World Photography Day: फिल्म रोल से मोबाइल कैमरे तक बदला दौर, नहीं बदली तस्वीरों की नजर

Amrit Vichar Network
Edited By Anjali Singh
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कैमरे और फोटोग्राफी की तकनीक ने लंबा सफर तय किया है। फिल्म रोल से डिजिटल कैमरा और अब स्मार्टफोन तक तस्वीरें खींचने का अंदाज बदला, लेकिन एक अच्छी तस्वीर के पीछे की नजर और कहानी कहने की कला आज भी वही है।

36 फ्रेम से अनगिनत क्लिक तक बदल गई तस्वीर की दुनिया
फोटोग्राफर बोले- हुनर और नजर ही बनाती है तस्वीर को खास
डार्क रूम से एआई के दौर तक बदला फोटोग्राफी का सफर

 

बरेली, अमृत विचार। विश्व फोटोग्राफी दिवस...यह दिन सिर्फ कैमरे और तस्वीरों का जश्न नहीं, बल्कि उन नजरों को सलाम करने का मौका है, जो दुनिया को एक अलग कोण से देखने और दिखाने का हुनर रखती हैं। एक तस्वीर कई बार हजार शब्दों से ज्यादा असर छोड़ती है। वह किसी घटना की गवाह बनती है, इतिहास को सहेजती है और समाज में हो रहे बदलावों को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाती है। तकनीक के साथ फोटोग्राफी का सफर भी तेजी से बदला है। कभी भारी-भरकम कैमरों और फिल्म रोल से शुरू हुई यह कला आज मोबाइल फोन की स्क्रीन तक पहुंच चुकी है। 

इसके बावजूद तस्वीर की अहमियत कम नहीं हुई, बल्कि उसकी पहुंच और प्रभाव कई गुना बढ़ गया। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के जमाने में पुराने फोटोग्राफर्स युवाओं को अपनी स्किल्स पर ध्यान देने की सलाह देते हैं। तब महज 36 फ्रेम का रोल एक-एक क्लिक की अहमियत बढ़ा देता था। चंद क्लिक में बेहतर रिजल्ट देने का दबाव वक्त के साथ आपके कैमरे की नजर को धार देने का काम करता था। इसके बाद डार्क रूम में जाकर खुद प्रोसेस चुनौती भरा काम था। आज इस सबकी जरूरत नहीं, मगर जरूरी ये है कि एआई के साथ कम करते वक्त आपके फोटो की मौलिकता बची रहनी चाहिए।

डिजिटल दौर में अनूठी विरासत है डार्क रूम

महात्मा ज्योतिबाफुले रुहेलखंड विश्वविद्यालय के एजुकेशन विभाग में फोटोग्राफी के पुराने दौर की यादों को समेटे एक डार्क रूम आज भी सहेजकर रखा गया है। खास बात है कि शहर में डार्क रूम अब बेहद दुर्लभ है। वरिष्ठ फोटोग्राफर और विवि सहायक मीडिया प्रभारी तपन वर्मा ने बताया कि डार्क रूम में पूरा प्रोसेस रोशनी को कंट्रोल कर किया जाता था। नेगेटिव को एंलार्जर में लगाकर फोटो पेपर पर एक्सपोज किया जाता था। इसके बाद अलग-अलग रसायनों की मदद से तस्वीर को उभारा जाता था। डिजिटल फोटोग्राफी के दौर में यह डार्क रूम पुरानी तकनीक की अनूठी विरासत है। इसके अलावा एक ब्लैक एंड व्हाइट स्टूडियो विवि में आज भी सहेजा गया है।

आज दुनिया में सबके हाथों में कैमरा है, हर कोई फोटोग्राफी कर रहा है। मगर फोटोग्राफी एक विधा है, जिस तरह पेंटिंग में पेंटर अपनी भावनाएं उड़ेलता है, उसी तरह फोटोग्राफर भी भावनाएं फोटो के माध्यम से लोगों के सामने लाता है। तस्वीर वही है जो स्वयं बोलती हो।

-गोपाल शर्मा, वरिष्ठ फोटोग्राफर

तकनीक ने फोटोग्राफी को काफी बदल दिया है, मगर फोटोग्राफर की नजर वही है। कुछ तस्वीरें खुद कैमरे की नजर तक आती हैं, मगर जब विषय पर काम करने की बात हो तो प्रीविजुलाइलेशन मायने रखता है। वहीं आधुनिकता की दौड़ में तस्वीर की मौलिकता नहीं जानी चाहिए।

-पंकज शर्मा, वरिष्ठ फोटोग्राफर

फोटोग्राफी अपने आप में कई विधाएं समेटे हुए है, उसमें से एक विधा बर्ड वॉचिंग भी है। बर्ड वॉचिंग शौकिया तौर पर शुरू की थी, मगर इसकी बदौलत प्रकृति के वो रंग देखने को मिले, जिन्हें हर बार खुली आंखों से नहीं देखा जा सकता है। फोटोग्राफी बेहद ठहराव और सब्र मांगती है।

काजलदास गुप्ता, बर्ड वॉचर

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