कभी अकेले बाहर निकलने से डरती थीं सविता पूनिया, हॉकी ने बदली जिंदगी; अब युवाओं की बनीं मेंटोर

Amrit Vichar Network
Edited By Muskan Dixit
On

17 साल के सफर में हासिल किया आत्मविश्वास, 317 अंतरराष्ट्रीय मैच खेल चुकीं भारतीय गोलकीपर वंदना कटारिया के रिकॉर्ड से सिर्फ चार मैच दूर

एम्सटेलवीनः भारतीय महिला हॉकी की दिग्गज गोलकीपर सविता पूनिया ने अपने 17 साल के खेल सफर को याद किया। सविता पूनिया ने कहा कि हॉकी ने सविता पूनिया को केवल पहचान ही नहीं दी, बल्कि सविता पूनिया के व्यक्तित्व और आत्मविश्वास को भी पूरी तरह बदल दिया। एक समय सविता पूनिया पड़ोस में रिश्तेदार के घर तक अकेले जाने से भी हिचकिचाती थीं और सविता पूनिया अपनी माँ से दरवाजे पर खड़े रहने को कहती थीं। अब सविता पूनिया दुनिया के किसी भी कोने में अकेले जा सकती हैं और सविता पूनिया टीम के युवा खिलाड़ियों को मार्गदर्शन देती हैं।

हॉकी ने हमें खुलकर बोलना सिखाया

36 साल की सविता अपना तीसरा विश्व कप खेल रही है और अब तक 317 अंतरराष्ट्रीय मैच खेल चुकी है। वह भारतीय महिला हॉकी में सबसे ज्यादा अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने के रिकॉर्ड के करीब है। वंदना कटारिया के 320 मैचों के रिकॉर्ड को तोड़ने के लिए उसे सिर्फ चार और मैच खेलने हैं।

सविता ने अपने शुरुआती दिनों को याद किया। वह कहती थीं कि तब वह बड़े खिलाड़ियों को सिर्फ ‘गुड मॉर्निंग’ ही कह पाती थीं। द हॉकी के सफर ने सविता का आत्मविश्वास बढ़ा दिया। अब सविता टीम की मेंटर की भूमिका निभा रही हैं।

उन्होंने कहा कि वह युवा खिलाड़ियों को अपने अनुभव बताती हैं और उन्हें यह समझाने की कोशिश करती हैं कि जिस मुकाम तक पहुंचने में उनकी पीढ़ी को काफी समय लगा, आज के खिलाड़ी उसे तेजी से हासिल कर सकते हैं।

बस कंडक्टर की बात से छोड़ना चाहती थीं हॉकी

सविता ने अपने करियर का एक मुश्किल दौर भी साझा किया। उन्होंने बताया कि 2011 में शिविर से घर लौटते समय उन्हें बस में गोलकीपिंग बैग और सामान के कारण परेशानी का सामना करना पड़ा था। बस कंडक्टर ने उनसे दो टिकट लेने को कहा। इसके बाद कथित तौर पर की गई एक टिप्पणी से वह बेहद आहत हुईं और उन्होंने अपने पिता से हॉकी छोड़ने की बात कही।

सविता के मुताबिक, इसके बाद उनके पिता ने पुरानी कार खरीदी, ताकि वह बिना ऐसी परेशानियों के हॉकी खेलना जारी रख सकें।

‘गोलकीपर बनना मेरे जीवन का सबसे अच्छा फैसला’

सविता ने कहा कि भारतीय हॉकी में गोलकीपरों को मिलने वाला सम्मान पहले की तुलना में काफी बदला है। पहले मैच के बाद चर्चा ज्यादातर गोल करने वाले खिलाड़ियों की होती थी, लेकिन अब गोल बचाने वाले खिलाड़ियों के प्रदर्शन को भी महत्व मिलता है।

उन्होंने कहा कि गोलकीपर बनना उनके जीवन का सबसे अच्छा फैसला रहा और वह चाहती हैं कि उन्हें एक अच्छी गोलकीपर के साथ-साथ अच्छी मेंटोर के तौर पर भी याद किया जाए।

टोक्यो की टीस को बनाया प्रेरणा

टोक्यो ओलंपिक में भारतीय महिला हॉकी टीम पदक से चूक गई थी। सविता के मुताबिक, उस प्रदर्शन की तारीफ तो हुई, लेकिन पदक नहीं जीत पाने का मलाल टीम के लिए प्रेरणा बन गया।

उन्होंने कहा कि इसके बाद खिलाड़ियों ने व्यक्तिगत और टीम स्तर पर काफी मेहनत की। अब टीम का लक्ष्य अपनी ताकत के मुताबिक खेलते हुए एक कदम और आगे बढ़ना है। विश्व कप के बाद एशियाई खेल और लॉस एंजिलिस ओलंपिक भी टीम के महत्वपूर्ण लक्ष्य हैं।

अभी विश्व कप और एशियाई खेल पर पूरा फोकस

भविष्य को लेकर सविता ने कहा कि फिलहाल उनका ध्यान विश्व कप और एशियाई खेलों पर है। वह हर दिन खुद को बेहतर बनाने पर ध्यान देती हैं और इसके बाद ही आगे के सफर के बारे में फैसला करेंगी।

नई पीढ़ी के खिलाड़ियों को संदेश देते हुए उन्होंने माता-पिता से बच्चों को खेलों में आगे बढ़ने के लिए समर्थन देने की अपील की। उन्होंने कहा कि खेल के क्षेत्र में लगातार नए अवसर बढ़ रहे हैं, लेकिन सफलता के लिए लगन, प्रतिबद्धता, अनुशासन और मेहनत जरूरी है।

यह भी पढ़ेंः लखनऊ की बेटियों ने मचाया रोलबॉल में धमाल, सभी मैच जीते; अब सेमीफाइनल में होगी बड़ी टक्कर

संबंधित समाचार