Gonda News : जेब कटने के बाद जागा शिक्षा विभाग! अप्रैल के आदेश पर अगस्त में फरमान, किताब-यूनिफॉर्म खरीदने के बाद कार्रवाई पर सवाल
शुल्क नियामक समिति ने 30 अप्रैल को दिए थे निर्देश, जिला विद्यालय निरीक्षक ने 11 अगस्त को जारी किया आदेश
गोंडा में निजी स्कूलों की ओर से किसी खास दुकान या विद्यालय से किताब-कॉपी, यूनिफॉर्म और जूते-मोजे खरीदने के दबाव पर माध्यमिक शिक्षा विभाग ने 11 अगस्त को सख्त आदेश जारी किया है। सवाल यह है कि जिला शुल्क नियामक समिति के 30 अप्रैल के निर्देश के बावजूद कार्रवाई चार महीने बाद क्यों हुई, जबकि अधिकांश अभिभावक बच्चों का सामान खरीद चुके हैं।
गोंडा, अमृत विचार: निजी विद्यालयों में किताब-कॉपी, यूनिफॉर्म, जूते-मोजे और अन्य सामान किसी खास दुकान या विद्यालय से खरीदने के लिए अभिभावकों पर दबाव बनाने के मामले में माध्यमिक शिक्षा विभाग की कार्रवाई पर ही सवाल खड़े हो रहे हैं। जिला शुल्क नियामक समिति ने 30 अप्रैल को ही इस संबंध में निर्देश दे दिए थे, लेकिन जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय से सख्त आदेश अब 11 अगस्त को जारी किया गया है। तब तक शैक्षिक सत्र का बड़ा हिस्सा बीत चुका है और अधिकांश अभिभावक बच्चों की किताबें-कॉपियां, यूनिफॉर्म, जूते-मोजे समेत जरूरी सामान खरीद चुके हैं।
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब अभिभावकों की जेब से पैसा निकल चुका, तब विभाग का यह आदेश किस काम का? यदि निजी विद्यालयों द्वारा मनमानी खरीद कराई जा रही थी तो नए सत्र की शुरुआत में ही कार्रवाई क्यों नहीं की गई? अप्रैल-मई में आदेश जारी कर अभिभावकों को राहत क्यों नहीं दी गई? अगस्त में जारी आदेश को लेकर अब विभाग की कार्यप्रणाली पर ही सवाल खड़े होने लगे हैं।
जिला विद्यालय निरीक्षक डा रामचंद्र की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि किसी भी छात्र-छात्रा अथवा अभिभावक को किसी विशिष्ट दुकान से किताबें, जूते, मोजे, यूनिफॉर्म आदि खरीदने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। विद्यालय स्वयं भी इन वस्तुओं की बिक्री कर अभिभावकों को वहीं से खरीदने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। आदेश में उल्लंघन को उत्तर प्रदेश स्ववित्तपोषित स्वतंत्र विद्यालय अधिनियम के तहत दंडनीय बताया गया है।
दोषी विद्यालय की मान्यता या संबद्धता वापस लेने की संस्तुति के साथ पांच लाख रुपये तक अर्थदंड का प्रावधान भी बताया गया है, लेकिन विभाग के आदेश का समय ही उसकी प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर रहा है। अप्रैल में शुल्क नियामक समिति की बैठक में निर्देश जारी हुए और अगस्त में उसका कड़ाई से अनुपालन कराने का आदेश आया। इस बीच नए सत्र की शुरुआत हो चुकी, स्कूल खुल गए और अभिभावक बच्चों की जरूरत का लगभग पूरा सामान खरीद चुके। अभिभावकों का कहना है कि स्कूल खुलते ही बच्चों की किताबें, कॉपियां, यूनिफॉर्म, जूते-मोजे और अन्य सामान खरीदना जरूरी होता है।
कई विद्यालयों में निर्धारित दुकान अथवा स्कूल से ही सामान लेने की व्यवस्था पहले से रहती है। ऐसे में अगस्त में आदेश जारी करने से उस अभिभावक को तत्काल राहत कैसे मिलेगी, जिसने कई महीने पहले हजारों रुपये खर्च कर दिए? यही वजह है कि शिक्षा विभाग के आदेश को लेकर चर्चा तेज है कि जब पूरा समय बीत गया, तब जाकर सख्ती क्यों दिखाई गई? क्या विभाग को अप्रैल-मई में ही इस समस्या की जानकारी नहीं थी? यदि शिकायतें लगातार मिल रही थीं तो उन पर तत्काल कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
कागज पर सख्ती, जमीन पर असर कब?
आदेश में कार्रवाई के प्रावधानों का उल्लेख जरूर है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या विभाग अब वास्तव में विद्यालयों की जांच करेगा? क्या उन स्कूलों की सूची तैयार होगी जहां अभिभावकों को निर्धारित दुकान या विद्यालय से ही सामान खरीदने के लिए मजबूर किया गया? क्या पहले से वसूली गई रकम या अतिरिक्त शुल्क की भी जांच होगी? अभिभावकों का कहना है कि केवल आदेश जारी करने से समस्या खत्म नहीं होगी। यदि विभाग वास्तव में गंभीर है तो स्कूलों में जांच कराकर यह पता लगाना चाहिए कि किस विद्यालय ने किस वस्तु को किस माध्यम से बेचने के लिए बाध्य किया और अभिभावकों से कितनी रकम वसूली गई।
शिक्षा विभाग का यह आदेश अब सवालों के घेरे में इसलिए भी है क्योंकि जिस समय इस तरह की खरीदारी पर रोक सबसे ज्यादा प्रभावी हो सकती थी, उस समय विभाग की कार्रवाई दिखाई नहीं दी। अब जब अभिभावक बच्चों का सामान खरीद चुके हैं, तब विद्यालयों को चेतावनी जारी कर दी गई है। ऐसे में अभिभावकों के बीच यही सवाल तैर रहा है कि जब किताब-कॉपी और यूनिफॉर्म खरीदने का समय था, तब विभाग कहां था? और जब खरीदारी पूरी हो गई तो आदेश जारी करने से आखिर किसे राहत मिलेगी?
