशेष : जेहि गावत तुलसी भए तुलसी तुलसीदास
भले अन्य रचनाकार अप्रासंगिक हो जाएं, किंतु तुलसीदास कभी अप्रासंगिक नहीं होंगे। जब से उनकी रामचरितमानस जन-जन में पहुंची, तब से वह राम की ही तरह लोकप्रिय हैं। गांव-गांव, गली-मोहल्ले में मानस का पाठ होता है। इसकी चौपाइयां और दोहे लोग पूजा में मंत्र की तरह प्रयोग करते हैं। न जाने कितने विद्वान रामकथा सुनाकर जीवनयापन कर रहे हैं। विदेशों में बसे भारतीयों ने भी रामचरितमानस के सहारे अपनी संस्कृति और आस्था को जीवित रखा। गिरमिटिया भारतीय अपने साथ मानस की प्रतियां लेकर मॉरीशस जैसे दुर्गम टापुओं तक गए और उसे अपना संबल बनाया।
गोस्वामी तुलसीदास की जन्मतिथि और जन्मस्थान को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं। इसके बावजूद सावन शुक्ल पक्ष की सप्तमी को तुलसीदास जयंती मनाई जाती है। उनके जीवन के प्रामाणिक विवरण भी बहुत कम मिलते हैं। नाभादास के भक्तमाल तथा बेनी माधवदास के मूल गोसाईं चरित में तुलसी के जीवन से जुड़ी अनेक बातें मिलती हैं, किंतु उनमें से कई प्रमाणित नहीं हैं। रत्नावली की फटकार-“अस्थि चर्म मय देह में तामें ऐसी प्रीत, ऐसी जो रघुनाथ में होत न तव भवभीति”-ने तुलसीदास के जीवन की दिशा बदल दी और वह राम के होकर रह गए। भवभूति के राम परमपुरुष, वाल्मीकि के राम मर्यादा पुरुषोत्तम और अध्यात्म रामायण के राम विष्णु के अवतार हैं, तो तुलसी के राम मर्यादा पुरुषोत्तम होते हुए भी उनके आराध्य हैं। वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस में अंतर होते हुए भी दोनों ग्रंथों में संगीतात्मकता और विविध रसों की अद्भुत अभिव्यक्ति मिलती है।
तुलसी ने मानव चरित्र की मर्यादा में रहकर राम का चरित्र चित्रण किया। तुलसीदास ऐसे समय में हुए जब भारत राजनीतिक और सामाजिक विखंडन से गुजर रहा था। उन्होंने रामचरितमानस के माध्यम से समाज को जोड़ने, नैतिकता जगाने और आध्यात्मिक मार्ग दिखाने का प्रयास किया। नवधा भक्ति से लेकर परिवार, समाज, प्रजा, साधु-संत, मित्र-शत्रु और शासन तक उन्होंने जीवन के अनेक पक्षों पर अपनी दृष्टि व्यक्त की। “जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी, सो नृप अवस नरक अधिकारी” कहकर उन्होंने आदर्श शासन की कल्पना रखी और “दैहिक दैविक भौतिक तापा, राम राज काहू नहि व्यापा” के माध्यम से रामराज्य का स्वरूप प्रस्तुत किया।
तुलसीदास महज कवि नहीं, लोकनायक और समाजद्रष्टा भी हैं। ग्रियर्सन, रामचंद्र शुक्ल और हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे विद्वानों ने उनके लोकमहत्व को स्वीकार किया। आज मुद्रित पुस्तकों से लेकर इंटरनेट और सोशल मीडिया तक उनकी रचनाएं सहज उपलब्ध हैं। यही तुलसी और रामचरितमानस की विशेषता है कि समय बदलता जाता है, किंतु उनकी प्रासंगिकता निरंतर बढ़ती जाती है।
शिवचरण चौहान, लेखक
