छह महीने बाढ़, छह महीने बेबसी: राजधानी से कुछ दूर घाघरा किनारे हर साल उजड़ती जिंदगी

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Edited By Muskan Dixit
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सीतापुर के रामपुर मथुरा क्षेत्र में घाघरा का कटान हजारों परिवारों के लिए बन चुका है सालाना संकट; खेत नदी में समा रहे, घर उजड़ रहे और गांवों का नक्शा हर साल बदल रहा है।

सीतापुर/डिजिटल डेस्क लखनऊ। राजधानी लखनऊ से कुछ ही दूरी पर बसे सीतापुर के नदी किनारे गांवों में बारिश का मौसम सिर्फ पानी नहीं, बल्कि उजड़ने का डर भी लेकर आया है। रामपुर मथुरा क्षेत्र में घाघरा नदी का जलस्तर बढ़ने के साथ कटान ने रफ्तार पकड़ ली है। खेतों के बाद अब घरों पर नदी का खतरा मंडरा रहा है और कई परिवार अपनी वर्षों की गृहस्थी समेटकर सुरक्षित ठिकानों की ओर जाने को मजबूर हैं।

घाघरा नदी का जलस्तर 118.80 मीटर दर्ज किया गया है, जबकि खतरे का निशान 119.00 मीटर है। यानी नदी फिलहाल खतरे के निशान से महज 20 सेंटीमीटर नीचे बह रही है। बढ़ते जलस्तर और तेज कटान ने नदी किनारे बसे परिवारों की चिंता बढ़ा दी है।

बुचऊ पुरवा में नदी ने निगल लिए तीन घर

विकासखंड रामपुर मथुरा क्षेत्र में घाघरा नदी के किनारे बसे शुकुलपुरवा ग्राम पंचायत के मजरा बुचऊ पुरवा में कटान तेजी से बढ़ रहा है। नदी की धारा संतोषी, मनोहर और गयाप्रसाद के घरों को काटकर अपने साथ ले जा चुकी है।

आशियाना छिनने के बाद प्रभावित परिवार नाव के सहारे अपनी गृहस्थी का सामान सुरक्षित स्थानों तक पहुंचा रहे हैं। गांव के दूसरे परिवारों ने भी हालात बिगड़ने की आशंका को देखते हुए अपने घर खाली करने की तैयारी शुरू कर दी है।

गांव निवासी नरेश, गयाप्रसाद, मनोहर और रामस्वरूप का कहना है कि यदि कटान की रफ्तार इसी तरह जारी रही तो एक सप्ताह के भीतर गांव का अस्तित्व खत्म होने का खतरा है।

नागेश्वर पुरवा से सिर्फ 50 मीटर दूर नदी

कटान का खतरा सिर्फ बुचऊ पुरवा तक सीमित नहीं है। नागेश्वर पुरवा में घाघरा नदी अब करीब 50 मीटर दूर रह गई है। नदी की धारा लगातार जमीन काट रही है, जिससे यहां रहने वाले परिवारों में भी भय बढ़ता जा रहा है।

दोनों गांवों में बाढ़ का पानी भरा हुआ है और ग्रामीणों को आवागमन के लिए नाव का सहारा लेना पड़ रहा है। जिन रास्तों से लोग रोजमर्रा के काम के लिए आते-जाते थे, वहां अब पानी दिखाई दे रहा है।

छह महीने तक चलता है विस्थापन का डर

सीतापुर की तीन तहसीलें हर साल बाढ़ की चपेट में आती हैं। इनमें महमूदाबाद तहसील का रामपुर मथुरा क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित इलाकों में शामिल है।

नदी का पानी बढ़ने पर सबसे पहले खेती की जमीन प्रभावित होती है। उपजाऊ खेत कटान की भेंट चढ़ते हैं और इसके बाद नदी का खतरा घरों तक पहुंच जाता है। वर्षों की मेहनत से बनाए गए आशियानों को छोड़कर परिवारों को सुरक्षित स्थान तलाशना पड़ता है।

प्रभावित परिवारों के लिए यह केवल कुछ दिनों की परेशानी नहीं है। वर्ष के करीब छह महीने उन्हें रोजगार, भोजन, सुरक्षित आवास और परिवार की सुरक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष करना पड़ता है।

चारों तरफ पानी, रोजमर्रा की जिंदगी मुश्किल

बुचऊ पुरवा और नागेश्वर पुरवा में बाढ़ का पानी भरा होने से ग्रामीणों के सामने रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना चुनौती बन गया है। कटान प्रभावित लोगों का कहना है कि महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को शौच के लिए भी परेशानी उठानी पड़ रही है।

बाढ़ के पानी में सांप और अन्य जलीय जीवों का खतरा भी बना हुआ है। खाद्यान्न और जरूरी सामान लाने के लिए नाव ही प्रमुख साधन रह गई है।

sitapur Ghaghra River Flood (1)

कई गांव अब भी बाढ़ के पानी से घिरे

शुकुलपुरवा के अलावा कनरखी, अटौरा, अंगरौरा, अखरी, प्यारे पुरवा, बाबा कुटी, निरंजन पुरवा, मिश्रनपुरवा, सोती पुरवा, बलेसर पुरवा और अर्जुन पुरवा समेत कई गांव अभी भी बाढ़ के पानी से घिरे हुए हैं।

कृषि भूमि पहले ही कटान की चपेट में आ चुकी है। वहीं पानी भरा होने के कारण ग्रामीणों को मजदूरी भी नहीं मिल पा रही है। इससे बाढ़ के साथ-साथ आजीविका का संकट भी गहराता जा रहा है।

sitapur Ghaghra River Flood (2)

प्रशासन ने शुरू की राहत और आवासीय भूमि की तैयारी

बढ़ते संकट के बीच तहसील प्रशासन की ओर से प्रभावित गांवों में राहत सामग्री पहुंचाई जा रही है। प्रशासन के मुताबिक, प्रभावित परिवारों को तिरपाल, लंच पैकेट और अन्य राहत सामग्री उपलब्ध कराई जा रही है।

उपजिलाधिकारी महमूदाबाद अभिषेक प्रियदर्शी ने बताया कि कटान पीड़ितों के लिए आवासीय भूमि का सर्वे कराकर उसका चिन्हीकरण भी किया जा चुका है। तहसील प्रशासन की टीम लगातार प्रभावित इलाकों की निगरानी कर रही है।

राहत के बीच सबसे बड़ा सवाल स्थायी समाधान का

तिरपाल, भोजन और राहत सामग्री बाढ़ के बीच तत्काल सहारा जरूर दे सकती है, लेकिन नदी के कटान से हर साल उजड़ते परिवारों के लिए असली सवाल स्थायी सुरक्षा का है।

हर साल खेत कटते हैं, घर उजड़ते हैं और परिवार विस्थापित होते हैं। ऐसे में ग्रामीणों की चिंता सिर्फ इस बाढ़ को पार करने की नहीं, बल्कि अगली बाढ़ से पहले अपने घर, जमीन और आजीविका को सुरक्षित करने की है।

घाघरा सिर्फ जमीन नहीं काट रही, वह वर्षों की मेहनत और परिवारों की उम्मीदों को भी अपने साथ बहा रही है। अब सवाल यह है कि अगली बाढ़ आने से पहले इन परिवारों को स्थायी सुरक्षा कब मिलेगी।

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